Site icon अग्नि आलोक

क्या नक्सलवाद से लड़ाई के नाम पर फ़र्ज़ी एनकाउंटर, बलात्कार, ग्रामीणों पर हमले आदि सब जायज़ हैं?

Share

अजय असुर

छत्तीसगढ़ के बस्तर के जंगलों में पुलिस/सेना कैम्प क्यूँ? आखिर क्या है इन जंगलो में जो लाखों सैनिक तैनात हैं! निश्चित ही कुछ बड़ा हो रहा है इन जंगलो में। इस पर शासक वर्ग ने बाकायदा प्रोपगेंडा फैला रखा है और बगैर सोचे हम मान भी लेते हैं कि ये सेना-पुलिस के जवान नक्सलियों और मावोवादियो से निपटने के लिए हैं। तो तकरीबन पिछले 50 साल से ये सेना-पुलिस के जवान कर क्या रहें हैं? यदि पिछले 50 सालों में इन नक्सलियों/मावोवादीयों को नहीं खत्म कर पाए तो निश्चित ही कुछ गड़बड़ है। ये कैसी लड़ाई है कि देश की इतनी बड़ी सेना चंद नक्सलियों/मावोवादीयों को खत्म नहीं कर पा रही है? तो फिर निश्चित ही भारतीय सेना निकम्मी है। और सरहद पर दूसरे देश जैसे चीन और पाकिस्तान की लाखों की सेना और हमसे उनके उन्नत हथियारों से कैसे लड़ेगी? यंहा जंगलो में तो मुट्ठी भर नक्सलियों/मावोवादीयों से नहीं निपट पा रही है। असल में ये शासक वर्ग नक्सलियों/मावोवादीयों के नाम पर अपने सेना/पुलिस के जवानों को तैनात कर रखा है कि कोई भी उन जंगलो में जा ना पाए और जंगलो में खान-खदानों से अडानी, अम्बानी आदि पूंजीपतियों के द्वारा जो खनिज निकालने का जो खेल चल रहा है वो छुपा रहे, कोई जान ना पाए। और इसीका विरोध ये आदिवासी कर रहें हैं, इन आदिवासीयों का कहना है कि इन प्राकृतिक संपदाओं पर उनका हक है और हम इनको लूटने नहीं देंगे पर शासक वर्ग नए और उन्नत हथियारों के बल पर अपने सेना/पुलिस के जरिए लगातार देश की प्राकृतिक संपदा का दोहन कर अपना जेब भर रही है और जब ये आदिवासी इसका विरोध करते हैं तो इनकी सेना/पुलिस इनको नक्सली/मावोवादी घोषित कर इनको मार दे रही है और हमारे अन्दर नक्सलियों/मावोवादीयों के नाम पर राष्ट्रवाद की इतनी नफरत भर दी गयी है कि हमें भी लगता है कि सब सही हो रहा है।
शासक वर्ग ने आदिवासियो को, भेड़-बकरी समझ रखा है, इसलिए जब ये लोग अपने मानवाधिकार, अपने सम्मान, जंगल के संपदा की व अपने हक की बात करते हैं तो गाजर-मूली की तरह काटना शुरू करना कर देता है ये शासक वर्ग। अभी कुछ दिन पहले बस्तर में जब शासक वर्ग की पुलिस/सेना कैम्प के लिए जंगल से पेड़ काटना शुरू किया बगैर किसी भी आदिवासी से बात किए और जब इसका विरोध आदिवासियो ने किया तो उनको नक्सली/मावोवादी कहकर इन आदिवासियों के छोटे मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा और कुछ को गोली से मार दिया और कुछ को लाठी-डंडो से कुचल दिया। अक्सर इनकी बहू बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार तक करते हैं। यह बर्बरता, बेहसीपन और इन आदिवासीयों का इस बर्बरता के खिलाफ अहिंसक प्रदर्शन जो मानवाधिकार की बात करने वाले,  बुद्धजीवियों, विकासपुरुषो, राष्ट्र भक्तों को नहीं दिखता, जो किसी भी जानवर के उत्पीड़न पर हल्ला मचाने लगते हैं और जीवों की दया की बात करते हैं, जो हर चीज में मानवाधिकार को घुसेड़ देते हैं और मानवाधिकार की दुहाई देते फिरते हैं ऐसे लोगों को अब नहीं दिख रहा है। दिखेगा भी कैसे? इन आदिवासियों को तो देश के दोयम दर्जे के नागरिक का दर्जा दिया है शासक वर्ग ने। कोई राष्ट्रीय मुद्दा हो ही नहीं सकता क्योंकि बस्तर के जंगलों में जो रहते हैं और विशेषकर जो अपने हक की आवाज उठाते हैं वो नक्सली/मावोवादी घोषित कर दिए गए हैं। और हम बगैर सोचे-समझे सब ठीक मान लेते हैं।
आदिवासी अहिंसक रूप से आंदोलन कर रहा है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आदिवासियों पर हो रहे हैं शासकीय अत्याचारों के खिलाफ हजारों की संख्या में आदिवासी ग्रामीण सड़कों पर उतर आए हैं और शांति तरीके से आंदोलन कर रहे हैं। यह खबर मुख्यधारा के मीडिया में कहीं नहीं दिखाई दे रहा है। इधर इस घटना के बाद आज पूरे बस्तर के आदिवासी एकजुट होकर आंदोलन कर रहे हैं। और इन आदिवासियो का आन्दोलन लगातार बढ़ता जा रहा है और ये आन्दोलन पूरी तरह से अहिंसक आन्दोलन है। इस पर न कोई मीडिया कवरेज कर रही है, न कोई गैर संगठन, न मानवाधिकार, जल, जंगल, ज़मीन की लड़ाई व आदिवासी समाज की जब बात आती है, तो कई संगठन के मुंह पर ताला लग जाता है। 
नक्सलबाड़ी आन्दोलन के बाद से ही छत्तीसगढ़ के बस्तर में चाहे जिसकी भी सरकार रही हो सबने केन्द्र सरकार से सांठ-गांठ कर इन आदिवासीयों का हमेशा से शोषण और दमन किया है नक्सली/मावोवादी के नाम पर। जब इन लोगों को लगा कि कांग्रेस हमारा दमन-शोषण कर रही है तो अब भाजपा को लाना चहिए फिर वही दमन-शोषण जब भाजपा ने शुरू किया तो फिर लोगों को लगा कि इससे तो अच्छी कांग्रेस सरकार थी दोबारा उसको लाना चहिए तो फिर कांग्रेस आयी और अब कांग्रेस केन्द्र की भाजपा की सरकार से सांठ-गांठ कर आदिवासियों का दमन-शोषण कर रही है। तो अब देखें कोंग्रेस भी वही कर रही है जो भाजपा करती आ रही थी और उससे पहले कांग्रेस करती आ रही थी। बारी-बारी से जिसको भी मौका मिलता है वो इन आदिवासियों का दमन-शोषण कर खनिज सम्पदा की लूट से नहीं चुकते। भाजपा और कोंग्रेस एक है। दोनो ही ए ही सिक्के के दो पहलू हैं। हम सभी और आदिवासी समाज के लोग जरा खुद से से आत्मचिंतन कर सवाल करे कि आप जिस पार्टी का झण्डा ढो रहे है या जिस भी पार्टी के समर्थक हैं वह पार्टी आदिवासियों के साथ क्या कर रही है? क्या वाकई ये लोग गरीबी, भ्रष्टाचार, महंगाई जनता के खिलाफ बढ़ा रहें हैं या घटा रहें हैं?
निश्चित ही आदिवासीयों का ये विरोध प्रदर्शन अहिंसक है और यदि अपने हक के लिए आवाज उठाने पर जब इन आदिवासियों का दमन-शोषण किया जाता है, तब ये आदिवासी अपने वा अपने परिवार की रक्षा के लिए इन आदिवासी लोगों का हथियार उठाना गलत व नाजायज है तो जो तथाकथित बाहुबली लोग जब अपनी ऐयाशी और गरीबों के शोषण के लिए हथियार उठाना कैसे जायज? ये सामन्त लोग जब हथियार उठाते हैं तो बाहुबली कहलाते हैं और वंही दूसरी तरफ अपनी और जंगल की रक्षा के लिए हथियार उठाते हैं तो नक्सली और मावोवादी कहलाते हैं! इतना दोगलापन कंहा से लाते हैं ये तथाकथित राष्ट्रभक्त। 
*अजय असुर**राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा उ. प्र

Exit mobile version