–सुसंस्कृति परिहार
रमजान और होली जैसे पावन पर्व के बीच अमेरिका ने जिस तरह ईरान पर इज़राइल से हमला करवाया और खुद भी मैदान-ए-जंग में कूद पड़ा।यह एक भयावह दुखद संकेत था क्योंकि इज़राइल और फिलीस्तीन युद्ध के दौरान कम से कम रमजान माह का ख़्याल रखा जाकर युद्ध विराम की घोषणा की जाती थी। किंतु इस बार लगता है क्रूर और एपस्टीन फाइल में फंसे डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी अवाम के जबरदस्त प्रतिरोध से भयभीत होकर ईरान को रमजान के समय दबोचकर जो विजय हासिल की है। उससे अमेरिका की अवाम खुश हो जाएगी। लेकिन उससे दुनिया की आधी मुस्लिम आबादी को गहरा धक्का लगा है।ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत के पीछे ईरान के गद्दार रजा पहलवी का हाथ लगता है। क्योंकि पिछले दो सालों से वह अमेरिका के इशारों पर नाच कर जनता को खामेनेई के ख़िलाफ़ बरगला रहा था।ठीक वैनेजुएला की तरह जैसे वहां अमेरिका परस्त ग़द्दारों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति के निवास की पूरी जानकारी अमेरिका को पहुंचाई थी फलस्वरूप राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का अपहरण किया गया।आज वैनेजुएला के खनिज संसाधनों की लगाम अमेरिका के हाथों में हैं।सत्ता भी लगभग उनकी ही है।ईराक में भी यही हुआ। यहां तक कि ओसामा बिन लादेन के निवास का पता भी किसी पाकिस्तान के गद्दार से पाकर उसको मारा गया जिसकी लाश भी किसी को देखने नहीं मिली।
हमारे देश में भी रावण की हत्या और राम की विजय के पीछे भी उसके भाई विभीषण का हाथ था।यह मिथक आज के समय में फिर सक्रिय होता दिख रहा है। सामंतों के शासनकाल में यह सब होता रहा है। साम्राज्यवादीै ताकतें अब खनिज संसाधनों पर आधिपत्य जमाने बौराई हुई हैं।एक नया सामंतवाद सामने आ रहा है जो घर बैठे अपने विरोधियों को सत्ता से हटा अपने जासूसों का शासन स्थापित कर रहा है।तुर्रा यह कि वह किसी देश की सत्ता नहीं छीनता।
भारत देश भी उसी रास्ते पर अग्रसर होने की राह पर चलता दिख रहा है लेकिन यहां देश की सत्ता पर बने रहने की कुचेष्टा और कुटिलता से विपक्ष की आवाज रौंदने का काम चल रहा है। गांधी के हत्यारे संघ के अनुषंगी संगठन के लोग प्रतिपक्ष नेता की बढ़ती ताकत को देखते हुए उन्हें ख़त्म करने की धमकी दे चुके हैं। वे अपने बीच उभरते नेतृत्व के साथ ऐसा ही व्यवहार कर रहे हैं। ये लोकतंत्र के साथ छलावा है।
अफ़सोसनाक यह है कि हमारी सरकार का प्रगाढ़ रिश्ता उसी चंडाल राष्ट्रपति से है जिसका गहरा सम्बन्ध बदनाम मानव तस्कर, अय्याश एपस्टीन से रहा है। जिसके जाल में दुनिया के मशहूर चर्चित लोग हैं। अमरीका कई देशों को राख के ढेर में बदल कर पुनर्निर्माण और पुनर्वास की बात करते हुए अच्छा बनने की कोशिश करके शांति के नोबेल पुरस्कार की आकांक्षा रखता है।उसकी सेनाओं को भारत की तमाम जानकारियां दी जा रही हैं जो भविष्य में घातक हो सकती हैं।उसकी खुशी के लिए देश के उद्योग पति,मंत्री और साहिब खुद लगे हुए हैं।
क्योंकि जिस तरह से अमेरिका किसी भी राष्ट्र में अपने जासूस भेजकर राष्ट्र प्रमुखों की जासूसी वहां के लोगों से करवाके, अपने आप को दुनिया का डाॅन बनाता जा रहा है वह हमारे लिए भी ख़तरे का संकेत है। हमारी आर्थिक नीतियों और विदेश नीति को तहस-नहस करने के लिए यही शातिर दुर्दांत जिम्मेदार है यानि साहिब का दोस्त डोनाल्ड ट्रम्प।
। दुख इस बात का है के सरेंडर साहिब इज़राइल जाते हैं हा हा ही ही करते हैं गले लगते हैं। सम्मान देते हैं। चुम्बन लेते हैं उसी नेतान्याहू से ।जो फिलीस्तीन जैसे उस राष्ट्र के लाखों इंसानों का हत्यारा है। जिस देश ने यहूदियों को अपने देश में शरण दी थी।
खामनेई की शहादत से मुस्लिम देशों पर क्या कुछ असर होता है या नहीं।उन आठ मुस्लिम देशों को खामेनेई ने सबक सिखा दिया है जिनने अमरीका के आगे भारत की तरह सरेंडर नीति को अपना लिया था।खामेनेई की मौत के बाद पाकिस्तान, तुर्की ,ओमान, चीन खुलकर ईरान के साथ आ खड़े हुए हैं।कोरिया ,रुस भी सहयोग कर सकते हैं। लेकिन भारत के सरेंडर साहिब मौन है।
अपने पुराने मित्र राष्ट्र के लिए कुछ भी नहीं कहा है।इतना ही खामेनई की मौत पर शोक की घोषणा भी नहीं कर पा रहे हैं।जबकि इसके पूर्व उन्होंने बराबर ईरान के शोक में शामिल होकर राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है तथा झंडा झुकाया है।आज भारत की इस स्थिति के लिए अमेरिका जिम्मेदार है। दर्दनाक तो यह भी है कि साहिब जी अपने साथ गए पत्रकार दल को साथ में वापस भी नहीं लाए। इज़राइल में छोड़कर चल दिए।ऐसा कभी नहीं हुआ है। पत्रकार साथ जाते और लौटते थे।
बहरहाल अमेरिका ने इस बीच जो सात दिन ईरान पर हमले करने का जो ऐलान किया उसका सीधा मकसद खामनेई समर्थक लोगों का भी खात्मा करना है। शिया प्रधान इस देश से नफ़रत करने वाले सुन्नियों वाले देशों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है। क्योंकि जिस तरह से इस्लाम बढ़ रहा है उस पर अमेरिकी ईसाई संगठनों के साथ डोनाल्ड ट्रम्प की भी नज़र है। साथ ही साथ खनिज संसाधनों की लूट तो सबसे बड़ा उद्देश्य है ही।
इन भयावह घटनाओं का भारत के लिए सबक यही है कि घुसपैठियों के पीछे पड़ने की जगह यारी के नाम पर देश में घुसने वाले लोगों और देश में छुपे ग़द्दारों से देश को बचाएं।निज स्वार्थ के कारण देश को ख़तरे में डालना समझदारी नहीं होगी।
आईए ऐसे नेताओं को नज़रंदाज़ करें जो देश को बर्बादी की ओर लिए जा रहे हैं।
उधर ईरान में खामनेई के बेटे को यह पद देने की सहमति बन गई है।अब देखना यह है कि अमेरिका किस तरह उनके साथ व्यवहार करता है।यदि वह भी देश हित में अपने बलिदान का मार्ग प्रशस्त करता है और साम्राज्यवादी ताकतों को सबक सिखाता है तो एक ख़तरा बराबर बढ़ रहा है कि मध्यपूर्व देशों को निशाने पर लेकर कहीं यह तृतीय विश्व युद्ध को निमंत्रण तो नहीं दिया जा रहा है। ईरान की नई मिसालें सामने आना बाकी है। इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों की बर्बादी के बाद संभव है पेंटागन की सलाह पर युद्ध को विराम देकर अमेरिका अच्छा बनने की कोशिश कर सकता है और रमजान मुबारक भी कह सकता है।इससे ईरानी अवाम को ख़ुश करने में मदद मिल सकती है।

