*”कृषि मार्केटिंग की राष्ट्रीय नीति का नया मसौदा”*
*भाजपा सरकार की इस खतरनाक साजिश को रोकने के लिए देशव्यापी संघर्ष खड़े करो*
*ऑल इण्डिया किसान खेत मजदूर संगठन AIKKMS का आह्वान*
कड़ी ठंड और झुलसाने वाली गर्मी का बहादुरी से मुकाबला करते हुए तीन काले कृषि कानूनों को रद्द कराने की मांग पर किसानों ने दिल्ली बार्डरों पर तेरह महीने तक लंबी ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी थी। किसानों को यह एहसास हो गया था कि वे तीन काले कृषि कानून आम किसानों के हितों के खिलाफ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वार्थ में लाए गए हैं। इसीलिए वे बहादुरी से लड़े। 735 किसानों ने इसमें अपनी बेशकीमती जान कुर्बान कर केंद्र की भाजपा सरकार के घुटने टिका दिए। भाजपा सरकार को आखिर वे कानून निरस्त करने पड़े थे। परन्तु अपने आकाओं की स्वार्थपूर्ति में उन काले कानूनों को वापस लाने का इरादा उन्होंने छोड़ा नहीं था। टेढ़े व छिपे रूप से अपना इरादा वे जारी रखे हुए थे। “कृषि मार्केटिंग की राष्ट्रीय नीति के मसौदे” के नाम से अब वे उसी जहर को नई चाशनी में लपेट कर देश के सामने परोस रहे हैं।
*नये मसौदे का उद्देश्य कृषि मार्केटिंग प्रणाली का पूर्ण निजीकरण करना है*
भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 25 नवंबर, 2024 को कृषि मार्केटिंग की राष्ट्रीय नीति का नया मसौदा जारी किया है। इस मसौदे में कहा गया है कि इस नीति का उद्देश्य: “देश में एक जीवंत बाजार पारिस्थितिकी तंत्र (मार्केटिंग ईकोसिस्टम) का निर्माण करना है जिसमें सभी श्रेणियों के किसानों को अपनी उपज के लिए सर्वोत्तम मूल्य प्राप्ति के लिए अपनी पसंद का बाजार मिल सके।” (अध्याय 2) और इसे कैसे हासिल किया जाएगा? “सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की भागीदारी से। इसके साथ कृषि मार्केटिंग के कानूनों और नीतियों में सुधार करना सहायक होगा।” (अध्याय 3.2)
*नये कृषि सुधारों के मुख्य प्रस्ताव*
कृषि मार्केटिंग कानूनों और नीतियों में जो सुधार पेश किए गए हैं, वे निम्न हैं:
* “निजी थोक बाजार स्थापित करने की अनुमति देना”। (अध्याय 7.1.3.1)
* “प्रसंस्करणकर्ताओं, निर्यातकों, संगठित खुदरा विक्रेताओं, थोक खरीददारों द्वारा खेत से सीधे थोक खरीद की अनुमति देना।” (अध्याय 7.1.3.2)
* “प्राइवेट ई-ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म अर्थात निजी भागीदारों को ऑनलाइन खरीद-बिक्री करने और संचालन की अनुमति देना।” (अध्याय 7.1.3.4)
और भी अन्य ऐसे सुधार करना जो निजी भागीदारों के लिए सहायक हों। जाहिर है, देशी और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ही होंगी ये निजी भागीदार।
विडंबना यह है कि कृषि मार्केटिंग की इस नई नीति के प्रस्ताव में एमएसपी की कानूनी गारंटी का कोई जिक्र नहीं है।
* नई नीति के प्रस्ताव में “अनुबंध खेती को मार्केट और मूल्य जोखिम प्रबंधन के औजार के रूप में” लागू करने का भी सुझाव दिया गया है। (अध्याय 10.1.1)
* इसमें “प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की तर्ज पर मूल्य बीमा योजना” का भी उल्लेख है। (अध्याय 10.1.3)
*प्रचलित ढांचा और प्रस्तावित बदलाव*
इन सभी सुधार कार्यक्रमों का विश्लेषण करने से पहले, आइए देखें कि कृषि उपज की मण्डियों की वर्तमान स्थिति कैसी है। वर्तमान में भारत में एपीएमसी अधिनियमों के तहत 7,057 संगठित थोक मण्डियां स्थापित हैं। इसके अलावा 500 अनियमित मण्डियां और 22,931 ग्रामीण शेड हैं, जिन पर मुख्य रूप से छोटे ग्रामीण पूंजीपतियों का नियंत्रण होता है। यह है परिदृश्य।
*किसान-हितैषी खरीद प्रणाली आजादी के बाद से ही दुर्लभ रही है*
हम सभी जानते हैं कि स्वतंत्रता के बाद से किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या उचित मण्डी सुविधाओं की कमी है, यानी अपनी उपज को लाभकारी मूल्य पर बेचने के लिए सही प्रबंध-तंत्र की कमी रही है। नतीजतन, किसानों को अपनी पैदावार उत्पादन के लागत खर्च से भी कम पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है और इस तरह उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता है। यही वह कारण है जिसके चलते कर्ज के बढ़ते बोझ तले दब कर पूरे देश में किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या करने की ओर धकेले जा रहे हैं। इस प्रक्रिया में अक्सर साहूकार कमीशन एजेंट के रूप में काम करते हैं। कृषि मण्डी में बिचौलियों की कड़ी इतनी बड़ी और शक्तिशाली है कि फसलों के दाम में किसानों का हिस्सा काफी घट जाता है। उदाहरण के लिए एक अध्ययन से पता चला है कि किसानों को चावल की कीमत का केवल 53 प्रतिशत हिस्सा मिलता है, 31 प्रतिशत हिस्सा बिचौलिए ले जाते हैं और शेष 16 प्रतिशत मण्डी के खर्च के रूप में काट लिया जाता है। सब्जियों और फलों के मामले में किसानों का हिस्सा और भी कम होता है। सब्जियों में किसानों को मिलता है 39 प्रतिशत और फलों में 34 प्रतिशत। सब्जियों के मामले में बताते हैं कि बिचौलियों का हिस्सा होता है 29.5 प्रतिशत और फलों में 46.5 प्रतिशत। कृषि मार्केटिंग प्रणाली में बिचौलिए होते हैं आढ़ती (दलाल), थोक और खुदरा व्यापारी, साहूकार आदि और कुछ होते हैं गाँव के व्यापारी।
एपीएमसी कानून के अनुसार, एपीएमसी मण्डी में किसान अपनी खेती की उपज लाइसेंस-धारी व्यापारियों के एक समूह को बेचते है जिन्हें आढ़ती (दलाल) कहा जाता है। ये लाइसेंस एपीएमसी देती है जो किसानों द्वारा चुनी गई एक समिति होती है। ऐसा नहीं है कि इस समिति ने किसानों के हितों की रक्षा के लिए बहुत कुछ किया हो, फिर भी लाइसेंस प्राप्त व्यापारियों, आढ़तियों पर इस समिति का कुछ नियंत्रण होता है और इस प्रकार कुछ हद तक एक प्रकार की मूल्य निर्धारण प्रणाली के कानून की कम से कम एक झलक तो दिखाई पड़ती है। लेकिन भूमण्डलीकरण के बाद की अवधि में, सरकार ने एपीएमसी मण्डियों के अलावा निजी मण्डियां स्थापित करने का फैसला किया था। तब उसका तर्क था कि इससे किसानों के हितों की रक्षा होगी और उन्हें प्रत्यक्ष और खुले बाजार और संगठित खुदरा बाजार तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी और इस तरह वे ‘कच्चे माल की आसान आपूर्ति, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों और सूचना आदान-प्रदान करने और मार्केटिंग की नई नई प्रणालियां अपनाने’ का लाभ उठा पाएंगे। लेकिन, असल में ये सब बिल्कुल इससे उल्ट करने के बहाने थे। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने एपीएमसी अधिनियमों को संशोधित किया था और खरीद का एक हिस्सा निजी भागीदारों के हाथों में सौंप दिया था, अनुबंध खेती को कानूनी मान्यता दी थी और इस तरह एकाधिकारी कम्पनियों के आक्रमण को बढ़ाने का मार्ग खोल दिया था। सत्ता में आने के बाद भाजपा की केंद्र सरकार ने भी इसी रास्ते पर तेजी से कदम बढ़ाए और इसका नतीजा यह हुआ कि किसानों की हालत बहुत खराब हो गई है। और अब भाजपा की केंद्र सरकार “कृषि मार्केटिंग की राष्ट्रीय नीति” के नये प्रस्ताव के माध्यम से देश के सामने तमाम कृषि पैदावार – चावल, गेहूं, दाल, सब्जियां, तिलहन, दूध, मांस और उपभोग की अन्य वस्तुओं के निजीकरण की एक व्यापक योजना पेश कर रही है। इतना ही नहीं, वे आधुनिकीकरण के नाम पर एपीएमसी के माध्यम से मार्केटिंग की वर्तमान प्रणाली को पूरी तरह से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने की कोशिश कर रहे हैं और यहां तक कि 29 हजार की संख्या में विशाल ग्रामीण हाटों/शेडों के संचालन को नियंत्रित करने की योजना बना रहे हैं। इसका मतलब है कि कृषि मार्केटिंग प्रणाली का पूरी तरह से निजीकरण।
*निजीकरण की होड़ किसानों के बीच कहर बरपा रही है*
क्या किसानों ने कृषि मार्केटिंग प्रणालियों के निजीकरण की मांग की है? नहीं। क्योंकि वे जानते हैं कि यह निजीकरण उनके जीवन को बर्बाद कर रहा है। कृषि उपयोगी चीजों — उर्वरक, बीज, कीटनाशक आदि के मामले में निजीकरण का अनुभव क्या है? इसकी कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि किसानों के लिए व्यावहारिक रूप से असहनीय हो गई हैं। किसान अच्छी तरह जानते हैं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां उनके मित्र नहीं हैं। वे जानते हैं कि ये मुनाफ़ाखोर पिशाच उनका खून चूस रहे हैं। ये दैत्य कम्पनियां सिर्फ ज्यादा मुनाफा के अलावा कुछ भी नहीं जानती। और अगर ये दैत्य कम्पनियां पूरी मार्केटिंग प्रणाली को नियंत्रित कर लेती हैं, तो वे किसानों की उपज को सस्ती दरों पर खरीदेंगी और आम लोगों को बहुत ज्यादा रेट पर बेचेंगी। किसान और आम लोग नष्ट हो जाएँगे।
*नये दस्तावेज की कुछ प्रमुख विशेषताएं:*
*एक*, हम सभी जानते हैं कि किसान कच्चा माल पैदा करते हैं जो प्रसंस्करण उद्योगों, व्यापारी घरानों और निर्यातकों द्वारा नियंत्रित बाजार में आता है। ये ताकतें व्यावहारिक रूप से कृषि उपज की कीमत को नियंत्रित और निर्धारित करती हैं। अगर कोई सरकार किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाना चाहती है, तो उसे इन ताकतों पर असरदार नियंत्रण कायम करना होगा और किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए उन्हें मजबूर करना होगा। लेकिन ऐसा करने के उल्टे, नीति दस्तावेज के प्रावधान इन ताकतों को मजबूत करने का सुझाव देते हैं।
*दो*, सुधार प्रस्ताव में खेत से लेकर भंडारण और अंततः खाद्य प्रसंस्करण केंद्रों तक संपूर्ण खाद्य श्रृंखला प्रणाली में एक पूर्ण सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल का सुझाव दिया गया है। इसका मतलब है कि सुधार प्रस्ताव में सभी खाद्य वस्तुओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में सौंपने का सुझाव दिया गया है।
इसके परिणाम क्या होंगे, यह हम आसानी से समझ सकते हैं।
*तीसरा*, ये सुधार विनियमन/नियंत्रण को भी समाप्त करने का प्रस्ताव करते हैं, जिससे निजी क्षेत्र, विशेष रूप से कॉर्पोरेट कृषि व्यवसाय को उत्पादन, प्रसंस्करण और खरीद -बिक्री पर प्रभुत्व स्थापित करने की अनुमति मिलती है। किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) को इस प्रणाली में प्रमुख एजेंट के रूप में देखा जाता है, जिसका काम बिचौलियों और व्यापारियों को दरकिनार करके खुद कॉर्पोरेट उद्योगों, व्यापारिक और निर्यात चैनलों को वांछित और आवश्यक कच्चे माल की आसान और सीधी आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
यह सुधार प्रस्ताव निश्चित रूप से बड़े कारपोरेटों में के भीतर नियंत्रण को मजबूत करेगा, संभावित रूप से छोटे उत्पादकों को हाशिए पर डाल देगा और बाजार में उनकी सौदेबाजी की शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर देगा। परिणामस्वरूप लाखों छोटे व्यापारी और दुकान मालिक बाजार से बाहर हो जाएंगे और कंगाल हो जाएंगे।
*चौथा*, सुधार प्रस्ताव किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से वायदा कारोबार और शेयर बाजार तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने का सुझाव देता है, जो घरेलू और खाद्य उद्योग पर पूर्ण कॉरपोरेट नियंत्रण का मार्ग प्रशस्त करेगा। इसके परिणाम भयंकर होंगे: किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा, आजीविका की तलाश में मजबूरी में पलायन होगा, बेरोजगारी बढ़ेगी और किसानों की आत्महत्या में वृद्धि होगी। इसका मतलब है कि किसानों और खेत मजदूरों के साथ-साथ आम लोगों के अन्य हिस्सों की पीड़ा और दुख कई गुना बढ़ जाएंगे।
*पांचवां*, यह प्रस्ताव “अनुबंध खेती को बाजार और मूल्य जोखिम को घटाने के लिए एक औजार के रूप में” लागू करने का भी सुझाव देता है। (अध्याय 10.1.1)
यह कोई नई बात नहीं है। वैश्वीकरण की शुरुआत से ही बहुराष्ट्रीय निगमों के पैरोकार हमारे देश में अनुबंध खेती शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं। विवादास्पद प्रश्न यह है कि अनुबंध किसके बीच होगा? एक तरफ विशाल दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जिनके पास बहुत अधिक धन शक्ति है और जिनका सरकारी मशीनरी पर नियंत्रण होता है और दूसरी तरफ गरीब और सीमांत किसान हैं। विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ खरीददार हैं और छोटे किसान उत्पादक हैं। किसानों का अनुभव है कि यह प्रस्ताव अनुबंध करने वाली फर्मों के पक्ष में बहुत अधिक झुका हुआ है। वास्तव में किसान अनुबंध करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में बंधक बन जायेंगे। और एक बार जब वे अनुबंध खेती में फंस जायेंगे, तो इससे बाहर निकलने का शायद ही कोई रास्ता बचे।
*और, छठा*, सुधार प्रस्ताव में “प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की तर्ज पर मूल्य बीमा योजना” की घोषणा की गई है। इस बहुचर्चित फसल बीमा योजना से अब तक किसका भला हुआ है? निश्चित रूप से इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हित पूरा हुआ है, ना कि किसानों का। इस मामले में किसानों की दुख व पीड़ा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए उपयोगी है। सभी सूचनाएं और रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती हैं कि यह योजना निजी बीमा कंपनियों के लिए वरदान साबित हुई है, जिन्होंने कथित तौर पर किसानों से प्राप्त किश्तों से हुई आय की 97 प्रतिशत राशि हड़प ली है। तथ्यों से पता चला है कि मुआवजा भुगतान दर अब केवल 6.61 प्रतिशत है। यह भी पता चला है कि कुछ मामलों में मुआवजा राशि मात्र 12 रुपये से भी कम रही है। इसलिए, हम सहज ही यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह योजना वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक दूसरा घिनौना चेहरा है जो “किसान-हितैषी” होने का चोला पहनकर सरकारी खजाने की कीमत पर निजी भागीदारों को लाभ पहुंचाती है।
संक्षेप में, ये “कृषि मार्केटिंग की राष्ट्रीय नीति के प्रस्ताव” की मुख्य विशेषताएं हैं। इसका मतलब है कृषि मार्केटिंग प्रणाली पर कॉर्पोरेट जगत का पूर्ण कब्ज़ा हो जाएगा।
*इसके विनाशकारी परिणाम*
1) बड़े पैमाने पर किसान बर्बाद हो जाएंगे और वे भूमिहीन लोगों में तबदील हो जाएंगे।
2) लाखों-करोड़ों छोटे व्यापारी और दुकानदार बाजार से बाहर हो जाएंगे।
3) बहुराष्ट्रीय निगम खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं को नियंत्रित करेंगे। परिणामस्वरूप, कीमतें चरम सीमा तक बढ़ जाएंगी। हम इसके विनाशकारी परिणामों को सहज ही महसूस कर सकते हैं।
आप देख सकते हैं कि केंद्र की भाजपा सरकार अपने कॉरपोरेट आकाओं के हितों की सेवा किस हद तक करने के लिए तैयार है।
*ऑल आउट स्टेट ट्रेडिंग*
लेकिन हम इतिहास के पन्नों से जानते हैं कि खून चूसने वालों का स्थान इतिहास के कूड़ेदान में होता है। कॉरपोरेट और उनके गुर्गों की इस घिनौनी साजिश का विरोध करने के लिए किसान और आम लोग अन्त तक
लड़ेंगे। वे दिल्ली बार्डरों पर अपनी योग्यता साबित कर चुके हैं और अगर जरूरत पड़ी तो पूरे देश में एक व्यापक किसान आंदोलन संगठित कर वे एक बार फिर इसे साबित करेंगे। उनकी ठोस मांग इस प्रकार है:
i) “खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं के व्यापार से पूंजीपतियों को बाहर निकालो और तुरंत “ऑल आउट स्टेट ट्रेडिंग” शुरू करें। और इस “ऑल आउट स्टेट ट्रेडिंग” अर्थात “खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं के सम्पूर्ण व्यापार को सरकार द्वारा अपने हाथ में लेने” का वास्तव में क्या मतलब है?
इसके दो भाग हैं।
* एक, एमएसपी को कानूनी दर्जा दिया जाए और कृषि उपज की सरकारी खरीद लागत खर्च से डेढ़ गुना (सी2+50%) की दर से की जाए।
* और दूसरा, खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं को सरकार आम लोगों को सस्ती दरों पर सार्वजनिक राशन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से बेचे। इसके लिए अगर किसी सब्सिडी की जरूरत है, तो सरकार को वह देनी चाहिए। क्योंकि, हमारा मत यह है कि एक सभ्य सरकार का प्राथमिक कार्य अपने नागरिकों के लिए भोजन उपलब्ध कराना होता है, न कि पूंजीपति दिग्गजों का पालन-पोषण करना। लेकिन केंद्र की सरकारें ऐसा करने को तैयार नहीं हैं। पहले की कांग्रेस सरकार ने ऐसा नहीं किया और अब केंद्र की भाजपा सरकार कृषि क्षेत्र को पूर्ण रूप से कॉरपोरेट जगत के हाथों में देने के लिए वर्तमान मार्केटिंग प्रणाली को नष्ट कर रही है।
*भाजपा सरकार का दुष्प्रचार*
क्या ऑल आउट स्टेट ट्रेडिंग लागू करना असम्भव है? हमें लगता है, नहीं. इस पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर यह बिल्कुल संभव है। लोगों को गुमराह करने के लिए केंद्र की भाजपा सरकार कई चालबाजी कर रही है। उसके जो तर्क हैं, वे निम्न हैं:
1) सरकार का कहना है कि एमएसपी लागू करने के लिए बहुत ज्यादा धन की आवश्यकता पड़ेगी। सरकारी खजाने में इतना धन नहीं है। इसलिए वित्तीय संकट के इस दौर में, धन की इतनी बड़ी रकम खर्च करना उसके लिए संभव नहीं है।
2) सरकार का यह भी कहना है कि अगर सरकार खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं की खरीद-बिक्री लागत खर्च से डेढ़ गुना (सी2+50%) की दर से शुरू करती है, तो खुदरा बाजार में आवश्यक वस्तुओं के दाम बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे, जिससे आम लोगों को भारी परेशानी होगी। इसलिए सरकार की निगाह में जो लोग एमएसपी लागू करने की वकालत कर रहे हैं, वे जनविरोधी, मजदूर विरोधी हैं।
*आइए हम उसके तर्कों की एक-एक कर जांच करें*:
हम जानते हैं कि खाद्य पदार्थ और आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। इससे आम लोगों का जीवन बहुत ही दयनीय बना हुआ है। लेकिन मंहगाई क्यों आसमान छू रही है? औद्योगिक माल के दाम बाजार में दिन प्रतिदिन क्यों बढ़ रहे हैं? यह तो स्पष्ट है कि किसान अपनी उपज को बेहद सस्ते दामों पर बेचने के लिए मजबूर हैं। जबकि आम लोग उन्हीं चीजों को अत्यधिक दामों पर खरीद रहे हैं। सवाल है क्यों? क्या इसका कारण एमएसपी है? इसका एक ही स्पष्ट उत्तर है — बिल्कुल नहीं। तो फिर, मंहगाई क्यों इतना आसमान छू रही है? क्योंकि हर चीज पर पूंजीपतियों, व्यापारिक घरानों का नियन्त्रण है। असल में सरकार का मूल्य-तंत्र पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसके अलावा, केंद्र और राज्य की सरकारों का रवैया जन-हितैषी कतई नहीं है। पूंजीपति हर मामले में अपनी मनमानी कर रहे हैं, उनका बाजार पर नियंत्रण है, मूल्य तंत्र पर भी उनका नियंत्रण है, इसीलिए वे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा लूट रहे हैं। मंहगाई बढ़ने का यही मूल कारण है। इसलिए, मंहगाई पर यदि रोक लगानी है तो तमाम आवश्यक वस्तुएं पूंजीपतियों व व्यापारिक घरानों के नियंत्रण से मुक्त करनी होंगी। इसका अन्य कोई विकल्प नहीं है। परन्तु केंद्र की बीजेपी सरकार ऐसा करने को तैयार नहीं है.
अब पैसे के सवाल पर आते हैं। सरकार का तर्क है कि उसके खजाने में धन की कमी है। क्या यह सच है? एमएसपी लागू करने के लिए कितने धन की जरूरत पड़ेगी? आइए इसकी गंभीरता से जांच करें।
फिलहाल केंद्र की भाजपा सरकार ने खेती की 23 फसलों में एमएसपी लागू करने की घोषणा की हुई है। खेती की इन सभी 23 फसलों को यदि एमएसपी दर पर खरीदा जाए तो इसके लिए 10.78 लाख करोड़ रुपए की जरूरत होगी। अब सच्चाई यह है कि इन सभी 23 फसलों की तमाम उपज बाजार में बिक्री के लिए नहीं आती। क्योंकि,
1) उत्पादित खाद्यान्नों का एक हिस्सा किसान खुद अपने खाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
2) उपज का एक हिस्सा अगले साल की फसल बोने के लिए बीज के रूप में रख लिया जाता है।
3) एक हिस्सा पशुओं के चारे के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
कृषि उपज का जितना हिस्सा बाजार में बिक्री के लिए आता है, वह नीचे दिया गया है:
1) गेहूँ: 75 प्रतिशत
2) चावल: 80 प्रतिशत
3) गन्ना: 85 प्रतिशत
4) दाल: 90 प्रतिशत
5) कपास और जूट: 95 प्रतिशत
अगर हम यह मान लें कि कृषि उपज का कुल 75 प्रतिशत हिस्सा बाजार में बिक्री के लिए आता है, तो उसे खरीदने के लिए सिर्फ 8 लाख करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी। अब, 8 लाख करोड़ रुपए की इस धनराशि में से गन्ने की कीमत बाहर निकाल देनी चाहिए। क्योंकि गन्ना चीनी मिलों के मालिकों द्वारा खरीदा जाता है। उन्हें ही इसका भुगतान किसानों को करना है। परन्तु भुगतान की इस पूरी व्यवस्था की देखभाल सरकार को करनी चाहिए। इसी तरह, सरकार को कपास या जूट की पूरी की पूरी मात्रा खरीदने की ज़रूरत नहीं है। अगर वह इन दोनों फसलों की पूरी पैदावार का आधा हिस्सा खरीद ले तो भी वह पर्याप्त होगा। क्योंकि इसका बाज़ार पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा। इसलिए, यदि केंद्र सरकार यह घोषणा कर दे कि वह लागत खर्च से डेढ़ गुना (सी2+50%) की दर से जूट और कपास की संपूर्ण पैदावार का पचास प्रतिशत खरीदेगी, तो किसानों को शेष आधे हिस्से के भी लाभकारी दाम मिल जाएंगे।
सवाल है कि सरकार खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं को खरीद कर आखिर करेगी क्या? स्पष्ट है कि सरकार आम लोगों को सस्ती दर पर बेचेगी और इस बिक्री से दो कार्य सिद्ध होंगे। पहला, यह कि इससे सरकारी खजाने में भारी मात्रा में धन जमा होगा। दूसरा, साथ ही लोगों पर महंगाई का कोई असर नहीं पड़ेगा।
अगर हम इन सभी पहलुओं को एक साथ ध्यान में लेकर विचार करें तो एमएसपी लागू करने के लिए कितने धन की जरूरत पड़ेगी? वर्तमान में सरकार एक साल में जितना खर्च करती है उससे ज्यादा से ज्यादा सिर्फ 2 लाख करोड़ रुपये की। इतनी सी मामूली धनराशि को खर्च करके सरकार किसानों और साथ ही आम लोगों को भूख और बदहाली से बचा सकती है।
इसलिए, धन की कमी का तर्क सही नहीं है, मात्र एक बहाना है। अगर धन की कमी है तो सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए इतनी बड़ी धनराशि कैसे खर्च कर सकती है? पिछले तीन सालों में सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के 15 लाख करोड़ रुपये माफ किए हैं। तब? तो धन की कमी नहीं बल्कि लोगों के प्रति सरकार का रवैया ही समस्या की मूल जड़ है। पहले की कांग्रेसी सरकारों की तरह वर्तमान भाजपा सरकार भी लोगों की नहीं है बल्कि मुट्ठीभर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की है। यही है असल बात।
दरअसल “ऑल आउट स्टेट ट्रेडिंग” अर्थात “खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं के सम्पूर्ण व्यापार को सरकार द्वारा अपने हाथ में लेने” के दो पहलू हैं। पहला, सरकार किसानों से सीधे लागत खर्च से डेढ़ गुना (सी2+50%) की दर पर फसल खरीदे — यानी एमएसपी लागू करे और दूसरा, सार्वजनिक राशन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से सरकार उन खाद्य वस्तुओं और आवश्यक वस्तुओं को आम लोगों को सस्ती कीमत पर बेचे। कोई भी जन-हितैषी सरकार वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था के तहत इस व्यवस्था को लागू कर सकती है।
लेकिन, “ऑल आउट स्टेट ट्रेडिंग” अर्थात “खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं के सम्पूर्ण व्यापार को सरकार द्वारा अपने हाथ में लेने” की इस जन-हितैषी नीति को लागू करने के लिए सरकार को खाद्य वस्तुओं और आवश्यक वस्तुओं के व्यापार के क्षेत्र से पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बाहर करना होगा। लेकिन पिछली और वर्तमान सरकारें जो कर रही हैं, वह इसके ठीक विपरीत है। वे पूरी खेती और खाद्य क्षेत्र को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने की कोशिश कर रही हैं। ऑल इण्डिया किसान खेत मजदूर संगठन कृषि बाजार की राष्ट्रीय नीति के प्रस्ताव का कड़ा विरोध और प्रतिवाद करता है और भाजपा की केंद्र सरकार से इसे तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग करता है।
हमें यकीन है कि किसान और आम लोग समय की मांग पर एक बार फिर फिर से उठ खड़े होंगे और भाजपा की केंद्र सरकार की घृणित साजिश को विफल करने के लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे। “हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे।”
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