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ध्यान के माध्यम से पुनर्जन्म के प्रमाण का पहलू

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डॉ. विकास मानव

_आप ध्यान के माध्यम से अपने पूर्वजन्म का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। योगदर्शन में इस संदर्भ में दो सूत्र हैं :_

(1).
अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्ता- सम्बोध:।” (2.39)
अर्थात् जब योगी सांसारिक सुख, सुविधा, भोगों सम्बन्धी संसाधनों के संग्रह ( परिग्रह) की प्रवृत्ति को त्याग देता है / अपरिग्रह में स्थिर हो जाता है ; ” सामान सौ- सौ वर्ष का, पल की ख़बर नहीं ” जैसे विचारों में निमग्न हो जाता है , तब उसे जन्म की कथा / कथन्ता ( कथं = क्यों, कैसे सम्बन्धी भाव) का सम्यक ज्ञान हो जाता है। मैं कौन था ? मैं कैसा था ? यह शरीर क्या है ? यह कैसे हुआ है ? हम कौन होंगे , कैसे होंगे ? इत्यादि भूत ,वर्तमान ,भविष्यत जन्म सम्बन्धी ज्ञान हो जाता है। यह अपरिग्रह जन्य सिद्धि है।

(2)
“संस्कार- साक्षात्करणात्- पूर्व जातिज्ञानम्।” (3.18)
अर्थात् ध्यान द्वारा संस्कारों का साक्षात्कार करके योगी ” पूर्वजन्म का ज्ञान ” प्राप्त कर लेता है। इस संदर्भ में किंवदन्ती है कि जैगीषव्य ऋषि ने दस महाकल्पों ( सृष्टिकाल ) में हुए अपने जन्मों का ज्ञान प्राप्त किया। इन जन्मों में उन्होंने नारकीय पशु- पक्षी – कीट योनियों में भी जन्म लिया।

आत्मा अपने पूर्व-जन्मों के कर्मों, संस्कारों , वासनाओं के अनुरूप जन्म लेता है । इस लिए संस्कारों पर ध्यान लगाने से पूर्व जन्म का ज्ञान तर्क संगत है।
आधुनिक रिग्रेशन ध्यान ( Regression Meditation) द्वारा पूर्वजन्म का ज्ञान ( Retrocognition) इसी संस्कार साक्षात्कार प्रक्रिया पर आधारित है।
ऋषि जैगीषव्य के अतिरिक्त , महात्मा बुद्ध के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने 500 पूर्वजन्मों का साक्षात्कार किया था। उनके कई पूर्वजन्मों के वृत्तांत ” जातक ” कथाओं में वर्णित हैं।
डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् गीता के 4.3 श्लोक की व्याख्या में सद्धर्मपुण्डरीक ( 15.1) को उद्धृत करते हैं : ” बुद्ध का दावा था कि वे बीते हुए युगों में असंख्य बोद्धिसत्त्वों के गुरु रह चुके हैं।”

योगीराज श्रीकृष्ण भी गीता (4.5) में अपने जन्मों के विषय में अर्जुन से कहते हैं :
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ पर॔तप।।

अर्थात् हे अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत जन्म बीत चुके हैं । मैं उन सबको जानता हूं, तू नहीं जानता।

जिन अन्वेक्षकों ने पुनर्जन्म में गवेषणापूर्ण कार्य किया है, उन्हें ऐसे भी दृष्टान्त मिले हैं कि कुछ व्यक्ति जिन्होंने किसी विदेशी भाषा का अध्ययन नहीं किया, ध्यानावस्था या मूर्छित अवस्था में विदेशी भाषा के गद्यांशों व पद्यांशों का अनुवाद किया। डॉ. नेविल विमां ने एक निरक्षर जार्ज वेलिन्टाईन पर परीक्षण किया जिसने ध्यानावस्था में संस्कृत, अरबी, फारसी, ग्रीक, चीनी भाषाओं में लिखित पद्यांशों का अनुवाद किया।
कहा जाता है कि कन्फ्यूशियस नामधारी आत्मा उस में आकर ये भाषाएं बोलती थी। इसका A.W. Osborne द्वारा लिखित पुस्तक The Superphysical में वर्णन है।
इसी प्रकार एक आंग्ल कन्या रोज़मेरी ने प्राचीन मिस्री भाषा हिरियोग्लिफिक्स ( Hieroglyphs) की ध्वनियाँ निश्वस्त कीं जिसके आधार पर हार्वड वुड ने रोज़मेरी मिस्री शब्दावली ( Rosemary Egypitian Dictionary) तैयार की।

ओसबार्न अपनी पुस्तक ‘सुपर फिजि़कल’ में लिखते हैं :
“डॉ. वुड का विचार है कि अभी तक प्रकाशित प्रमाणों में यह घटना आत्मा की अमरता का सबसे प्रभावशाली अनुमानित प्रमाण है।”
एक अन्य आंग्ल स्त्री मूर्छावस्था में किसी व्यक्ति के रूप में मध्यकाल की नॉरविजियन भाषा बोलती थी । डॉ. इयन स्टीवेन्सन का विचार है कि इन दृष्टान्तों से दो ही नतीजे निकल सकते हैं — या तो किसी दिवंगत व्यक्ति की आत्मा इनमें आती थी या यह पुनर्जन्म का उदाहरण है।

वैसे तो ये पुनर्जन्म के उदाहरण ही लगते हैं, अगर यह भी मान लिया जाए कि किसी अन्य व्यक्ति की आत्मा इनमें आकर विदेशी भाषा बोलती थी, तो भी यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि दिवंगत आत्मा इस प्रकार के संस्कार या भाषा-स्मृति धारण कर सकती है।
सैद्धान्तिक रूप में इस सम्भावना के सिद्ध होने पर, पूर्वजन्म की स्मृतियों का कभी-कभी उभर आना भी सम्भव हो जाता है।
आधुनिक युग में परामनोवैज्ञानिकों ने ध्यान द्वारा पूर्व जन्म ज्ञान की नई पद्धति निकाली है जिसे रिग्रेशन ध्यान ( Regression Meditation) कहा जाता है। इसमें परामनोवैज्ञानिक की सहायता से व्यक्ति ( Subject ) को उसके जीवन की पिछली घटनाओं के बारे ध्यान करने और अभिव्यक्त करने को कहा जाता है।
इस प्रक्रिया में वह पूर्वजन्म में पहुंच जाता है। इससे पूर्वजन्म की कई बीमारियों का पता चलता है जो इस जन्म में उसे व्यथित कर रही होती हैं। इससे उसकी उस बिमारी से राहत मिलने का दावा किया जाता है । इसे रिग्रेशन थैरेपी कहा जाता है।
डां ब्रियान वेस ( Brian Weiss ) ने अपने इन अनुभवों पर आधारित एक पुस्तक Many Lives Many Masters ( अनेक जीवन अनेक स्वामी ) लिखी है, जिसमें एक ही व्यक्ति को अनेकों पूर्वजन्मों की स्मृति/ अनुभूति होती है।
पूर्वजन्मों की स्मृति एक वैज्ञानिक अनुसंधानों द्वारा प्रमाणित सत्य है। ये स्मृतियां पुनर्जन्म की सत्यता, आत्मा की अमरता, कर्म सिद्धान्त की व्यवहारिकता तथा ईश्वर की सत्ता को सिद्ध करती हैं।
…………. …
Footnotes :

1) Dr. Frederick Wood considers that this case provides the strongest inference of immortality hitherto published in evidential form.”
— Dr. A.W. Osborne ( The Superphysical )

2) ” From these instances, there could be two inferences: either the spirit of a deceased person gripped these persons or these are cases of reincarnation.”
— Ian Stevenson

3). ” There where about a dozen settings.The self- styled Confucius was very regular. Fourteen foreign languages were used in these tweve seatings.These included Chinese , Hindi, Persion , Sanskrit, Arabic, Portuguese , Italian, German and Greek.”
— The Superphysical : A.W. Osbourne
{निःशुल्क सुलभ लेखक ध्यान प्रशिक्षक एवं चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं और व्हाट्सप्प 9997741245 पर उपलब्ध हैं)

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