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*बाबा तिलका मांझी:घोड़ों से बांधकर सुलतानगंज से भागलपुर तक घसीटते हुए लाया गया फिर भी होंसला पस्त नहीं कर पाए अंग्रेज*

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 (बाबा तिलका मांझी के शहीद दिवस पर विशेष) 

विशद कुमार

लॉर्ड डलहौजी की ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ एक ऐसी ब्रिटिश नीति थी, जिसके तहत यदि किसी भारतीय रियासत का शासक बिना किसी उत्तराधिकारी यानी अपनी किसी संतान का मर जाता था, भले ही वह किसी को गोद भी लिया हो, तो उस राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था और गोद लिए हुए बेटे को उत्तराधिकारी नहीं माना जाता था।

इस नीति का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करना था, और इसके तहत सतारा, झांसी, नागपुर और उदयपुर जैसी रियासतों का विलय किया गया, जिससे भारतीय शासकों में असंतोष बढ़ा और 1857 के विद्रोह का एक कारण बना। 

विलय किए गए राज्यों में सतारा (1848), संबलपुर (1850), उदयपुर (1852), नागपुर (1853), और झांसी (1854) इस नीति के शिकार हुए।

उक्त उध्दरण का तात्पर्य यह है कि 1857 का अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जो विद्रोह हुआ और जिसको भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा गया, जिसका श्रेय मंगल पांडे को जाता है, उसका एक कारण गवर्नर लॉर्ड डलहौजी के ‘डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ नियम का परिणाम भी था। क्योंकि उसी वक्त सैनिकों को दिए जा रहे एनफील्ड रायफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का पता चला था।

यह जानकारी कलकत्ता के पास बैरकपुर छावनी में कानपुर के मातादीन भंगी जो बारूद की कम्पनी में हवलदार थे, उन्होंने ही मंगल पांडे सहित सभी हिंदू मुस्लिम सिपाहियों को दी थी।

यह जानकारी होते ही 1 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने परेड के मैदान में खुला विद्रोह कर दिया। जिसके बाद अंग्रेजों ने मंगल पांडे पर गोली चलाई लेकिन मंगल पांडेय बच गए। वहीं सैनिकों ने अंग्रेजी अफसरों पर हमला कर दिया जिसमें कई अंग्रेज अधिकारी मारे गए। उसके बाद मंगल पांडेय को पकड़ा गया और उसे 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई। मंगल पांडे को उकसाने तथा सेना में विद्रोह कराने के मुख्य आरोपी मातादीन भंगी को बंदी बनाकर उन्हें व उनके साथियों को 9 मई 1857 को सरेआम फांसी दे दी गई। 

जबकि इस विद्रोह में परोक्ष रूप से डाक्ट्रिन ऑफ लैप्स नियम से प्रभावित रियासतों के भारतीय शासकों का असंतोष भी काम कर रहा था, जो मंगल पांडेय और उनके साथियों को फांसी दिए जाने के बाद धीर धीरे बढ़ता चला गया और कालांतर में 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहलाया। 

जबकि अंग्रेजों के खिलाफ बाबा तिलका मांझी के नेतृत्व में विद्रोह की शुरुआत 9 दशक पहले 1770 में ही हो चुकी थी।

बता दें कि संथाल समाज तिलका मांझी को बाबा से संबंधित करता है।

तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को हुआ बताया जाता है। संथाल समाज हर वर्ष 11 फरवरी को तिलका मांझी की पूजा अर्चना करता है।

कहना ना होगा कि जब से ईस्ट इन्डिया कंपनी ने भारत में कदम रखा और अपना वर्चस्व कायम करना शुरू किया, उसके इस कदम के खिलाफ लगातार कई क्रांतियां हुई, जिसमें आदिवासी, दलित व अन्य कई वर्गों की भागीदारी रही लेकिन ब्राह्मणवादी मानसिकता वाले इतिहासकारों द्वारा इनके संघर्षों के इतिहास को या तो दबाया गया या तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। 

भले ही ऐसी मानसिकता वाले इतिहासकारों की वजह से इतिहास में तिलका मांझी के योगदान का कोई ख़ास उल्लेख न मिले, पर समय-समय पर कई लेखकों और इतिहासकारों ने उन्हें प्रथम स्वतंत्रता संग्रामी होने का सम्मान दिया है।

बिहार में सुल्तानगंज के तिलकपुर गावं में एक संथाल परिवार में जन्मे तिलका मांझी ने गाय की चर्बी या किसी धार्मिक भावना को ठेस लगने के कारण अंग्रेज़ों के खिलाफ जंग की शुरुआत नहीं की थी। उन्होंने अन्याय और गुलामी के खिलाफ जंग छेड़ी थी। 

तिलका मांझी भागलपुर में आदिवासी समाज के लोगों को उनके हक-अधिकार की भावना जगाने के लिए उन्हें संबोधित करते थे।

तिलका मांझी ने किशोर जीवन से ही अपने परिवार तथा आदिवासी समुदाय पर अंग्रेज़ों का अत्याचार देखा था। अंग्रेज़ों के अत्याचार देखकर उनका खून खौल उठता और अंग्रेज़ी सत्ता से टक्कर लेने के लिए उनके मस्तिष्क में विद्रोह की लहर पैदा होती थी। आदिवासियों की जमीन, खेती, जंगली वृक्षों पर अंग्रेज़ी शासक अपना अधिकार किये हुए थे। आदिवासियों के बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों को अंग्रेज़ कई प्रकार से प्रताड़ित करते थे। आदिवासियों के पर्वतीय अंचल में पहाड़ी जनजाति का शासन था।

वहां पर बसे हुए पर्वतीय सरदार भी अपनी भूमि, खेती की रक्षा के लिए अंग्रेज़ी सरकार से लड़ते थे। पहाड़ों के इर्द-गिर्द बसे हुए ज़मींदार व महाजन अपना बचाव व धन की लालच में अंग्रेज़ों की चाटुकारिता में उन्हें खुश किये रहते थे। आदिवासियों और पर्वतीय सरदारों की लड़ाई रह-रहकर अंग्रेज़ी सत्ता से हो जाती थी और पर्वतीय ज़मींदार वर्ग अंग्रेज़ी सत्ता का खुलकर साथ देता था। 

संथाल समाज के लोग बताते हैं कि तिलका मांझी ने राजमहल की पहाड़ियों में अंग्रेज़ों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं। सन 1770 में पड़े अकाल के दौरान तिलका मांझी के नेतृत्व में संथालों ने सरकारी खज़ाने को लूट कर गरीबो में बांट दिया, जिससे गरीब तबके के लोग तिलका मांझी से प्रभावित हुए और उनके साथ जुड़ गए। इसके बाद तिलका मांझी ने अंग्रेज़ों और सामंतों, जमींदारों व महाजनों पर हमले तेज़ कर दिए, हर जगह तिलका मांझी की जीत हुई ।

जब तिलका मांझी ने बनैचारी जोर नामक स्थान से अंग्रेज़ों के विरुद्ध खुला विद्रोह शुरू कर दिया, तब उनके नेतृत्व में आदिवासी जांबाज भागलपुर, सुल्तानगंज तथा दूर-दूर तक जंगली क्षेत्रों की तरफ बढ़ने लगे।

राजमहल की भूमि पर पर्वतीय सरदार गुरिल्ला अंदाज में अपनी परम्परागत हथियार तीर-धनुष से अंग्रेज़ी फौज पर लगातार हमला कर रहे थे। अंग्रेज स्थिति का जायजा लेकर क्लीव लैंड को मैजिस्ट्रेट नियुक्त कर राजमहल भेजा। क्लीव लैंड अपनी फौज और पुलिस के साथ चारों ओर देख-रेख में जुट गया।

जंगल, तराई तथा गंगा, ब्राह्मी आदि नदियों व घाटियों में तिलका मांझी अपने जांबाज साथियों के साथ अंग्रेज़ी अफसरों के साथ लगातार संघर्ष करते-करते मुंगेर, भागलपुर, संथाल परगना के पर्वतीय इलाकों में छिप-छिप कर गुरिल्ला लड़ाई लड़ते रहे। क्लीव लैंड एवं सर आयर कूट की सेना के साथ वीर तिलका की कई स्थानों पर जमकर लड़ाई हुई। वे अंग्रेज़ सैनिकों से मुकाबला करते-करते भागलपुर की ओर बढ़ गए। वहीं से उनके सैनिक छिप छिपकर अंग्रेज़ी सेना पर तीरों से हमला करने लगे। 

इसी बीच समय पाकर तिलका मांझी एक ताड़ के पेड़ पर चढ़ गए और अंग्रेजों के की फौज का मुआयना करने लगे। ठीक उसी समय क्लीव लैंड घोड़े पर सवार होकर उधर से गुजरने लगा। जिसे देख तिलका मांझी ने उसपर तीर की बौछार कर दी। जहर युक्त तीर लगने के बाद क्लीव लैंड घायल हुआ और उसकी मौके पर मौत हो गई। क्लीव लैंड की मौत की खबर पाकर ब्रिटिश सेना में आतंक मच गया। सत्ताधारियों, सैनिकों और अफसरों में भय का वातावरण छा गया। तिलका मांझी और उनके साथियों के लिए यह एक बड़ी कामयाबी थी। 

जब तिलका मांझी और उनके साथी क्लीव लैंड की मौत और अपनी जीत का जश्न मना रहे थे, तब रात के अंधेरे में अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने हमला बोल दिया। लेकिन किसी तरह तिलका मांझी बच निकले और उन्होंने राजमहल की पहाड़ियों में शरण लेकर अंग्रेज़ों के खिलाफ छापेमारी जारी रखी।

कहा जाता है कि अंग्रेजों ने तिलका के ही किसी आदमी को मुखबिर बना रखा था जिसने “घर का भेदी लंका ढाहे” के तर्ज पर तिलका मांझी का पता अंग्रेज़ों को बता दिया था। अंग्रेज़ों ने बीच रात में तिलका मांझी और अन्य आदिवासियों पर हमला किया। तिलका जैसे तैसे बच गये थे लेकिन उनके कई साथी मारे गये। अंग्रेजों से बच कर तिलका मांझी अपने गृह जिले भागलपुर के सुलतानगंज के जंगलों में जा छिपे। यहां से उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। अंग्रेज़ तिलका मांझी तक पहुंचने वाले हर सप्लाई रूट को बंद करने में कामयाब हो गये। तिलका और उनके सैनिकों को अंग्रेज़ों से आमने सामने लड़ना पड़ा।

इतिहासकारों की मानें तो 12 जनवरी 1785 के दिन तिलका मांझी को अंग्रेज़ों ने पकड़ लिया था। अंग्रेज तिलका मांझी को घोड़ों से बांधकर सुलतानगंज से भागलपुर तक घसीटते हुए ले गए थे। इतनी यातना सहने के बाद भी तिलका मांझी का हौसला पस्त नहीं हुआ था। इसके बाद अंग्रेजों ने 13 जनवरी 1785 को 35 वर्षीय तिलका को भागलपुर में एक बरगद के पेड़ पर फांसी दी।

वीरता की अनोखा इतिहास रचने वाले तिलका मांझी को इतिहास के पन्नों में वैसा स्थान नहीं मिल पाया जितने के तिलका हकदार थे। हालांकि इतिहास के पन्नों से तिलका मांझी भले गुम हो। लेकिन आदिवासी समाज समेत पूरे बिहार झारखंड के लोग उन्हें भगवान तिलका मांझी कहकर संबोधित करते हैं। आदिवासी समुदाय में उन पर कहानियां कही जाती हैं। संथाल उन पर गीत गाते हैं इन सब के बीच 1991 में बिहार सरकार ने भागलपुर यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर तिलका मांझी यूनिवर्सिटी रखा और उन्हें उचित सम्मान दिया। इसके साथ ही जहां उन्हें फांसी हुई थी उस स्थान पर एक स्मारक बनाया गया है।

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