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बहुजन भाईचारा मैत्री मिशन उत्तर प्रदेश के दलितों की मौतों का लेगा हिसाब

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संजय कनोजिया की कलम से” ✍️
उत्तर प्रदेश के आगामी 2022 के विधानसभा चुनाव में “बहुजन भाईचारा मैत्री मिशन” भाईचारे व मैत्री के नव-जागरण के सुधारवादी आंदोलन सहित अपने राजनैतिक एजेंडे के अभियान को भी गति देगा..उ०प्र० के मुख्यमंत्री योगी राज में दलितों की मौत-अत्याचार व सामाजिक शोषण के हिसाब का, केवल प्रचार-प्रसार द्वारा अभियान चलाएगा..जुलाई 2021 के प्रथम सप्ताह में दिल्ली में मिशन के संस्थापक सदस्य डॉ. एस. एन. गौतम,  पूर्व IRS अधिकारी कमल किशोर कठेरिया, वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण मांझी और में स्वयं संजय कनोजिया,  इस गंभीर विषय पर चर्चा कर रणनीति की रूप रेखा तय करेंगे..मिशन शोषितों को जागृत करेगा कि एक इंसान की मौत से परिवार-मोहल्ला-नगर-राज्य ही नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति को भी प्रभावित करता है..आखिर देश के विकास में अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति का भी देश की GDP को बढ़ाने में,आर्थिक सहयोग सदैव रहा है !
                     पिछले साढ़े 4 वर्षों में राम-राज्य की स्थापना करने वाले, योगी के तानाशाही व गैर-जिम्मेदारियों से यूँ तो सभी वर्ग..केवल विरोध तक ही सीमित नहीं, बल्कि योगी के महाजंगलराज से त्राहिमाम करता हुआ..भय-दहशत-और घुटन के माहौल ने सभी समुदायों में सरकार के प्रति नफ़रत  पैदा कर दी है..अपराधी ही नहीं पुलिस प्रशासन भी निर्ममता की सभी हदें लांघ चुके है..कुल मिलाकर सरकार का इक़बाल खत्म हो गया है, कहीं भी कानून का राज नहीं दिखता..सरकार खुद आम नागरिकों के खिलाफ़ युद्ध में उतरी हुई है ऐसा प्रतीत होता है..इस तरह की  निर्ममताओं से दलित वर्ग बुरी तरह प्रभावित हुआ है..सूबे का दलित वर्ग आज भी हाथरस काण्ड को नहीं भूला, जहाँ एक नाबालिक लड़की का गैंग-रेप किया गया, ठीक से जांच करने के बजाए, प्रशासन-पुलिस-अस्पताल और पाखंडी समाज के तानो-बानो ने पूरी तरह से इंसानियत का बलात्कार कर, आधी-रात को चुपचाप दाह-संस्कार कर डाला और योगी सरकार चुप्पी साधे रही, बल्कि हाथरस में आरोपियों के समर्थन में ठाकुर समाज उतरकर दबंगई दिखाने लगा..आज हाथरस में वाल्मीकि समाज की इस बेटी के परिजन सिर्फ राशन पर ही जिन्दा हैं, अदालती कार्येवाही हेतू लखनऊ जाने का खर्चा भी उन्हें खुद ही उठाना पड़ता है, साथ में दिखाने भर के लिए मिली नाम के सुरक्षाकर्मियों का खर्चा भी इस पीड़ित परिवार को ही उठाना पड़ता है..कहते है कि भीड़ कि कोई शक्ल नहीं होती, कोई दीन-धर्म नहीं होता और इसी बात का फायदा हमेशा मॉब-लिंचिंग करने वाली भीड़ उठाती है..सवाल है कि इस भीड़ को इकठ्ठा करता कौन है ?..जो सिर्फ कमजोर वर्ग को ही निशाना बनाती है, वर्ष 2017 से तो गौ-रक्षा के नाम पर गुंडई करने वाले इतने बेकाबू हो गए कि  37 ऐसे मामले हुए जिनमे 11 लोगों कि मौत हुई जबकि 152 लोग जख्मी हुए..केवल उ०प्र० में ही वर्ष 2014 से 2019 तक गौ-रक्षा के नाम पर 120 मामलों में 50% फीसदी शिकार मुसलमान हुए लेकिन 20% शिकार लोगों कि धर्म-जाति मालूम ही नहीं चल पाई परन्तु 11 फीसदी दलितों को भी गौ-रक्षा के नाम पर अपनी जान गंवानी पड़ी ! 
              सिर्फ और सिर्फ जातिये हीनभावनाओं से ग्रसित स्वर्ण जातियों के दबंगियों द्वारा दलितों पर हुए अपराधिक मामलों पर नज़र डालें तो वर्ष 2017 में 11, 924 और वर्ष 2018 में 11, 444 मामले सामने आये थे..उ०प्र० में दलितों कि हत्या कि दर, देश के अन्य सभी राज्यों से दुगनी है, ये स्थिति तब है जब अनुसूचित जाति/ अनुसूचित-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989, जिसे पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी.पी. सिंह जी द्वारा देश के दलितों कि सुरक्षा का कानून बनाकर इस शोषित वर्ग को उपहार में दिया था..उ०प्र० में दलित उत्पीड़न के मामलों में बेतहाशा वृद्धि कि एक वजह यह है कि थानों पर थानाध्यक्षों की नियुक्ति में 21 फीसदी का आरक्षण होने के बावजूद भी थानों पर उनकी बहुत ही कम नियुक्ति की जाती है..जिसका सीधा प्रभाव दलित उत्पीड़न से सम्बंधित मामलों के FIR पर पड़ता है..दूसरा बड़ा कारण है कि जिन्हें दलितों कि आवाज़ आवाज़ उठानी चाहिए थी वह इस ओर ज़मीन पर ना उतरकर केवल ट्विटर से विरोध जताते हैं..दलितों कि रहनुमाई का दावा करने वाली मायावती सीबीआई और इंफोर्स्मेंट के डर एवं अपनी भ्रष्ट राजनीति के कारण ना सिर्फ सरकार द्वारा प्रायोजित हमलों के खिलाफ़ चुप रहती हैं बल्कि वह तो अपने कार्य्रकर्ताओं को किसी भी तरह के धरने-प्रदर्शनों या आंदोलन करने पर भी रोक लगा देती हैं..जैसा कि वर्ष 2019 में सोनभद्र जिले के मुर्तिया गांव में हुए जनसंहार, जो कि 32 ट्रेक्टरों में सवार 200 दबंगों ने आधे घंटे गोलियां बरसाकर 10 आदिवासियों कि लाशें बिछा दी थीं, लेकिन मायावती ने मौखिक विरोध जताया..कौशाम्बी में अपने मवेशियों को नहर का पानी पिलाने गई सुनीता देवी और उसके बच्चों को केवल इसलिए पीट दिया जाता हैं, क्योकिं गांव के दबंग कहते हैं कि ये नहर उनकी सम्पति हैं..इलाहाबाद में महज 4 रुपए के लिए दो दलित की हत्या कर दी जाती हैं..सोनभद्र में ही अगड़ी जाति के लोग महिला को डायन करार देकर मार डालते हैं..अन्तरजातिये संबंधों की वजह से दलित युवक को बंधक बनाकर पहले पीटा जाता हैं फिर जिन्दा जला दिया जाता हैं, सदमे से माँ की भी  मौत हो जाती हैं..महिलाओं को मंदिरों में घुसने नहीं दिया जाता हैं..खेत में शौच के लिए गई दलित महिला का गैंग-रेप कर दिया जाता हैं..आजमगढ़ जिले में दलित प्रधान की हत्या कर दी जाती हैं..दलित महिला की जीभ काट दी जाती हैं..अमेठी जिले में दलित ग्राम प्रधान के पति को जिन्दा जला दिया जाता हैं..फतेहपुर में दो दलित बहनो की हत्या कर लाश को तालाब में फेंक दिया जाता हैं..सरकारी हैंडपंप छूने पर दलित की पिटाई कर दी जाती हैं..बांदा जिले में दबंगों की  पिटाई से डरे दलित परिवारों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता हैं..चारा लेने गई तीन दलित बहनो में दो की संदिग्ध मौत हो जाती हैं तीसरी नाजुक हालत में पहुंचकर अपाहिज हो जाती हैं..दलित दूल्हे को धमकी दी जाती हैं कि घोड़ी चढ़ा तो हमला सहना होगा आदि-आदि अनगिनत ऐसे मामले हैं जिसपर शीशमहल में बैठी मायावती की चुप्पी तमाम दलित वर्ग के लिए प्रश्न-चिन्ह बनकर रह गई हैं !                  अतः “बहुजन भाईचारा मैत्री मिशन” दलितों की तमाम मौतों और अत्याचारों  को लेकर एवं “टूंक रोटी और नमक” फार्मूले पर भाईचारे का प्रचारक बन सुधारवादी अभियान चलाएगा !!                (  लेखक संस्थापक सदस्य बहुजन भाईचारा मैत्री मिशन है)

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