– वीरेंद्र भदौरिया
मध्यप्रदेश को भारत और भोपाल को मध्यप्रदेश का दिल कहा जाता है। इसी भोपाल के रिहायशी इलाके बावड़िया कला के ‘सहयोग परिसर’ की इन दिनों बहुत चर्चा है।
जैसे हालात सुधरने के लक्षण देखकर कर्फ्यू में ढील दी जाती है, वैसे ही मध्यप्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के ट्रांसफर पर लगी पाबंदी में ढील दी जाती है। अमूमन हर साल मई-जून के महीने में सीमित अवधि के लिए स्थानांतरण पर लगी रोक हटाई जाती है,व सरकार द्वारा बनाई गई ट्रांसफर पालिसी के हिसाब से सीमित संख्या में ट्रांसफर अनुमन्य होते हैं। ट्रांसफर में ढील की अवधि में मंत्रियों के बंगले में खूब चहल-पहल रहती है,जो स्वाभाविक ही है। जहां गुड़ होगा वहीं मक्खियां भिनभिनाती हैं।

ट्रांसफर एक वार्षिक कर्मकांड है, इसमें नया कुछ नहीं भी नहीं है,पर इस साल जो नया या अनूठा हुआ, आगे उसको दिल थाम कर सुनिएगा।
इस साल मई जून में ट्रांसफर में ढील दी गई,सो जो होना था वह थोड़ा बहुत सभी विभागों में हुआ,पर सरकारी खजाने में सबसे ज्यादा योगदान करने वाले विभाग में जो कुछ हुआ, उसे ‘न भूतो न भविष्यत’ श्रेणी का कहा जा सकता है। वैसे भूतकाल की तो गारंटी है,पर भविष्य की गारंटी कैसे ली जा सकती है, जन्म-जन्मांतर की तपस्या के पुण्य फल से भविष्य में इनसे भी अधिक दिव्य शक्तियां लेकर कोई दूसरा ओएसडी भी अवतरित हो सकता है।
हुआ यूं कि विभाग के मंत्री जिन्होंने देश की सेना और संपूर्ण जनता को मोदीजी के चरणों में नतमस्तक कराने की असफल कोशिश करके मध्यप्रदेश की जग हंसाई कराई थी,वे खुद दो वेदों के पारंगत अपने दिव्य शक्ति संपन्न ओसडी के श्रीचरणों में लोट गए।ओएसडी महोदय उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत प्रोफेसर रहे हैं, तथा एक बार सत्ता के गलियारे में घुसपैठ बनाने के बाद विद्यार्थियों पढ़ाने के अलावा सब काम करते हैं।
जानकारों का कहना है कि इस परम ज्ञानी ओएसडी के रहते माननीय मंत्री जी को किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं पड़ी। अनेक सालों से ओएसडी का खेल सफलतापूर्वक चल रहा था,सीधे सादे मंत्री जी कमाऊ ओएसडी के परफार्मेंस से पूर्ण संतुष्ट हैं, ऐसा संतोषी मंत्री भी केवल मध्यप्रदेश में ही हो सकता है। आपका ओएसडी वर्षों से विभाग को चौपट कर रहा है, विभाग की महत्वपूर्ण विंग वर्षों से महज इसलिए पूरी तरह निष्क्रिय है, क्योंकि आपके ओएसडी ने मोटी मोटी रकम लेकर जिन लोगों को पदस्थ करवा दिया है, उनसे कर-चोरी की जांच पड़ताल करने की हिम्मत आयुक्त भी नहीं जुटा पा रहे हैं, इक्का-दुक्का जांचें हुईं भी तो ओएसडी साहब भोपाल में बैठकर हस्तक्षेप व सौदेबाजी करने लगते हैं, परिणामस्वरूप मध्यप्रदेश में कर चोरों की चांदी हो रही है तथा उनके सामने प्रतिस्पर्धा में टिक न पाने से ईमानदार कारोबारियों का धंधा चौपट हो रहा है। यदि आपको अपने ओएसडी के कारनामों की जानकारी नहीं है,तो यह किसकी कमजोरी मानी जाएगी?
नौकरी में रहते तक वे औपचारिक तौर पर ओएसडी बने रहे, लोग बताते हैं कि मंत्री जी तो नाम के मंत्री थे, असली ताकत तो ओएसडी साहब के पास ही थी, सौभाग्यवश रिटायर होने के बाद भी मंत्री जी पर उनकी कृपा पूर्ववत बरकरार है। हां नाश पिटे, नामुराद कांग्रेसियों के ऐतराज व हो-हल्ले के बाद मंत्री जी का बंगला छोड़कर सरकारी अधिकारियों के सहयोग के लिए सहयोग परिसर को उन्होंने अपना ठिकाना बना लिया है।
कहने वाले कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद ओएसडी साहब ने बचे हुए दो वेद पढ़ डाले और इस साल वह कारनामा कर दिखाया जो लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू के खौफ से नौकरी में रहते नहीं कर पाए थे। इस बार उन्होंने खुल कर बैटिंग की क्योंकि आऊट होने का अब कोई चांस ही न था।
टैक्स कलेक्शन वाले विभाग में औसतन पांच फीसदी जोड़ तोड़ वाले अफसर पाए जाते हैं, जिनके मध्य कमाऊ पोस्टिंग वाली सीमित सीटों पर कब्जे के लिए असीमित प्रतिस्पर्धा होने लगी है। राजस्व संग्रहण से जुड़ा विभाग होने तथा मुख्यालय भोपाल से बाहर होने से आईएएस अधिकारी अमूमन इस विभाग की जिम्मेदारी लेने से कतराते हैं। पर इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो इस विभाग में अब तक एक से बढ़कर एक बेहद दक्ष, परिश्रमी और ईमानदार आईएएस बतौर मुखिया पदस्थ होते रहे हैं, तथा वे कर-चोरी रोकने के अति महत्वपूर्ण कार्य के लिए काबिल व अच्छी छवि के अफसरों की अपनी पसंद की टीम बनाने के लिए स्वतंत्र हुआ करते थे, कमोबेश अधिकांशतः पूर्ववर्ती मंत्री अपवादस्वरूप मामूली एडजेस्टमेंट के साथ इस काम में उनको पूरी छूट देते रहे हैं, लेकिन मौजूदा मंत्री खासतौर उनके दिव्य शक्ति संपन्न ओएसडी (अब कहने के लिए पूर्व लेकिन पहले से अधिक पावरफुल) के सत्ता संभालने के बाद विभाग का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। अब कर-चोरी की रोकथाम के लिए गठित विंग में पोस्टिंग के लिए बोली लगनी शुरू हो गई है। इस साल अब तक की हाईएस्ट बोली लगने की बातें आम चर्चा का विषय बन चुकी हैं।
सीमित सीटों की खुली नीलामी तक तो भी गनीमत थी,पर दिव्य शक्ति संपन्न पूर्व ओएसडी ने इस ट्रांसफर सत्र में वह कारनामा कर दिखाया जो किसी भी सरकारी महकमे में आज तक कोई नहीं कर पाया, उसने राज्य,संभाग व सर्कल स्तर पर बाकायदा ट्रांसफर एजेंसी खोल दी,यह काम उसने अपने भरोसेमंद विभागीय अधिकारियों को ही सौंपा, उन एजेंटों ने पूरी तत्परता से काम को अंजाम तक पहुंचाया। पांच फीसदी अफसरान को छोड़कर बाकी अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिहाज से जरूर इंदौर भोपाल शहर की चाहत रखते हैं, वरना जहां पोस्टिंग होती है, वहां राम जी की गाय बनकर चुपचाप चले जाते हैं, उनकी काबिलियत पहचान कर विभाग प्रमुख भले महत्वपूर्ण जगह के लिए भले उनकी अनुशंसा कर दें, लेकिन वे खुद अपनी तरफ से किसी जुगाड़ के चक्कर में नहीं पड़ते हैं,इनका कोई धनी धोरी नहीं रहता है, लेकिन इस साल वे भी ब्लैकमेलिंग के शिकार होकर लुट पिट गये, इंस्पेक्टर से ज्वाइंट कमिश्नर रैंक तक के ऐसे सभी अनिच्छुक व उदासीन अधिकारियों को भी ,जिनका ट्रांसफर ड्यू भी नहीं था,को उक्त एजेंटों के माध्यम से फोन कर डरवाया गया कि, आपका स्थानांतरण बहुत दूर (भिंड, मुरैना, शिवपुरी, झाबुआ,मंडला, खरगौन इत्यादि) होने जा रहा है, रूकवाना हो या मनचाहा शहर लेना हो तो फलां से बात कर लें।
भोपाल के सहयोग परिसर में अपने सहयोग के लिए दिव्य शक्ति जी ने अन्यत्र पदस्थ दो अधिकारियों को भी बुलवा लिया, तीनों ने ऐसा जाल फैलाया कि ब्लैकमेलिंग के शिकार बने 90 फीसदी अधिकारी उनके झांसे में आकर लुट गये। सहयोग परिसर में बैठे व आने जाने वाले विभागीय अधिकारियों और दिव्य शक्ति जी के मोबाईल से उन दिनों की उनकी लोकेशन निकाल कर यह पूंछा जाना चाहिए कि वे बिना अनुमति लिए अपना मुख्यालय छोड़कर, भोपाल व सहयोग परिसर में क्या कर रहे थे? मुख्य एजेंट, सहायक एजेंट व उप एजेंटों के नाम विभाग में सबकी जुबान पर हैं, भरोसे में लेकर पूंछा जाएगा तो सब उगल देंगे।
यदि सरकार सचमुच पूरे खेल को उजागर करना चाहें तो पुख्ता सबूत इकट्ठा करना मुश्किल काम नहीं है। यह तो आन रिकॉर्ड मिल जाएगा कि विभागीय आयुक्त और पीएस की ओर से मंत्री जी की ओर अनुमोदनार्थ कौन सी सूची भेजी गई थी, और मंत्री जी द्वारा उसमें कौन से बदलाव और किस आधार पर बदलाव किए गए? माननीय मंत्री जी को भी यह बताना चाहिए कि रिटायरमेंट के बाद भी उनका पूर्व ओएसडी किसकी अनुमति व सहमति से न सिर्फ अभी भी आपके सरकारी कामकाज देख रहा है, अपितु सहयोग परिसर में ट्रांसफर की मंडी लगाए हुए था?
हालांकि विभाग के प्रमुख सचिव और आयुक्त ने साहस का परिचय देते हुए मंत्री जी का पूरा खेल खराब कर दिया है, हो सकता है इस साहस का खामियाजा भी भुगतना पड़े, लेकिन आपके साहस को सैल्यूट तो बनता है, वरना आजकल ब्यूरोक्रेसी में साहस बचा ही कहां है?
अब दिव्य शक्ति छिपे छिपे घूम रहा है,रकम वापसी का दबाव बढ़ता जा रहा है, लेकिन वह गायब हो गया तो कोई उसका क्या बिगाड़ लेगा? शायद यही सोचकर उसने लंबा हाथ मारने की जुर्रत की है।
व्यक्तिगत तौर पर मैं कह सकता हूं कि पीएस और कमिश्नर दोनों साफ सुथरी छवि वाले बेहद ईमानदार अधिकारी हैं, लेकिन आप दोनों सब कुछ जानते हुए भी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, होने योग्य ट्रांसफर भी नहीं हुए,जो थोड़े बहुत हुए भी उसमें विसंगतियों की भरमार है, जिसकी जगह दूसरे को लाया गया,उसको वहीं का वहीं बने रहने दिया गया,ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ।आपके विभाग में लंबे समय से खुले तौर पर यह खेल चल रहा था, और आप लोग खामोश व निष्क्रिय बने रहे। पूर्व में आपके विभाग में कई ऐसे आयुक्त और पीएस भी पदस्थ रहे हैं, जिनके खौफ से अधिकारियों को सिफारिशी पत्र लिखवाने या विभागीय मंत्री के बंगले पर जाने से डर लगता था, मंत्री और उनके दिव्य शक्ति की मंशा पर पानी फेरकर आप भले संतुष्ट हो लें, लेकिन आप लोग विभाग में अनुशासनहीनता को रोकने की दिशा में कोई कारगर उपाय न करने के आरोप से बच नहीं सकते हैं।