रमाशंकर सिंह
कल इतने ऊँचे पुल के उद्घाटन के समय सिवाय सुरक्षा कर्मियों और एएनआई के कैमरामैन के अलावा कोई न था लेकिन हौसला और चित्र इतिहास में इतिहास बनाने की ललक भी कमाल की है भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री की कि हर बार की तरह झंडा सँभाला और फहराते हुये चले गये और फिर लौट कर आये।
पता नहीं पुलों सुरंगो के उद्घाटन के अवसर पर क्या हो जाता है प्रधानमन्त्री को कि साधारण इंसान नाम का कोई होता नहीं पर हाथ ऐसे हिलाते हैं कि जबरदस्त भीड़ को देख कर कोई नेता उत्साहित होता है! यह समझ में न आने वाली बात है ।
आज ४७वॉं दिन है , पहलगाम के मृतकों के घर परिवार वाले , अस्पताल में पड़े घायल और पहलगाम की सिंदूरभूमि प्रतीक्षा कर रही है ! करती रहे , कर तो मणिपुर भी दो ढाई साल से कर रहा है !
जनता के पैसे से भेजी गयी सर्वदलीय संसदीय मंडलियों से दुनिया भर में एक ही सवाल पूछा कि इस बार सुबूत क्या है आपके पास पाकिस्तान के खिलाफ लेकिन आज तक डेढ़ महीनें में हमारे जासूस पहलगाम साज़िश और पाकिस्तान के हाथ होने का सुबूत नहीं ढूंढ पाये और न ही सुरक्षा कर्मी पहलगाम के हत्यारों को !
सांसद देश के नाम पर दुनिया घूम आये लेकिन हासिल कुछ नहीं हुआ । सत्ताधीशों से मिल भी नहीं पायीं
ये कमेटियॉं ! बैठे बिठाये हमने पाकिस्तान जैसे चिरकुट को स्कोरिंग प्वाइंट दे दिया विदेशों में । कनाडा में जी -७ बैठक में निमंत्रण पाने के लिये विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने खूब दौड़ धूप की , सिफारिशें भिड़ाईं तब जाकर न्यौता मिला। ऐसे न्यौते का क्या मतलब जो इतनी जुगाड़ से मिला हो ? कभी ठंडे दिमाग से कोई सोचेगा कि भारत नाम की कोई भूमि है राष्ट्र है जिसका हित सर्वोपरि है न कि किसी व्यक्ति का पद पर बने रहना ।

