डॉ. विकास मानव
जीवन में सुख और दुःख, दोनों आते हैं। सुख में हम सुखी और दुःख में दुःखी होते हैं। संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, जिसे सुख की चाह नहीं, सुख की कामना नहीं। परंतु फिर भी संसार में ऐसे अगणित लोग हैं, जो हमेशा दुःख से पीड़ित, परेशान रहते हैं और स्वयं के दुःख के लिए औरों को जिम्मेदार ठहराते हैं।
यदि अमुक व्यक्ति नहीं होता तो आज मेरी यह दशा न होती। यदि कुछ समय बाद वहाँ जाता तो आज मैं दुःखी न होता, आदि अगणित विचार मन में उगते-डूबते रहते हैं।

कभी लगता है कि मनचाही वस्तु, व्यक्ति के प्राप्त होते ही मैं सुखी हो जाता, परंतु सच तो यह है कि यदि सचमुच ऐसा होता तो संसार में साधनसंपन्न व्यक्ति कभी दुःखी न होते। इस प्रकार हम अपनी वर्तमान स्थिति के लिए सदा दूसरों को दोष देते हैं। किसी अन्य वस्तु, व्यक्ति, स्थान, समय व परिस्थिति को जिम्मेदार ठहराते हैं।
दुःख के कारणों को स्वयं में नहीं, बल्कि दूसरों में ढूँढ़ते फिरते रहते हैं और इस प्रकार जीवन में फिर से एक नए दुःख का आगमन होता है; और यह क्रम सदा चलता ही रहता है।
कस्तूरी मृग नाभि बसै, मृग ढूँढे वन माहि।
वास्तव में कस्तूरी तो मृग की नाभि में ही स्थित है, पर इस सत्य से अनभिज्ञ मृग उस कस्तूरी की खोज में वन-वन भटकता फिरता है और खुद को और भी दुःखी करता है। वैसे ही दुःख के कारण तो हम स्वयं हैं, परंतु इस सत्य को स्वीकार करने का हममें न तो बोध है, ना ही साहस।
पलायनवादी सोच और स्वयं का दोष दूसरों पर मढ़ने की कला में हम माहिर जो हैं। सत्य तो यह है कि स्वयं के अलावा संसार की, ब्रह्मांड की समस्त शक्तियाँ मिलकर भी हमें सुखी या दुःखी नहीं कर सकतीं।
काहु न कोई सुख दुःख कर दाता।
निज कृत करम भोग सब भ्राता।।
अर्थात कोई भी किसी को सुख-दुःख देने वाला नहीं है, बल्कि स्वयं के द्वारा किए गए कर्मों का भोग ही सुख-दुःख के रूप में व्यक्ति को प्राप्त होता है। अतः हमारे सुख-दुःख के लिए कोई और नहीं; बल्कि हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय’।
कभी-कभी तो हम व्यक्ति, समाज के साथ-साथ भगवान को भी अपने दुःखों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं, परंतु वास्तव में हमारे सुख- दुःख में भगवान की कोई भूमिका नहीं होती।
जद्यपि सम नहिं राग न रोषू।
गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू ॥
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फल चाखा ॥
अर्थात भगवान का किसी के प्रति न राग है, न रोष। वे किसी का पाप-पुण्य और गुण-दोष ग्रहण नहीं करते। उन्होंने विश्व में कर्म को ही प्रधान बना रखा है। जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल चखता है। अतः स्पष्ट है कि हमने स्वयं ही अपने कर्मों से सुख अथवा दुःख की दुनिया अपने लिए रची है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
अर्थात हमारी स्वतंत्रता कर्म करने में है, उसके फल में नहीं। कभी तो हम सोचते हैं कि हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि अमुक व्यक्ति हमें सबके सामने अपमानित कर रहा है। इसमें हमारी कोई भूमिका नहीं है। फिर भला हम स्वयं अपने इस दुःख, अपमान का कारण कैसे हो सकते हैं?
तात्कालिक रूप में हमारा यह तर्क उचित प्रतीत होता है; क्योंकि हम कर्म की गहन गति से बिलकुल अनजान व अनभिज्ञ होते हैं। परिणामस्वरूप बड़े विद्वान व ज्ञानी व्यक्ति भी कर्मबंधन में फँस जाते हैं व जन्म-जन्मांतरों तक मुक्त नहीं हो पाते।
हमारे द्वारा किए गए कर्मों का प्रभाव हमारे चित्त में अंकित होता रहता है। इसे ही कर्मसंस्कार या कर्मबीज कहा गया है। परिपक्व होने पर इनका प्रभाव, असर हमारे जीवन में प्रकट होता रहता है।
वह कर्म, जो हमने अतीत में किया है और जिसका बीज हमारे चित्त में अंकित है, वह संचित कर्म है। हमारा चित्त कई जन्मों के संचित कर्मों का भांडागार है। जो कर्म हम वर्तमान में कर रहे हैं, उनका फल हमें भविष्य में प्राप्त होने ही वाला है। इसे ही क्रियमाण कर्म कहा गया है। जब संचित कर्म परिपक्व होने पर अभिव्यक्त होता है तो उसे ही प्रारब्ध कर्म कहते हैं।
प्रारब्ध कर्म के बीज हमारे चित्त में कामना, वासना व संस्कार के रूप में संचित रहते हैं। ऐसे कर्म एक समय परिपाक होकर, प्रबल बनकर हमारे सामने प्रकट होते हैं। सुख-दुःख, भाग्य, सफलता- असफलता आदि के पीछे ये प्रारब्ध कर्म ही कारण रूप में रहते हैं।
अतः हम जो आज हैं, वह हमारे अतीत में किए गए कर्मों का ही परिणाम है और भविष्य में हम जो भी होंगे, जिस स्थिति में होंगे, वह हमारे वर्तमान में किए गए कर्मों का ही परिणाम होगा। आज हम दुःख या सुख, जिस भी स्थिति में हैं, वह अतीत में किए गए हमारे कर्मों का ही परिणाम है।
अतः कर्मफलविधान एवं कर्म की इस गहन गति के आलोक में जब हम अपनी वर्तमान स्थिति एवं अतीत में किए गए कर्मों का सम्यक दर्शन करते हैं तब हम न सिर्फ अपनी वर्तमान स्थिति के लिए स्वयं को ही कारण के रूप में खड़ा पाते हैं, बल्कि इस आत्मनिरीक्षण, आत्मविश्लेषण व आत्मसाक्षात्कार के द्वारा अपने जीवन के गुलशन को दुःख के काँटों से सदा-सदा के लिए मुक्त कर लेने की कला भी सीख लेते हैं।
फिर यहीं से एक नई जीवन-दृष्टि एवं स्वयं के लिए एक नई दुनिया की सृष्टि होने लगती है। फिर यहीं से आरंभ होता है- उमंग, उल्लास व आनंद से भरे एक नए जीवन का। सोऽहम् शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् के मधुर संगीत से सने एक नए विहान का।
तब खेल वही होता है, व्यक्ति, वस्तु, परिस्थितियाँ वही होते हैं, परंतु खिलाड़ी बदल चुका होता है। दृश्य वही होता है, पर दर्शक, द्रष्टा में बदल जाता है। द्रष्टा – शरीर व मन के पार जा आत्मानंद में स्थित है। यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंधन से छूटने का उपाय है।
तब हानि-लाभ, सुख-दुःख, मान-अपमान सब में समभाव व समत्व की स्थिति जान पड़ती है। तब कर्मों में कोई आसक्ति नहीं रहती और हर कर्म निष्काम कर्म होता है। ऐसे में कर्मबीज, कर्मबंधन में बँधने की संभावना कहाँ रहती है ? तब सारे बंधन तोड़ कर, व्यक्ति योगी बन जाता है।
*आपसे दूर जा रही ऊर्जा को कैसे रोकें?*
आम तौर पर, ऊर्जा आपसे दूर जा रही है – दुनिया में, चीजों में, लक्ष्यों की ओर। ऊर्जा आपसे दूर जा रही है, इसलिए आप खालीपन महसूस करते हैं।
ऊर्जा चली जाती है, कभी वापस नहीं आती; आप ऊर्जा को फेंकते रहते हो। धीरे-धीरे आप हताश, हताश महसूस करते हैं। कुछ भी वापस नहीं आता। धीरे-धीरे आप खालीपन महसूस करने लगते हैं।
ऊर्जा हर दिन बाहर निकल रही है – और फिर मृत्यु आती है। मृत्यु और कुछ नहीं बल्कि यह है कि आप थक चुके हैं और ऊर्जविहीन हो चुके हैं।
तो बाहर बहती हुई ऊर्जा को वापस घर की ओर मोड़ना है। यह केवल एक मोड़ है। ऐसा नहीं है कि इसके लिए आप दुनिया छोड़ दो। बस ‘ध्यान’ साधना से स्वयं को जोड़ लो.
आप संसार में ही रहते हैं – कुछ भी छोड़ने या कहीं और जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप दुनिया में ही रहते हैं, लेकिन बिल्कुल अलग तरीके से।
अब आप संसार में रहते हैं लेकिन आप स्वयं में केन्द्रित रहते हैं; आपकी ऊर्जा आपके पास लौटती रहती है।
अब आप बाहर जाने वाले नहीं हैं: आप अंदर जाने वाले हो गए हैं। निःसंदेह आप ऊर्जा का एक पूल, एक भंडार बन जाते हैं, और ऊर्जा आनंद है, पूर्ण आनंद है।
वहां बस ऊर्जा उमड़ रही है, और आप आनंद में हैं, और अब आप अपनी ऊर्जा को साझा कर सकते हैं, और आप सब को प्रेम दे सकते हैं।
आप जहां भी जाएं, जो कुछ भी करें, हमेशा आंतरिक प्रकाश में, जागरूकता के साथ करें। ध्यान का अर्थ ही यही है – अधिक सतर्क होना। वैसा ही जीवन जियो, बस अपनी सतर्कता बदलो – इसे और अधिक तीव्र बनाओ।
पहले जैसा ही खाना खाएं, पहले जैसे ही रास्ते पर चलें, पहले जैसे ही घर में रहें, पहले जैसे ही पत्नी और बच्चों के साथ रहें, लेकिन अपने अंदर से बिल्कुल अलग रहें। सतर्क रहे! उसी रास्ते पर चलें, लेकिन जागरूकता के साथ।
यदि आप जागरूक हो जाते हैं, तो अचानक मार्ग वही नहीं रह जाता, क्योंकि आप अब पहले जैसे नहीं रह जाते। यदि आप जागरूक हैं, तो पहले जैसा ही भोजन अब पहले जैसा नहीं है, क्योंकि आप अब पहले जैसे नहीं हैं। आपके आंतरिक परिवर्तन से सब कुछ बदल जाता है।
अगर कोई अपने भीतर बदलता है, तो बाहर भी पूरी तरह बदल जाता है। दुनिया की मेरी परिभाषा यह है – आप गहरे आंतरिक अंधकार में रह रहे होंगे, इसलिए दुनिया।
यदि आप अपने भीतर का दीपक जलाते हैं, तो अचानक संसार गायब हो जाता है, और केवल परमात्मा रह जाता है। पूरी बात आपकी आंतरिक जागरूकता या अनभिज्ञता पर निर्भर करती है। यही एकमात्र परिवर्तन, एकमात्र परिवर्तन, एकमात्र क्रांति है, जिसे करना होगा।