डॉ. नीलम ज्योति
सृष्टि के निर्माण के लिए, शिव ने अपनी शक्ति को स्वयं से अलग किया। शिव स्वयं पुरूष लिंग के द्योतक हैं तथा उनकी शक्ति योनि की|_
पुरुष (शिव) एवं स्त्री (शक्ति) का एकाकार होने के कारण शिव नर भी हैं और नारी भी. अतः वे अर्धनारीश्वर कहलाते हैं।
पौराणिक आख्यान के अनुसार ब्रह्मा जी ने सृष्टि को बनाने का कार्य आरंभ किया तब उन्होंने पाया कि उनकी रचनाएँ अपने एक निश्चित समय तक जीवन जीने के बाद स्वयं नष्ट हो जाएंगी. हर बार उन्हें नए सिरे से फिर से सृष्टि का निर्माण करना पड़ेगा|
उस समय तक सृष्टि में स्त्री का निर्माण नहीं हुआ था. ब्रह्मा नारी को प्रकट करने में असमर्थ थे. जब वे इस विषय में काफी सोच विचार करने के बाद भी किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाए; तब अपनी समस्या के समाधान के लिए वे शिव की शरण में आये।
ब्रह्माजी की समस्या के सामाधान हेतु शिव अर्धनारीश्वर स्वरूप में प्रकट हुए। वे आधे भाग में शिव थे, तथा आधे में शक्ति|
इस अर्धनारीश्वर रूप में शिवजी ने ब्रह्माजी को मैथुनी सृष्टि का रहस्य समझाने के लिए अपने शरीर में स्थित शक्ति के अंश को पृथक कर दिया|
अब उनके शरीर से नर और नारी भाग अलग हो गये। बाद मे उनकी इसी मैथुनी सृष्टि से संसार की वृद्धि तेजी से हुई। नर और नारी की इसी ऊर्जा का मिलन सभी सृजन का आधार है।
शिव और शक्ति का संबंध- शक्ति , शिव की अविभाज्य अंग हैं। शिव नर के स्वरूप हैं तो शक्ति नारी की। दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं।
शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
शिव अकर्ता हैं। वो संकल्प मात्र करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी करती हैं| शिव कारण हैं; शक्ति कारक। शिव संकल्प करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी। शक्ति जागृत अवस्था हैं; शिव सुसुप्तावस्था।
अर्धनारीश्वर का स्तर अर्जित किये बिना अद्वैत फलित नहीं होता. आप अपूर्ण और खंडित रह जाते हैं. जन्म-मृत्यु के चक्कर का यही कारण है.
अर्धनरीश्वर की अवस्था में आपका ही आधा व्यक्तित्व आपकी पत्नी और आपका ही आधा व्यक्तित्व आपका पति हो जाता है। आपकी ही आधी ऊर्जा नारी और आधी पुरुष हो जाती है।
तब इन दोनों के बीच जो रस और लीनता पैदा होती है , उस शक्ति का कहीं कोई विसर्जन नहीं होता, वो अमर होती है।
बायोलाजिस्ट के अनुसार , हर व्यक्ति दोनों है – हर व्यक्ति बाई सेक्सुअल है। वह आधा पुरुष है , आधा स्त्री है। और होना भी चाहिए , क्योंकि आप पैदा एक स्त्री और एक पुरुष के मिलन से ही तो हुए हैं।
तो आधे – आधे आपको होना ही चाहिए। अगर आप सिर्फ मां से पैदा हुए होते , तो स्त्री होते ; सिर्फ पिता से पैदा हुए होते , तो पुरुष होते। लेकिन आप में पचास प्रतिशत आपके पिता और पचास प्रतिशत आपकी मां के गुण मौजूद है। तो आप आधे – आधे होंगे ही – अर्धनारीश्वर होंगे।
जीवविज्ञान ने तो अब खोजा है इधर पचास वर्षों में , लेकिन हमने अर्धनारीश्वर के स्वरूप में , आज से कम से कम पचास हजार साल पहले , इस धारणा को स्थापित कर दिया। यह धारणा किसी योगी के अनुभव के आधार पर खोजी गई है।
कोई भी ध्यान योगी जब भीतर लीन होता है , तब पाता है कि मैं दोनों हूं – प्रकृति भी और पुरुष भी ; मुझमें दोनों मिल रहे हैं ; मेरा पुरुष मेरी प्रकृति में लीन हो रहा है ; मेरी प्रकृति मेरे पुरुष से मिल रही है ; उनका आलिंगन अबाध चल रहा है।
मनोवैज्ञानिक भी कहते हैं कि आप आधे पुरुष हैं और आधे स्त्री। आपका चेतन पुरुष है , आपका अचेतन स्त्री है। अगर आपका चेतन स्त्री का है , तो आपका अचेतन पुरुष है। जगत द्वंद्व से निर्मित है , इसलिए आप दो होंगे ही।
आप बाहर खोज रहे हैं स्त्री को , क्योंकि आपको भीतर की स्त्री का पता नहीं। आप बाहर खोज रहे हैं पुरुष को , क्योंकि आपको भीतर के पुरुष का पता नहीं।
आपके पास , सबके पास , एक ब्लू प्रिंट है। वह आप जन्म से लेकर घूम रहे हैं। इसलिए आपको कितनी ही सुंदर स्त्री मिल जाए , कितना ही सुंदर पुरुष मिल जाए , थोड़े दिन में बेचैनी शुरू हो जाती है। लगता है कि बात बन नहीं रही।
जो प्रतिमा आप भीतर लिए हैं , वैसी प्रतिमा समान स्त्री/पुरुष आपको मिले , तो तृप्ति हो सकती है। इसके लिए आपको अपने ही बॉडी पार्टनर को उसी रूप मे लेकर उससे अद्वैत बनना होगा.
अर्द्धनारीश्वर हम सभी में विराजमान हैं|जरूरत है अपने भीतर तलाशने की, क्योंकि जब तक आप अपने भीतर के उस स्त्री या पुरुष को महसूस नहीं कर पाएंगे , आप किसी भी प्रेम संबंध में खुश नहीं रह पाएंगे.
[लेखिका चेतना विकास मिशन की प्रबंधिका हैं.)

