हमें आदिवासियों के घर उजड़ने और उनके विस्थापन की कहानियां सुनाने की इतनी आदत हो गई है कि अब हमें गरीब हिन्दुओं के घर छिनने पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जिनके घर उजाड़ गए हैं उनकी आह भी दब जाती है। वो आवाज़ भी नहीं उठा सकते, नहीं तो उनको भी हिन्दू विरोधी करार कर दिया जायेगा। गोदी मीडिया आपको दिखा रही है कि सब कुशल मंगल है राम की नगरी में, लेकिन जो बेघर हो गए उनका दर्द इस हर्षो- उल्लास में गुम कर दिया गया है।विहिप राम मंदिर के नाम पर वर्षो से चंदा इकठ्ठा कर रही थी। करोड़ों की सम्पति की मालिक बन गई थी। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद उन्होंने धड़ल्ले से ज़मीने खरीदी और जिला प्रशासन ने उनके एजेंट की भूमिका निभाई। अयोध्या के जिला अध्यक्ष खुद ही राम मंदिर ट्रस्ट के मेंबर हैं। तो सइयां भये कोतवाल, अब डर कहे का मामला हो गया।

स्वाति
लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है।
राम मंदिर की चकाचौंध देख के रहत इन्दोरी की ये ग़ज़ल याद आती है।राम नगरी की चकाचौंध में, रामलला की तरह अयोध्यावासी भी सिर्फ सजावट की वास्तु भर रह गए हैं। उनकी सहमति कोई मायने नहीं रहती। जब जब गोदी मीडिया का माइक उनके सामने आये उनको मुस्कुरा के जय श्री राम बोलना है। इन चैनल्स का बहुत बड़ा योगदान है इस इवेंट को बनाने और इस उत्सव का माहौल बनाये रखने में।
पूरा शहर हनुमान वाले केसरी धर्म ध्वज से पटा हुआ है। असल में ये सही प्रतीक है। हम सब हनुमान ही तो बन गए है, मोदी जी को हिन्दू ह्रदय सम्राट की तरह स्थापित करने में। न ही सिर्फ हम, स्वयं राम जी भी वही हो गए हैं। कहीं कहीं पोस्टर्स में तो मोदी जी बड़े है और राम जी छोटे है, जैसे मोदी जी भगवान राम को accommodate कर रहे हैं।इस जगमगाहट के पीछे विहिप-आरएसएस द्वारा की गई बहुत बड़ी ज़मीन की लूट की कहानी है।
धार्मिक और कानूनी रूप से जमीन हड़पना
करीब 4000 मकान और दुकानें उजाड़ दी गई हैं सड़क चौड़ी करने और अयोध्या के नवीनीकरण के लिए। राम के नाम और सरकार के डर से लोगों ने अपनी ज़मीन छोड़ दीं। विस्थापन की कहानियां हर जगह मिलेंगी।
हमें आदिवासियों के घर उजड़ने और उनके विस्थापन की कहानियां सुनाने की इतनी आदत हो गई है कि अब हमें गरीब हिन्दुओं के घर छिनने पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जिनके घर उजाड़ गए हैं उनकी आह भी दब जाती है। वो आवाज़ भी नहीं उठा सकते, नहीं तो उनको भी हिन्दू विरोधी करार कर दिया जायेगा। गोदी मीडिया आपको दिखा रही है कि सब कुशल मंगल है राम की नगरी में, लेकिन जो बेघर हो गए उनका दर्द इस हर्षो- उल्लास में गुम कर दिया गया है।
विहिप राम मंदिर के नाम पर वर्षो से चंदा इकठ्ठा कर रही थी। करोड़ों की सम्पति की मालिक बन गई थी। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद उन्होंने धड़ल्ले से ज़मीने खरीदी और जिला प्रशासन ने उनके एजेंट की भूमिका निभाई। अयोध्या के जिला अध्यक्ष खुद ही राम मंदिर ट्रस्ट के मेंबर हैं। तो सइयां भये कोतवाल, अब डर कहे का मामला हो गया।
कई घर ज़मींदोज़ कर दिया गए और संदिग्ध तरीके से ज़मीनें हड़पी गईं। लोगों ने औने पौन दाम पर ज़मीन बेच दी। 14 कोसी परिक्रमा, 5 कोसी परिक्रमा और 84 कोसी परिक्रमा पथ बनाये जा रहे हैं, जो पूरे अयोध्या को कवर करेगा। इस तरह सुप्रीम कोर्ट द्वारा न सिर्फ 2.77 एकड़ ज़मीन राम जन्मभूमि को दी गई, इसके अलावा पूरे शहर को ही आरएसएस ने अधिग्रहित कर लिया है।
कल ही एक scroll.in की पड़ताल में आया है कि कैसे स्थानीय भाजपा नेताओं और अडानी के बीच ज़मीन की डीलें हुई हैं। एक कंपनी जो भाजपा से जुडी हुई है, उसने सरयू नदी के पास की पर्यावरण रूप से संवेदनशील ज़मीन को अडानी को भारी मनाफ़े में बेच दी है।
2021 में भी एक खुलासा हुआ था newslaundry.com द्वारा, जिसमें एक भाजपा के मेयर ऋषिकेश उपाधयाय के भतीजे ने 890 वर्ग मीटर की सरकारी ज़मीन राम जन्मभूमि ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दी। कई कहानिया दबी हैं अयोध्या में। कुछ सामने आई हैं कुछ नहीं।
रामराज में गरीबों से अमीरों को ज़मीन और सम्पति का ट्रांसफर
जिला अधिकारियों के हिसाब से सब ज़मीन, नजूल ज़मीन या सरकारी ज़मीन हैं, तो सरकार का जब मन करेगा वो ज़मीन ले सकती है। लेकिन आज़ादी के इतने साल बाद भी इस ज़मीन का कोई वर्गीकरण नहीं किया गया है। नजूल भूमि, पर्चा शुदा भूमि और पट्टा शुदा भूमि में वर्गीकरण न होने के कारण छोटे व्यापारियों को औने पौने दाम पर मुआवजा देकर बलि का बकरा बनाया गया है।
समाजवादी पार्टी ने तो ये भी आरोप लगाया कि 2017 में सूबे में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद नजूल भूमि का फ्री होल्ड केवल बड़े और प्रभावशाली लोगों तक ही सीमित है।
जिनके घर कई पुश्तों से हैं लेकिन पट्टा शुदा न होने के कारण उन्हें सिर्फ घर गिराने का मुआवज़ा दिया गया न की अधिग्रहण का। स्थानीय लोगों की माने तो इसमें भी मनमाना मुआवज़ा दिया गया है जाति और वर्ग देख कर। ब्राह्मणों को पूरा मुआवज़ा मिला है, लेकिन बाकी जाति वालों वो अभी भी मुआवज़े के लिए धक्के खाने पड़ रहे हैं।
प्रोफेसर अनिल सिंह बताते हैं- ज़मीदारी कानून शहरों में लागू नहीं हुआ था। तो सरकार ने ज़मीन से लोगों को बेदखल कर दिया और जमीदार को पूरा मुआवज़ा ज़मीन का दे दिया। जमीदारों को खुद कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते, जिला प्रशासन ने उनका काम भी आसान कर दिया सीधे घर ढहा कर। वैसे कानून के हिसाब से ज़मीन पर रहने वालों का उस पर मालिकाना हक़ पूरा बनता है। लेकिन सब कानूनों को किनारे रख के यह सब धांधली हुई है।
इसी तरह 3 साल पहले किसानो की ज़मीन लेनी चाही तो किसानो ने आंदोलन छेड़ दिया। कइयों को जेल में डाल दिया गया और दर्जनों केस दर्ज़ कर दिए। कई छोटे मंदिर भी ढहा दिए इस नवीनीकरण में, उनके पुजारी लोग भी खुश नहीं हैं। लेकिन सबको या तो पैसे या पुलिस का डर दिखा के चुप करा दिया गया। जो लोग हिचक रहे थे उनको आधी रात में थाने बुलाके जबरन कागज़ों पर साइन करवाया गया।
आफ़ाक़ उल्लाह, एक सामाजिक शिक्षक, बताते हैं- अयोध्या में एक कहावत कही जा रही है- पहले जब भगवान राम तिरपाल में रहते थे तो हम घरों में रहते थे, अब भगवान राम का मंदिर बन रहा है तो हम तिरपाल में आ गए हैं। तो लोग पीड़ा में तो हैं। मकान दुकान दोनों गया। लेकिन कुछ कह नहीं पा रहे हैं।
ये हिन्दुओ का मंदिर नहीं, विहिप-आरएसएस प्रोजेक्ट है
अफाक का घर भी 14 कोई परिक्रमा पथ में है। उनके घर का आगे का हिस्सा ढहा दिया गया है। वो इस से दुखी है लेकिन कुछ कर नहीं सकते। मुसलमानो में जो डर और बेचैनी है वो उनको ज़्यादा सता रहा है।
अफाक की उम्र 40 साल की है। उन्हें बाबरी मस्जिद तोड़ने की ज़्यादा याद नहीं है लेकिन 30 साल में जो बदलाव आया है वो सामने दिखता है।
“लोग ज़्यादा हिन्दू और मुसलमान हो गए हैं। आम तौर पर जो चीज़े ज़बान पर नहीं आती थीं अब आ जाती हैं। आप कहीं बैठे हों, महफ़िल हो और किसी को गुस्सा आ जाये तो बोल देंगे कटुआ बैठा है। पहले सोचते थे कहते नहीं थे, अब बेझिझक बोल देते हैं।
पहले सोचते थे, कि हमारे दोस्त लोग मुसलमान हैं। हम कैसा स्टेटस या dp लगायें कि उनको बुरा न लगे, लेकिन अब जिस तरह से लोग स्टेटस लगा रहे हैं आप तो देख ही रही होंगी। अब चाहे वो समझदारी में या नासमझी में लगा रहे हैं, अब सोच नहीं रहे हैं, जो मन में आ रहा है लगा दे रहे हैं।” अफाक ने मायूस मन से कहा।
प्रोफेसर अनिल भी अफाक की बात से सहमत हैं। वो भी अयोध्या के पास के एक गांव से आते हैं। बाबरी मस्जिद टूटने के समय वो मास्टर्स की पढाई कर रहे थे और एक दिन पहले ही उस जगह पर गए थे।
अनिल बताते हैं- “मस्जिद टूटने के समय भी ऐसा माहौल नहीं था। 1992 में मस्जिद गिराने के लिए बाहर से लोग आये थे। उस समय का हिंदुत्व इतना हिंसक नहीं था। वो एक चरम पर पंहुचा और मस्जिद गिरा दी गई। उस समय भी स्थानीय लोगों में भाईचारा कायम रहा, गहरी समझ थी। उनको मालूम था ये सब राजनीति के लिए हो रहा है। उसका परिणाम ये भी हुआ कि भाजपा चुनाव हार गई।
लेकिन आज वो सब नष्ट हो गया है। इस पीढ़ी ने सिर्फ आरएसएस के ही आंदोलन देखे हैं। इनको नेहरू-गांधी का भारत पता ही नहीं है। इतिहास से कुछ लेना देना नहीं है। वो तो कहते है- ये हमारा मंदिर है, अयोध्या में नहीं तो और कहां बनेगा? उन्हें न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य की कोई अवधारणा नहीं पता है।
अयोध्या तो गंगा जमुनी तहज़ीब और भारत की समरसता का इतना बड़ा उदहारण था, यहां हिन्दू मुस्लिम एक ही मोहल्ले में बिना किसी मसले के रहते थे। लेकिन 1992 के बाद जिस तरह मुसलमानों का अलगाव हुआ, उनको अन्य की तरह देखा गया, अलग वर्गीकरण किया गया, तो मुसलमान तो खुश थे कि मंदिर बना लो।
फैज़ाबाद के मुसलमान तो बहुत पहले ही राम मंदिर के लिए राज़ी थे, लेकिन आरएसएस ने उस समय इसे बनाने नहीं दिया। उन्हे राम मंदिर को हिन्दू नवजागरण के रूप में इस्तेमाल करना था। ये मंदिर हिन्दुओं का नहीं है, ये विहिप-आरएसएस प्रोजेक्ट है।”
प्रोफेसर अनिल शीतला सिंह की मशहूर किताब – “अयोध्या: राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच” का ज़िक्र करते हैं। वो बहुत महत्वपूर्ण किताब है। शीतला जी ने उसमें डिटेल में लिखा है कि मुसलमान समुदाय ने उस राम मंदिर बनाने की पहल की थी, लेकिन आरएसएस ने ऐसा नहीं होने दिया अपने राजनीतिक फायदे के लिए।
बदलता समय और स्थान
आफ़ाक़ बताते है- “पहले फैज़ाबाद और अयोध्या दो अलग अलग नगर पालिका हुआ करती थी। दोनों रेलवे स्टेशन के बीच में सिर्फ 12km का फासला है। फैज़ाबाद बड़ा स्टेशन हुआ करता था, योगी जी के आने के बाद से उन्होंने सब एक कर दिया है। फैज़ाबाद अब अयोध्या कैंट बन गया है और अयोध्या स्टेशन अयोध्या धाम।
पुराने दिनों को याद करते हुए आफ़ाक़ बोलते है- “नदी किनारे बना हर शहर सुन्दर होता है, अयोध्या भी एक सुन्दर शहर है। जब मैं कॉलेज में था तो बहुत जाता था अयोध्या। लेकिन अब वो पुरानी सुकून भरी अयोध्या नहीं रही।। अब वो टूरिस्ट प्लेस बन गई है। सब पुराना तोड़ दिया जा रहा है, सब कमर्शियल हो गया है।”
आफ़ाक़ पिछले 15 दिन से रोज़ 7-8 अखबारों की कटिंग जोड़ कर कोलाज बना रहे हैं ताकि आने वाले समय में कोई विद्यार्थी या पत्रकार आए तो वो खबरों के माध्यम से जो खबर मिल रही हैं स्थानीय स्तर पर वो दे सकें। पिछले दस दिन से 8 में से 6 पेज पर राम मंदिर से सम्बंधित खबरें ही आ रही हैं।
मंदिर निर्माण से अयोध्या के लोगों के लिए ही रोज़गार बढ़ेगा ऐसा पूछने पर आफ़ाक़ कहते हैं- ऐसे संगठित रूप से पर्यटन कंपनी, एजेंसी, बड़े-बड़े होटल कौन बना सकता है? स्थानीय लोगों के पास तो इतना पैसा नहीं है। सब बाहर के लोग ही ज़मीने खरीद रहे हैं, उनको ही सब बनाने का लाइसेंस दिए जा रहे हैं।
आफ़ाक़ दुखी मन से बोलते है- जब ज़िआ-उल हक़ पाकिस्तान में सत्ता में आये थे तक वो लोग भी पक्का वाला पाकिस्तान बनाना चाहते थे। हम भी उन्हीं के नक़्शे-कदम पर चल रहे हैं। इस पक्के वाले भारत में क्या हमारे लिए जगह होगी?(