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गाली उद्योग का स्वर्णिम भविष्य : एक व्यंग्यात्मक ब्लूप्रिंट

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(दो पात्रों – मयूर और मेहुल – के बीच संवाद पर आधारित व्यंग्य कथा)

–      तेजपाल सिंह ‘तेज’

          कॉफी हाउस की एक मेज पर दो पुराने मित्र बैठे हैं। चारों तरफ चाय की भाप, कॉफी की खुशबू और बातचीत का शोर है। लेकिन इन दोनों की बातचीत बाकी सब से अलग है। बाकी लोग महंगाई, शेयर बाज़ार और बॉलीवुड पर बात कर रहे हैं, जबकि ये दोनों दोस्त देश के सबसे अनसुने लेकिन “सबसे ज़रूरी” उद्योग की योजना बना रहे हैं –और वह है– गाली उद्योग

          ये गाली-गलौज का मामला पिछले दो दिनों से चल रहा है। उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें नया पेशा मिला है, नया कारोबार मिला है, सोचने का नया तरीका मिला है। मैंने कहा, क्या? उन्होंने कहा, हम यहाँ क्या कर रहे हैं, मीडिया में काम कर रहे हैं, साथ में चैनल चला रहे हैं।कुछ लोग देखते हैं, कुछ लोग नहीं देखते। इतना पैसा मिलना मुश्किल है, हमारा परिवार चलाना मुश्किल है। उसने कहा, छोड़ो ये सब। मैंने कहा, “आप क्या करना चाहते हैं?” उन्होंने कहा, “जिस तरह से गाली-गलौज और उसकी महिमा का बखान हो रहा है, हम एक गाली-गलौज संघ बनाने की सोच रहे हैं।” मैंने कहा, “क्या?” उन्होंने कहा, “गाली-गलौज संघ।” जैसे कई तरह के संघ होते हैं, जैसे भारतीय किसान संघ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

          एक वीडियों डिबेट का एक व्यंगात्मक पाठ है। इसको लेकर एक व्यंग्यात्मक  लेख लिखा गया है। सच मे यह गालियों के आधार पर एक नया और अजूबा लेख  है। और यह लेख  केवल दो व्यक्तियों के बीच संवाद की शैली में एक नूतनतम कहानी है।

मयूर: (मुस्कुराते हुए) मेहुल भाई, ये क्या अफ़वाह उड़ रही है कि आप एक नया संगठन बनाने का विचार कर रहे हैं?

मेहुल: (गंभीरता से) अफ़वाह नहीं भाई, सच्चाई है…सच्चाई। संगठन का नाम होगा – गाली विचार संघ” 

मयूर: (संगठन का नाम सुनकर मयूर जोरों से हँसने लगता है….फिर हँसी रोकते हुए) गाली और संघ? ये तो वही हुआ जैसे मलाई पर नमक डाल दिया जाए।

मेहुल: (आत्मविश्वास से) जब हर चीज़ का संघ हो सकता है – किसान संघ, व्यापारी संघ, यहाँ तक कि मच्छर भगाने वालों का संघ – तो गालियों का क्यों नहीं हो सकता? आखिर गालियाँ तो इस देश की “अनौपचारिक राष्ट्रीय भाषा”  हैं। और आजकल तो राजनीतिक क्षेत्र में भी इसका खासा व्यापार हो रहा है।

अध्याय 1: गाली उद्योग की परिकल्पना:

·         मेहुल का विचार: गाली विचार संघ 

·         गालियों का इतिहास – खेत-खलिहान से लेकर संसद तक।

·         समस्या: पुरानी गालियाँ बासी हो गई हैं।

·         समाधान: आधुनिकता और तकनीक से लैस गालियाँ।

मयूर: (कुर्सी पर आगे झुकते हुए) अच्छा, लेकिन गाली को संघ बनाने की ज़रूरत क्यों?

मेहुल: देखो, गालियों का इतिहास बड़ा पुराना है। खेत-खलिहान से लेकर संसद तक गालियाँ हमेशा साथ रही हैं। लेकिन दिक्कत ये है कि गालियाँ आज भी वही पुरानी हैं – माँ, बहन और शरीर के इर्द-गिर्द।

मयूर: (हँसते हुए) यानी आप कहना चाहते हो कि गालियाँ भी “आउटडेटेड” हो गई हैं?

मेहुल: बिल्कुल! जैसे टेक्नोलॉजी अपडेट होती है, वैसे ही गालियों को भी अपडेट करना होगा।

मयूर: (व्यंग्य से) यानी अब सॉफ़्टवेयर अपडेट के साथ-साथ गाली अपडेट भी आएगा? “Gaali version 2.0 available, click to download!”

मेहुल: (सिर हिलाकर) सही पकड़े हो। यही तो “गाली विचार संघ” की नींव है।

अध्याय 2: गाली का आधुनिकीकरण और श्रेणियाँ:

मेहुल: (गंभीर होकर) अब गालियों की क्लासिफिकेशन ज़रूरी है।

1.   सात्विक गालियाँ – उपवास और व्रत में काम आने वाली। जैसे – “तेरे बाप का केला”, “तेरी माँ का साबूदाना।”

2.   स्टेशनरी गालियाँ – ऑफिस और स्कूल वालों के लिए। “तेरे बाप की कलम”, “तेरी माँ का रबर”, “तेरी बहन का स्टेपलर।”

3.   डिजिटल गालियाँ – आईटी सेक्टर के लिए। “तेरी माँ का वाई-फाई”, “तेरे बाप का टूटा चार्जर”, “तेरी बहन का फेल्ड OTP।”

4.   राजनीतिक गालियाँ – खास नेताओं के लिए। “तेरे घोषणापत्र का आलू!”, “तेरी गठबंधन की दाल।”

5.   वैश्विक गालियाँ – एक्सपोर्ट क्वालिटी। अमेरिका में – “तेरे बाप का वाइट हाउस।” चीन में – “तेरे मोबाइल का नकली बैटरी।”

मयूर: (ठहाका लगाकर) वाह भाई वाह! ये तो ऑक्सफोर्ड गाली कोश तैयार हो जाएगा।

मेहुल: (सपनीली आँखों से) और हर साल “Word of the Year” की तरह “Gaali of the Year” चुनी जाएगी।

अध्याय 3: गाली उद्योग का व्यवसाय मॉडल:

मयूर: लेकिन इसमें पैसा कहाँ से आएगा?

मेहुल: (गिनते हुए) देखो –

मयूर: (तालियाँ बजाते हुए) वाह! ये तो GDP में भी योगदान देगा। (Gaali Domestic Product!)

अध्याय 4: गाली प्रशिक्षण और विश्वविद्यालय:

मेहुल: (और गंभीर होकर) अब सोचो – “राष्ट्रीय गाली संस्थान” बनेगा।

कोर्स:

Ø गाली 101 – बेसिक गालियाँ।

Ø advanced Abuses – उच्च स्तरीय गालिया

Ø Gaali Research Methodology – नई गालियाँ गढ़ने की कला।

परीक्षा:

Ø लिखित पेपर – गालियों का व्याकरण।

Ø मौखिक परीक्षा – इंटरव्यूअर को तुरंत गाली देनी होगी।

Ø प्रैक्टिकल – 2 मिनट में 10 गालियाँ सुनाओ।

मयूर: (हँसते-हँसते) तो फिर PhD भी होगी? “डॉक्टर ऑफ़ फिलॉसॉफ़ी इन प्रोफेशनल गालियाँ”

मेहुल: (गर्व से) हाँ, और थीसिस का टॉपिक होगा – “गालियों का तुलनात्मक अध्ययन: भोजपुरी बनाम हरियाणवी।”

अध्याय 5: गाली पुरस्कार और मान्यताएँ:

मेहुल: (उत्साह से) और फिर आएंगे पुरस्कार –

हर साल “गाली एक्सप्रेस अवॉर्ड नाइट” होगी। बड़े-बड़े सेलिब्रिटी मंच पर आकर लाइव गालियाँ देंगे।

मयूर: (ठिठोली से) यानी अवॉर्ड लेने वाला मंच पर आकर बोलेगा – “तुम सब … का धन्यवाद!”

मेहुल: (गंभीर होकर) बिल्कुल। तभी तो असली सम्मान लगेगा।

अध्याय 6: गाली और राजनीति

मेहुल: राजनीति से गालियों का गहरा रिश्ता होगा।

मयूर: (हँसते हुए) यानी लोकसभा TV का नाम बदलकर Gaali Sabha TV कर देंगे?

मेहुल: (मुस्कुराते हुए) हाँ, और TRP आकाश छू लेगी।

अध्याय 7: गाली का वैश्वीकरण:

मेहुल: अब गालियाँ सिर्फ़ लोकल नहीं रहेंगी।

मयूर: (व्यंग्य से) और ओलंपिक में भी नया खेल होगा – गाली थ्रोइंग

अध्याय 8: गाली नैतिक संहिता

मयूर: (गंभीर होकर) लेकिन क्या गालियों की भी आचार संहिता होगी?

मेहुल: हाँ, बिल्कुल।

मयूर: (व्यंग्य से) यानी ये भी ट्रैफिक नियमों जैसे होंगे – “जहाँ रेड लाइट, वहाँ गाली मत।”

अध्याय 9: भविष्य का सपना

मेहुल: (भावुक होकर) भविष्य दो तरह का हो सकता है –

मयूर: (सोच में) और आपको कौन-सा ज़्यादा संभव लगता है?

मेहुल: (ठहाका लगाते हुए) भाई, जब तक भूख, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार है, गालियों का भविष्य असीमित है।

सारांशत: कॉफ़ी ठंडी हो चुकी है। लेकिन बातचीत गर्म है।

मयूर: (मुस्कुराते हुए) मेहुल भाई, आप जो कह रहे हैं, सुनने में मज़ाक है। लेकिन इस देश में हर मज़ाक कभी न कभी हक़ीक़त बन जाता है।

मेहुल: (सिर हिलाते हुए) सही कहा। और जब हक़ीक़त मज़ाक जैसी लगे, तब समझ लो कि हम सचमुच भारत में हैं। दोनों ठहाका लगाते हैं।
पाठक सोच में पड़ जाता है – कहीं यह मज़ाक कल की हकीकत तो नहीं?

(संदर्भ :मयूर जानी ऑफिशियल https://youtu.be/yPsjPRBGiBo?si=Z8XU3mfmCUC4h-BQ)

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