-सुसंस्कृति परिहार
संभवतः यह पहला मौका है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ख़िलाफ़ उसकी स्थापना के सौ वर्ष बाद बहुजन समाज ने उसके औरंगाबाद कार्यालय पहुंचकर संघ के उरोज काल में हज़ारों हज़ार लोगों के साथ दफ्तर की घेराबंदी कर उस पर बेन लगाने की आवाज़ बुलंद की है। बताया जा रहा है कि उन्होंने संविधान और तिरंगा झंडा देने की बात की ,जिसे नकार दिया।ये उनकी कमज़ोर नस पर वार था। हालांकि हम सभी जानते हैं कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ के अनुषंगी संगठन हिंदू सभा के नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना सभा में जाते हुए उन पर गोली दागकर हत्या की थी।तब तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से इस संगठन पर बेन लगवाया था। बाद में उसे सांस्कृतिक संगठन के रुप में नेहरू जी ने छूट प्रदान की थी। लेकिन शासकीय कर्मचारियों को उससे दूर रहने सम्बंधी नियम बनाए गए थे।जो 2013 तक प्रभावी रहे। लेकिन 2014 के बाद संघ पोषित भाजपा सरकार ने इस नियम को ना केवल तोड़ा बल्कि संघ के कार्यकर्ताओं का सरकार में दख़ल बढ़ा। उच्च पदों यहां तक कि न्यायपालिका जैसे महत्वपूर्ण जगहों पर खुलकर कई न्यायाधीश सामने आ गये। जिससे दबी ज़बान से गंभीर चर्चा होती रही लेकिन कभी इस तरह के प्रर्दशन की हिमाकत किसी दल या सामाजिक संगठन ने नहीं की। सिर्फ विपक्ष के नेता राहुल गांधी और जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने ही संघवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। कन्हैया कुमार का संघवाद से आज़ादी का नारा आज बहुजन समाज और विरोधी दलों के आंदोलन में गूंजता रहता है।
विदित हो,कांग्रेस राज में ही सांस्कृतिक संगठन और शैक्षणिक संस्थानों में घुसपैठ करते हुए ही गांव-गांव संघ ने अपनी ज़मीन पुख्ता की है।यह सच है। इसलिए इससे लड़ने की ताकत देश की बड़ी आबादी बहुजन समाज के ही जिम्मे आती है। नागपुर और मुंबई में संघवाद के ख़िलाफ़ जो बड़ा प्रर्दशन हुआ है।उससे यह आस बंधती है कि यदि बहुजन समाज वास्तव में जाग गया है तो उनकी सरकार रहते हुए ही उससे मुक्त होना पड़ेगा।
कर्नाटक सरकार ने जिस तरह अपने राज्य में संघ को बेन किया है और शासकीय कर्मचारियों को चेतावनी दी है उसका उल्लंघन करने वाले कर्मचारी पर कार्रवाई सुनिश्चित की है।वह सराहनीय है।
वामसेफ और अन्य संगठनों ने जिस तरह संघ के पंजीकरण ना होने, और आर्थिक लेन देन ,बैंक खातों वगैरह की जानकारी नहीं दी जाती उसका जवाब मांगा है।जो उनके पास नहीं है।यह भारतीय संविधान के तहत् एक बड़ा अपराध है इसलिए संघ को बेन कर जांच की मांग की गई है।यह बात इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक छोटे दूकान दार से लेकर साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक संगठन सब के लिए पंजीयन और आडिट ज़रुरी होता है। लेकिन संघ का नहीं आखिरकार क्यों ? वास्तव में इनके पास कोई हिसाब किताब इनके पास नहीं है। आश्चर्यजनक तो यह है कि जिस संगठन के महत्वपूर्ण किरदार कथित हेडगेवार और सावरकर आज़ादी के समय देश के आज़ादी आंदोलन के ग़द्दार हैं आज उनका आलीशान भव्य महलनुमा कार्यालय नागपुर के बाद देश की राजधानी में स्थापित हो चुका है।ये किस लूट का पैसा है क्या भारत सरकार ने उसे दिलाया है संदिग्ध है। सर संघचालक को वीवीआईपी सुरक्षा दी गई है यह क्यों?
जबकि अब वह खुलेतौर पर एक राजनैतिक संगठन के रुप में कार्य कर रहा है और संघवाद की पुनरावृत्ति में लगा है जिसमें मनुसंहिता के कानून प्रविष्ट होते जा रहे हैं तथा संविधान की मूल भावना का सरे आम दफ़न हो रहा है।
बेहतर है,कि देर से सही बहुजन समाज ने संघ की मनुवादी भावनाओं को समझा है और इतनी बड़ी तादाद में उपस्थित होकर सीधे उनके अस्तित्व को चुनौती दी है।
जिस देश में कांग्रेस ने अपने शासनकाल में सर्वशिक्षा और सबके मौलिक अधिकार की समानता के तहत् संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया था जिसकी बदौलत सर्वोच्च न्यायालय में आज सीजेआई पद पर गवई साहब विराजमान हैं। किंतु कितना शर्मनाक है-भाजपा शासन में उनके ऊपर जूता फेंका जाना ।इसकी वजह वही बढ़ती मनुवादी प्रवृत्ति है जिसे संघनीत भाजपा सरकार ने छूट दे रखी है। इसी कड़ी में आईपीएस वाई पूरन कुमार 2001 बैच के इस आईपीएस अधिकारी ने 7 अक्टूबर, 2025 को चंडीगढ़ स्थित अपने आवास पर आत्महत्या कर ली।वे भी दलित समाज से थे।उन्होंने आठ पन्नों का सुसाइड नोट छोड़ा, जिसमें उन्होंने कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर जातिगत भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया।
इन बड़ी घटनाओं के बरक्स देश भर में दलित, पिछड़े लोगों को आए दिन पीट पीट कर मारने के जो समाचार मिलते हैं वे द्रवित कर देने वाले होते हैं।ऐसा ही पिछले सालों में अल्पसंख्यकों के साथ लव-जिहाद और गौकशी को लेकर अनेकों मामले हुए हैं। आदिवासी समाज को भी ये नहीं बख़्श रहे हैं।उनके जल जंगल छीनकर उनकी मूल पहचान मिटाने में लगे हुए हैं।सोनम वांगचुक का मामला जिस तरह राष्ट्रद्रोह का बनाया गया।उससे देशवासी ही नहीं विदेशी भी हतप्रभ हैं। लगता तो ऐसा है कि वे सिर्फ सवर्णों के रक्षक है। बाकी सबको गुलाम बनाना चाहते हैं।
यक़ीनन यह वक्त ही संभल जाने का है। इसके लिए बहुजन समाज की जागृति और सच्चे उन देशभक्तों की ज़रुरत है जो संविधान में आस्था रखते हैं तथा भारत की मिलीजुली संस्कृति और समन्वय के साथ सबके साथ आगे बढ़ने के उत्सुक हैं। बहुजन समाज की यह दस्तक संघ और भाजपा के लिए बड़ी चुनौती और चेतावनी है।

