दिव्या गुप्ता
_लोकप्रिय चिंतक ध्रुवगुप्त के शब्दों में कहें तो, मोक्ष अथवा ईश्वरीय प्रकाश से एकीकरण को मानव जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और लक्ष्य बताया गया है। जो धार्मिक है, उनके लिए मोक्ष का रास्ता भक्ति, भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ और कर्मकांडों से होकर जाता है। जो आध्यात्मिक है, उनका मोक्ष तक पहुंचने का साधन अनासक्ति, वैराग्य, योग, ध्यान और समाधि है।_
दोनों की दृष्टि में यह संसार मिथ्या है, अंधकार है जिसमें जाने कितनी सदियों, कितनी योनियों से हम भटक रहे हैं। मोक्ष इस मिथ्या संसार में आवागमन से मुक्ति है। यह जीवन के अस्वीकार का दर्शन है। ध्यान, समाधि, पूजा-पाठ मानसिक शांति और एकाग्रता तक के लिए तो ठीक है, लेकिन उनके माध्यम से अगर आप संसार का अतिक्रमण कर किसी काल्पनिक मोक्ष की तलाश में हैं तो यह आत्मरति के सिवा कुछ नहीं।
तमाम अस्तित्व, मोह-माया, बंधन, इच्छाओं, गति से परे कोई मोक्ष है तो वह शून्य की ही कोई स्थिति हो सकती है और कोई भी शून्य अस्तित्व या ऊर्जा के पूरी तरह नष्ट हो जाने से ही संभव है। ऊर्जा चाहे जीवन की हो या पदार्थ की, कभी नष्ट होती नहीं।
उसका रूपांतरण होता चलता है। हम ईश्वर या विराट ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अंश हैं। छोटी-छोटी ऊर्जाएं हैं जो रूप बदल-बदलकर इसी प्रकृति में बनी रहेंगी। अगला कोई जीवन हमें इस रूप में शायद नहीं मिले, लेकिन किसी न किसी रूप में मिलेगा जरूर। मोक्ष की अवधारणा जीवन से पलायन का धर्मसम्मत तरीका है।
मोक्ष की हमारी तलाश अगर कभी पूरी होनी है तो इसी जीवन में, इसी संसार में पूरी होनी है।
ईश्वर अथवा ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ ऐक्य दरअसल स्वयं को और अपने आसपास की चीजों को देखने, समझने की वह सहज,सरल और ममत्वपूर्ण दृष्टि है जिसे पूजा या योग से नहीं, गहरी संवेदना से हासिल किया जा सकता है।
उसे पाना है तो इस सोच को अपने भीतर गहरे उतारना होगा कि हम सब एक ही कॉस्मिक एनर्जी के अंश हैं और इसीलिए यह समूची सृष्टि हमारे परिवार का विस्तार है। सृष्टि से संपूर्ण तादात्म्य और उस एकत्व से उत्पन्न संवेदना, प्रेम और करुणा ही ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता है।
यह संसार माया या मिथ्या नहीं है। अगर ईश्वर सच है तो उसकी कृति मिथ्या कैसे हो सकती है ?
यही संसार हमारा घर है और यही गंतव्य।हमारी यह खूबसूरत प्रकृति ईश्वर की प्रतिच्छवि है। सूरज, चांद और तारों में उसका नूर है। फूलों पर उतरती किरणों में उसकी मुस्कान। बच्चों की हंसी में उसकी मासूमियत। स्त्रियों में उसकी कोमलता और ममत्व।
नदी, समुद्र, झरनों की गर्जना और पक्षियों के संगीत में उसका स्वर। बादलों में उसका वात्सल्य है। ओस की बूंदों में उसकी करुणा। प्रकृति से संपूर्ण सामंजस्य और उसकी संतानों के बीच परस्पर प्रेम और सहकार से ईश्वर का साक्षात्कार होता है। यही उपलब्धि स्वर्ग है, यही मोक्ष और यही निर्वाण।
इसे देखने और महसूस करने के लिए दुनिया भर के ज्ञान, धार्मिक कर्मकांड या देह को गला देनेवाली साधना की नहीं,छोटे बच्चों की चमकती आंखों और मासूम दिल की दरकार है।

