शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी सन 1960 में प्रदर्शित फिल्म बरसात की रात के गीत की निम्न पंक्तियां गुनगुना रहे थे।
गीत लिखा है गीतकार साहिर लुधियानवी ने।
नाज़-ओ-अंदाज़ से कहते हैं कि जीना होगा
ज़हर भी देते हैं तो कहते हैं कि पीना होगा
जब मैं पीता हूँ तो कहतें है कि मरता भी नहीं
जब मैं मरता हूँ तो कहते हैं कि जीना होगा
मैने सीतारामजी से पूछा उक्त पंक्तियों को स्मरण करने की कोई खास वजह?
सीतारामजी मेरा प्रश्न सुनकर नाराज होकर कहने लगे, मेरी स्मृति कभी भी मलिन नहीं होती है। आज देश के आम आदमी,निम्न मध्यम,और मध्यम वर्ग की स्थिति हुबहू उक्त पंक्तियों जैसी ही है।
मैने कहा आप सिर्फ और सिर्फ उपहास ही उड़ाते हो। आपको कोई अच्छे काम दिखते ही नहीं है। देश के अस्सी करोड़ लोगों को पांच किलो अनाज मुफ्त मिल रहा है।
देश के छोटे छोटे मंदिरों को विशाल का
कॉरिडोर में तब्दील किया जा रहा है।
सीतारामजी ने कहा हां यह सच है,
इनदिनों मुफ्त बांटो अभियान की प्रतिस्पर्धा चल रही है।
इस अभियान की प्रतिस्पर्धा में ना तो शक्कर है,ना गुड ना तिल्ली ना ही घी है। फिर भी इस मुफ्त बांटो अभियान को रेवड़ी का विशेषण दिया गया है।
मैने कहा आप कितने भी व्यंग्य करों,आपको यह बात तो माननी ही पड़ेगी कि, अपने देशी की सभी सियासी दल और दलों के तमाम नेता ईमानदार है,और तकरीबन सभी भ्रष्टाचार के घोर विरोधी हैं? सभी नेता जनता की भलाई चाहते हैं?
सीतारामजी ने कहा हां यह भी कह दो सभी धार्मिक आस्थावान भी हैं? रेवड़ियां बांटते समय यही कहते होंगे तेरा तुझको अर्पण
इतना कहते हुए सीतारामजी ने मुझ से पूछा? आपने देश की आर्थिक राजधानी मतलब फिल्मी नगरी में देखा,गो पालक गाय को लेकर चौराहे के किनारे बैठते हैं या गाय को लेकर दुकानों में घूमते है,साथ में पोटली में बांध कर घांस लेकर चलते हैं।
गाय, गो पालक की घांस उसी की सिर्फ खरीदना आपको और गो पालक की गाय को खिलाना है,और आपको ही पुण्य कमाना हैं।
इसी तरह की रेवड़ियां है।
कुछ परिपक्व राजनेता इस कहावत को चरितार्थ करते हैं।
अंधा बांटे रेवड़ी अपने अपनो ही को दे
सीतारामजी ने अंत में किसी शायर का ये शेर सुना दिया।
तेरे महलों में हजारों चराग़ जलते हैं
ये मेरा घर है,यहाँ दिल के दाग़ जलते हैं
शशिकांत गुप्ते इंदौर

