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*जागृत हो सहभावना*

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शशिकांत गुप्ते

प्रसिद्धि गीतकार स्व.नीरज रचित मुक्तक का स्मरण हुआ।
छेड़ने पर मौन भी वाचाल हो जाता है, दोस्त !
टूटने पर आईना भी काल हो जाता है, दोस्त !
मत करो ज़्यादा हवन तुम आदमी के ख़ून से
जल के काला कोयला भी लाल हो जाता है दोस्त !

उक्त मुक्तक की हर एक पंक्ति मानवीय संवेदनाओं झकझोर ती है। इसीलिए कहा गया है,साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं,मानव का पथ प्रदर्शक है।
भौतिकवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण मानव में संवेदनाएं क्षीण होते जा रही है। भौतिकवादी मानसिकता मानव को स्वार्थ की धुरी पर ही घूमने के लिए मजबूर करती है।
भौतिकवाद के पनप से संवेदनाओं को दरकिनार कर,संवेदनाओं की जगह एक शब्द practical का प्रयोग हो रहा है। यहां practical से तात्पर्य है,अपने कर्तव्य सिर्फ औपचारिक रूप से निर्वाह करना। सरल भाषा में समझने के लिए formality निभाना।
नीरज जी निम्न पंक्तियां संवेदनाओं को जागृत करने का संदेश देती है।
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।

संवेदनाएं जागृत होने के लिए आदमी को इंसान बनाना जरूरी है। संवेदनाएं क्षीण होने का कारण क्या है,इस संदर्भ में नीरज जी की यह रचना सटीक है।
बन गए हुक्काम वे सब जोकि बेईमान थे,
हो गए लीडर की दुम जो कल तलक दरबान थे,
मेरे मालिक ! और भी तो सब हैं सुखी तेरे यहाँ,
सिर्फ़ वे ही हैं दुखी जो कुछ न बस इंसान थे।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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