Site icon अग्नि आलोक

जायज़ है गुस्सा

Share

शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी मिलते ही धारा प्रवाह बोलने लगे।
मौजूदा स्थिति पर कटाक्ष करते हुए,सीतारामजी ने कहा,आज तो गुलशन को बाग़वान ही उजाड़ रहा है।
सीतारामजी बहुत ही आवेश में आकार बाल कवि बैरागीजी की कविता की चुनिंदा पंक्तियां सुनने लगे।
उन भंँवरों के पंख नोच लो, जिनने बाग उजाड़े हों
उस माली को माफी मत दो, जिसने गंध चुराई हो
जिसके होते हर क्यारी में नागफनी उग आई हो
माली को परखा जाता है, बेमौसम पतझारों में

मैने सीतारामजी से कहा,आवेश में मत आइए,क्रोध सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है।
सीतारामजी ने कहा अब शांत बैठने का समय नहीं हैं। इसका अहम कारण बयां होता है, शायर अफ़ज़ल मिनहास रचित इस शेर में है।
जिन पत्थरों को हमने अता की थीं धड़कने
उन को जबां मिली तो हमीं पे बरस पड़े

अपनी बात को जारी रखते हुए सीतारामजी ने कहा, “काल” ने अमृत को गरल में बदल दिया है।
वक्तव्य को अनवरत रखते हुए सीतारामजी को शायर दुष्यंत कुमार का यह शेर याद आया।
मैं बे-पनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं

तमाशबीन, कहने सीतारामजी का आशय लापरवाह होने से है।
इस मुद्दे पर व्यंग्य करते हुए,
सीतारामजी ने शायर अकबर इलाहाबादी का शेर सुनाया।
क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ

मैने सीतारामजी से कहा आपके व्यंग्य से लोग बख़ूबी जानते हैं।
आपके वक्तव्य से सभी समझ जाएंगे।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Exit mobile version