– प्रियांशु कुमार
आज की डिजिटल दुनिया में Gen-Z सबसे अधिक तेजी से बदलते तकनीकी माहौल के बीच जी रही है। अगर किसी युवा से पूछा जाए कि वह अपना खाली समय कैसे बिताता है, तो अधिकतर उत्तर यही मिलता है कि वह रील्स या शॉर्ट्स देखता है। यह सरल-सा लगने वाला उत्तर एक गहरी समस्या का संकेत है—वह यह कि शॉर्ट वीडियो सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि युवाओं के जीवन और मनोविज्ञान में स्थायी रूप से जगह बना चुके हैं। प्रश्न यह है कि कुछ सेकंड की इन वीडियो ने युवाओं की आदतों और ध्यान क्षमता पर इतना प्रभाव कैसे डाल दिया?
दरअसल Gen-Z की जिंदगी तेजी से भागती दुनिया के बीच निरंतर दबावों से घिरी हुई है। पढ़ाई, करियर, प्रतिस्पर्धा और परिवारिक अपेक्षाओं के बीच वास्तविक बातचीत और सामाजिक संपर्क के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। ऐसे में सोशल मीडिया युवाओं के लिए एक नई सामाजिक जगह बनकर उभरता है, जहाँ उन्हें लाइक्स, कमेंट्स और शेयर के रूप में तुरंत डोपामाइन मिलता है। यह क्षणिक खुशी उन्हें बार-बार उसी स्क्रीन की ओर खींचती है, क्योंकि हर बार उन्हें नई उत्सुकता, नई ऊर्जा और नया उत्साह मिलता है।
शॉर्ट वीडियो की सबसे बड़ी ताकत उसका तेज़ी से बदलने वाला स्वरूप है। हर सेकंड नया दृश्य, नई आवाज़, नया मज़ाक या नई जानकारी मिल जाती है, जिससे दिमाग़ लगातार उत्तेजित रहता है। यह उत्तेजना धीरे-धीरे आदत का रूप ले लेती है और परिणाम यह होता है कि दिमाग़ एक ही चीज़ पर लंबे समय तक टिकने की क्षमता खोने लगता है। यही कारण है कि जब वही युवा कोई 10–15 मिनट का वीडियो देखता है या किसी गहन विषय पर ध्यान लगाने की कोशिश करता है, तो उसका मन बेचैन हो उठता है। वह स्क्रीन पर आगे बढ़ाने के लिए टैप करता है और चाहता है कि जल्दी-से-जल्दी कुछ नया देखने को मिले।
इसके अतिरिक्त FOMO यानी “Fear of Missing Out” भी Gen-Z के मन पर गहरी पकड़ बनाए हुए है। उन्हें लगता है कि कोई नया पोस्ट, नया ट्रेंड, नया फोन या नया अपडेट कहीं उनसे छूट न जाए। इस डर के कारण वे दिन में कई बार सोशल मीडिया खोलते हैं, सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे किसी चीज़ में पीछे नहीं रह गए हैं। धीरे-धीरे यह आदत उन्हें वास्तविक दुनिया से दूर और स्क्रीन की दुनिया में अधिक गहराई तक खींच लेती है, जहाँ शॉर्ट्स उनका एस्केप बन जाते हैं—थोड़े पल की राहत, थोड़ी देर की हँसी और थोड़ी देर के लिए चिंता से दूरी।
लेकिन यह आदत लंबे समय में कई समस्याओं को जन्म दे सकती है। शॉर्ट्स की अधिकता ध्यान क्षमता को घटा देती है, दिमाग़ को गहराई से सोचने की आदत से दूर कर देती है और वास्तविक रिश्तों को प्रभावित करती है। यह लोगों को “तुरंत खुशी पाने वाली पीढ़ी” में बदलने लगता है, जहाँ धैर्य, गहराई और स्थिरता जैसी चीज़ें कम होती जाती हैं। कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि 70% युवा प्रतिदिन 2–3 घंटे सिर्फ शॉर्ट वीडियो स्क्रॉल करते हैं, जो आने वाली सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियों की चेतावनी है।
इस समस्या का समाधान असंभव नहीं है, बल्कि इसके लिए थोड़ी-सी जागरूकता और आदतों में बदलाव की आवश्यकता है। डिजिटल डिटॉक्स, लंबे कंटेंट देखने की आदत, वास्तविक बातचीत को प्राथमिकता देना और मनोरंजन तथा लत के बीच की सीमाओं को समझना—ये सभी कदम युवाओं को फिर से संतुलित जीवन की ओर ले जा सकते हैं।
अंततः प्रश्न यही है कि यदि हमारी नई पीढ़ी का ध्यान, धैर्य और मननशीलता लगातार कम होती रहे, तो समाज किस दिशा में जाएगा? यह सवाल हमें अभी पूछना चाहिए, क्योंकि भविष्य को सही रास्ता देने की जिम्मेदारी आज के ही निर्णयों पर निर्भर करती है।
छात्र महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय,वर्धा।

