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क्या बड़ी कंपनियां मनमानी कीमतों से उठा रहीं फायदा

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आनंद प्रधान

टमाटर और दूसरी सब्जियों के साथ अरहर दाल और अन्य खाद्य वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों के कारण ज्यादातर मध्यमवर्गीय परिवारों में रसोई का बजट और मुंह का स्वाद बिगड़ा हुआ है। लेकिन सरकार और रिजर्व बैंक महंगाई को काबू में करने के दावे करते हुए अपनी पीठ थपथपाने में लगे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, महंगाई की दर में लगातार गिरावट आ रही है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित महंगाई की दर इस साल अप्रैल के 4.70 फीसदी और मार्च के 5.66 फीसदी की तुलना में मई में गिरकर 4.25 फीसदी रह गई।

नजर क्यों नहीं आती

लेकिन फिर आम लोगों की रसोई का बजट क्यों बिगड़ा हुआ है? उन्हें महंगाई में आई कमी क्यों नहीं महसूस हो रही है? इसकी कई वजहें हैं।

बहरहाल, सवाल यह है कि रिजर्व बैंक की कोशिशों के बावजूद महंगाई काबू में क्यों नहीं आ रही है? आखिर इस महंगाई के लिए कौन जिम्मेदार है? रिजर्व बैंक और बहुतेरे अर्थशास्त्री इसके लिए मुख्यतः वैश्विक कारणों को जिम्मेदार मानते हैं।

इसके उलट कई अर्थशास्त्री मौजूदा महंगाई को कुछ बड़ी कंपनियों के वैश्विक और घरेलू बाजार में बढ़ते दबदबे और कीमतों को प्रभावित करने की उनकी ताकत का नतीजा मानते हैं। उनके मुताबिक, बड़ी कंपनियां ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए मौके खासकर आपूर्ति में बाधा और उसके कारण मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी के संकेतों का बेजा फायदा उठा रही हैं। इसलिए इस महंगाई को वे ग्रीडफ्लेशन या लालचस्फीति कह रहे हैं। इस साल मार्च में रिजर्व बैंक के पूर्व डेप्युटी गवर्नर और जाने-माने अर्थशास्त्री विरल आचार्य ने एनएससी-न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी कॉन्फ्रेंस में पढ़े अपने एक शोधपत्र में कहा था कि भारत में पांच बड़ी कंपनियों की बाजार में अपने उत्पादों की कीमत तय करने की बढ़ती ताकत के कारण महंगाई बेकाबू बनी हुई है। आचार्य के मुताबिक, इन पांच कंपनियों का बाजार में इस कदर दबदबा है कि वे अपने उत्पादों की कीमत अपने प्रतियोगियों की तुलना में ज्यादा रख रही हैं। हालांकि कई भारतीय अर्थशास्त्री प्रो. विरल आचार्य के तर्कों से सहमत नहीं हैं। लेकिन जाने-माने अमेरिकी अर्थशास्त्री नौरिएल रोबिनी ने भी एक लेख में कहा था कि भारत में कुछ बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ रहा है, जिससे बाजार में ओलिगोपोली (अल्पाधिकार) की स्थिति बन रही है। इस समय यह बहस दुनिया भर में चल रही है। चर्चित पत्रिका ‘इकॉनमिस्ट’ ने अपने ताजा अंक में विकसित पश्चिमी देशों में मुद्रास्फीति की ऊंची दरों के लिए कॉरपोरेट लालच और मौजूदा महंगाई को लालचस्फीति (ग्रीडफ्लेशन) बताने को ‘बकवास’ कहा है। लेकिन वैश्विक खाद्यान्न व्यापार से लेकर पेट्रोलियम कार्टेल तक, हर जगह मुट्ठी भर कंपनियों का दबदबा है, जो कोविड महामारी से लेकर यूक्रेन-रूस युद्ध तक हर मौके का इस्तेमाल छप्परफाड़ मुनाफ़े के लिए कर रही हैं। कुछ उदाहरण गौर करने लायक हैं।

बढ़ रही मनमानी

घरेलू भारतीय बाजार में खाद्यान्न, सब्जी-फल, दूध आदि के भंडारण, थोक और खुदरा कारोबार में चंद बड़ी कंपनियों की घुसपैठ के बाद कीमतों को मनमाने तरीके से निर्धारित करने में उनकी भूमिका बढ़ती जा रही है। कई मामलों में कीमतों में गिरावट को आम उपभोक्ताओं तक पहुंचने से भी ये कंपनियां रोक रही हैं। महंगाई को काबू में करना है तो इसे अनदेखा करने या नकारने के बजाय रेग्युलेट करने पर ध्यान देना होगा।

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