शशिकांत गुप्ते
आज सुबह सीतारामजी ने कॉल कर मुझे घर बुलाया। मै तुरंत उनके घर पहुँचा।
मै सीतारामजी के घर गया तो देखा सीतारामजी का सुपुत्र तल्लीन होकर हारमोनियम पर सुरताल में भजन गा रहा था।
(फ़िल्म पुरानी नागिन (1954) गीतकार राजेद्रकृष्णजी
इस भजन रूपी गीत के बोल हैं।
काशी देखी, मथुरा देखी, देखे तीरथ सारे
कहीं न मन का मीत मिला तो आया तेरे द्वारे
तेरे द्वार खड़ा एक जोगी
ना माँगे यह सोना चाँदी, माँगे दर्शन देवी
इस गीत आगे आगे बंद इस प्रकार है।
करके जतन आया, मन में अगन लाया
अंखियों में दर्शन-प्यास
प्रीत की भीक्षा,प्रेम की दीक्षा
माँग रहा यह दास
मैने उसे रोकने का प्रयत्न किया। उसने मुझे गर्दन झुकाकर सांकेतिक नमस्ते किया।
वह गातें हुए थोड़ा रुका और एक घुट पानी पिया,उसी समय मैने उसे गाने से रोकते हुए कहा, मेरी बात तो सुनो।
वह मुस्कुराया और पुनः शुरू हो गया।
एक के बाद एक भजन गाने लग गया।
1)मुझे अपनी शरण में ले लो राम
२)ओ दुनिया के रखवाले
3)मन रे तू काहे को धीर धरे
मन तड़पत हरि दर्शन को आज
4)दूसरों के दुःखडे दूर करने वाले
बगैर रुके एक क बाद एक भजन गाता रहा।
सीतारामजी और उनकी पत्नी बहुत व्यथित थे।
मैने पूछा यह सब क्या, कैसे,क्यों हो रहा है? यह बालक तो अत्याधुनिक तकनीकी पढ़ाई कर रहा है। यह तो अपने विषय में अनुसंधान कर रहा है?
सीतारामजी ने कहा हाँ हाँ यह सब कर रहा है। लेकिन अब कहता है कि, पढ़ाई छोड़ देगा।
पढ़ाई में कुछ भी रखा नहीं है।
मैने कहा विस्तार से बताओं आपके सुपुत्र में एकदम परिवर्तन कैसे हो गया?
सीतारामजी ने कहा जब से इसने खबर पढ़ी भगवान का दिव्यभव्य मंदिर बन रहा है। वह भी करोड़ो की लागत से बन रहा है। और देश के अन्य शहरों में भी मंदिरों का स्वरूप विशाल बनेगा।
यह सब ज्ञात होने के बाद बालक कहता है कि, अब भजन गा कर लोगों में धार्मिक आस्था जागृत करने के अभियान में सक्रिय हो जाऊंगा।
आधुनिक युग में धार्मिक लोग फ़िल्मी भजन सुनकर प्रसन्न होंगें।
फिल्मी गीतों की पैरोडी बनाकर भजन लिखूंगा और गाऊंगा।
भजन मंडली के साथ देश के हर नगर, शहर में भजन के प्रोग्राम कर करूंगा। अच्छीखासी कमाई हो जाएगी।
उसने तो पवित्र रंग के कपड़े भी बनवा लिए हैं। भीक्षापात्र के साथ पेटीएम, फोन पे और गूगल पर भी भीक्षा ग्रहण कर लेगा।
मैने कहा जब आस्था जागृत हो जाती है तो फिर, कुछ नहीं कर सकतें हैं।
इनदिनों आस्था आहत होती है तो, आधुनिक रूप से सामुहिक तांडव नृत्य होने लगता है?
सावधान,खबरदार, सब भगवान पर छोड़ देना ही समझदारी है।
आस्था तो कानून से भी बहुत ऊपर है?
शशिकांत गुप्ते इंदौर

