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*‘बाबा संस्कृति’ : आस्था से सत्ता तक और भारतीय लोकतंत्र का संकट*

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तेजपाल सिंह ‘तेज’

अज्ञान का महिमामंडन और विवेक का ह्रास:

          यह कोई साधारण सामाजिक प्रश्न नहीं रह गया है कि “बाबा संस्कृति ने देश को बर्बाद कर दिया है या नहीं?” यह प्रश्न आज भारतीय लोकतंत्र, संविधान, वैज्ञानिक चेतना और नागरिक विवेक—चारों को एक साथ स्पर्श करता है। जिस समाज में यह खुलेआम प्रचारित किया जा रहा हो कि सिर्फ छूने से कैंसर ठीक हो सकता है या आपकी जीवन-समस्याएँ इसलिए हैं क्योंकि आपने गोलगप्पा मीठी चटनी के साथ नहीं खाया—और इसे राष्ट्रीय टेलीविजन चैनलों पर निर्लज्जता से दिखाया जा रहा हो—वहाँ समस्या केवल अंधविश्वास की नहीं रह जाती, बल्कि राज्य-प्रायोजित अविवेक की बन जाती है। यह स्थिति आकस्मिक नहीं है। यह एक दीर्घकालिक राजनीतिक-सांस्कृतिक परियोजना का परिणाम है।

आस्था बनाम अंधविश्वास : एक बुनियादी लेकिन विस्मृत अंतर:

          आस्था और अंधविश्वास के बीच का अंतर जितना बुनियादी है, उतना ही जानबूझकर धुंधला किया गया है। आस्था वह है, जो तर्कअनुभव और प्रमाण के साथ सह-अस्तित्व में रह सके। अंधविश्वास वह है, जहाँ कहा जाता है— मुझे विश्वास हैइसलिए प्रश्न मत पूछो।” जैसे ही विश्वास प्रश्न से डरने लगे, वह आध्यात्मिक नहीं रहता—वह सत्ता का औज़ार बन जाता है। विज्ञान यह स्वीकार करता है कि हम बहुत कुछ नहीं जानते, लेकिन वह यह कभी नहीं कहता कि हम जान ही नहीं सकते। इसके उलट, बाबा संस्कृति का मूलमंत्र है—“तुम जान नहीं सकते, बस मानो।”  यही वह बिंदु है जहाँ ज्ञान की परंपरा टूटती है और गुलामी की परंपरा जन्म लेती है।

बाबा कारखानों’ का उदय : समानांतर संस्थानों का निर्माण:

          एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अक्सर अनदेखा किया गया तथ्य यह है कि जब भारत में विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान, इसरो, सीएसआईआर, डीआरडीओ जैसे वैज्ञानिक केंद्र विकसित हो रहे थे—उसी कालखंड में, विशेषकर 1980 के दशक से, एक और उद्योग फल-फूल रहा था— बाबा उद्योग। ये साधारण आश्रम नहीं थे। ये आधुनिकप्रबंधितमीडिया-संचालित कारखाने थे, जिनमें—

·        अंधविश्वास को उत्पाद बनाया गया

·        भय, अपराधबोध और चमत्कार को ब्रांड बनाया गया

·        और राजनीति को निवेशक बनाया गया

          यह उद्योग किसी एक धर्म तक सीमित नहीं रहा—हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सभी में इसके रूप दिखाई दिए। यही कारण है कि यह केवल धार्मिक प्रश्न नहीं, बल्कि सत्ता-संरचना का प्रश्न है।

राजनीतिक संरक्षण : बाबासत्ता और राजमहल’ का गठजोड़:

          यह मानना भोलेपन से कम नहीं होगा कि बाबाओं का यह वर्चस्व अपने आप विकसित हुआ है। वास्तविकता यह है कि—

·        जिन बाबाओं पर बलात्कार, हत्या, धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप हैं

·        वे चुनाव के समय पैरोल पर बाहर आ जाते हैं

·        जबकि साधारण विचाराधीन कैदी वर्षों तक जेलों में सड़ते रहते हैं

          यह कानून की विफलता नहीं, बल्कि कानून का राजनीतिक उपयोग है। बाबा वोट बैंक बनाते हैं। सत्ता संरक्षण देती है। और मीडिया उन्हें वैधता देता है। यही त्रिकोण—बाबा + सत्ता + मीडिया—आज भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

मीडिया की भूमिका : विवेक का मंच या तमाशे का बाजार?

          जब कोई टीवी चैनल यह दिखाता है कि कोई बाबा कैंसर ठीक कर सकता है, तो वह केवल मूर्खता नहीं फैलाता—वह जनस्वास्थ्य के खिलाफ अपराध करता है। लेकिन यह अपराध दंडनीय नहीं बनता, क्योंकि यह सत्ता की विचारधारा के अनुकूल है। यह वही मीडिया है जो वैज्ञानिक से प्रश्न पूछेगा— “आपने यह कैसे साबित किया?” लेकिन बाबा से कभी नहीं पूछेगा—
“आपके दावे का प्रमाण क्या है?” यह चयनात्मक तर्कहीनता है—और यह खतरनाक है।

सामाजिक दबाव और पीढ़ियों का संघर्ष:

          यह समस्या केवल बाबाओं तक सीमित नहीं है। यह दैनिक जीवन के सूक्ष्म नियमों में उतर चुकी है—

·        किसके पैर छूने हैं

·        लड़कियां कैसे बैठें

·        लड़के रो सकते हैं या नहीं

·        कौन-सा रंग किसके लिए है

          यह सब एक ही मानसिकता से उपजता है—आज्ञाकारिता की संस्कृति। यहाँ असहमति को अपमान समझ लिया जाता है। जबकि लोकतंत्र का मूल तत्व ही है—सम्मान के साथ असहमति। यदि हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से सहमत ही रहे, तो इतिहास में न तो सती प्रथा खत्म होती, न गुलामी, न जातिगत भेद।

विज्ञानकविता और सौंदर्यबोध : एक खोया हुआ रिश्ता:

          यह कोई संयोग नहीं कि गौहर रज़ा जैसे वैज्ञानिक कहते हैं कि उन्हें मैक्सवेल के समीकरणों में वही सौंदर्य दिखता है जो फ़ैज़ की कविता में। विज्ञान और कला दोनों जिज्ञासा से जन्म लेते हैं, जबकि बाबा संस्कृति भय से। जहाँ प्रश्न हैं, वहाँ कविता है। जहाँ प्रश्न वर्जित हैं, वहाँ सिर्फ़ प्रवचन है।

उपसंहार : अगली पीढ़ी हमें कैसे देखेगी?

          सबसे निर्णायक प्रश्न यही है—200 या 500 साल बादजब अगली पीढ़ी हमें देखेगीतो क्या वह कहेगी कि हमने विवेक चुना या अंधविश्वासक्या वे कहेंगे कि हमने लोकतंत्र को मजबूत किया—या यह कि हमने उसे बाबाओं के चरणों में गिरवी रख दिया? बाबा संस्कृति केवल धार्मिक संकट नहीं है। यह संवैधानिकवैज्ञानिक और नैतिक संकट है। और इसका समाधान केवल कानून से नहीं, बल्कि नागरिक साहसअसहमति और प्रश्न पूछने की संस्कृति से निकलेगा। क्योंकि जो समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है— वह धीरे-धीरे अपने भविष्य को किसी बाबा के चरणों में सौंप देता है।(Gauhar Raza :https://youtu.be/w1ISd5N-C0w?si=ND9VKDk7345F1Vp5)

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