(ऑल इंडिया बैंक ऑफ़िसर्स कन्फ़ेडरेशन के पूर्व महासचिव थॉमस फ्रैंको मौजूदा समय में पीपुल्स कमीशन ऑन पब्लिक सेक्टर एंड पब्लिक सर्विसिस के संयोजक हैं। कुणाल कामरा ने अपने शो नोप (NOPE) में उनसे बात की।
यहां हम इस पूरी बातचीत को टेक्स्ट साक्षात्कार के रूप में रख रहे हैं। इसे यूट्यूब पर यहां (https://www.youtube.com/watch?v=gDRVxlMjebI ) भी देखा जा सकता है। बैंकिंग सिस्टम को समझने के लिए यह एक महत्वपूर्ण इंटरव्यू है। इससे यह भी पता चलता है कि क्यों बैंक अडानी को लोन दे रहे हैं और एक किसान को नहीं? क्यों रिलायंस का हजारों करोड़ माफ़ हो जाता है और एजुकेशन लोन लेने वाले युवक को दबाव में आत्महत्या करनी पड़ती है?
इससे यह भी पता चलता है कि क्या अब भी कोई रास्ता है कि इस सब को सुधारा जा सके?-मॉडरेटर)
कुणाल कामराः सर, आपने बैंकिंग में लगभग चार दशक बिताए हैं। मैं शुरुआत एक सवाल से करना चाहता हूं – पब्लिक सेक्टर बैंकों के बारे में अक्सर या तो मज़ाक सुनने को मिलता है या फिर बुरी ख़बरें। ऐसा क्यों है?
थॉमस फ़्रेंको: देखिए, पब्लिक सेक्टर बैंकों के लक्ष्य 1991 के बाद बदल गए, जब एलपीजी यानी लिबरलाइज़ेशन, प्राइवेटाइज़ेशन और ग्लोबलाइज़ेशन की नीति आई। इससे तीन बड़ी समस्याएं सामने आईं। सबसे बड़ी समस्या थी स्टाफ़ की कमी। कारोबार बहुत तेज़ी से बढ़ रहा था लेकिन कर्मचारियों की संख्या नहीं बढ़ाई गई। बीच के कई सालों तक भर्ती पर रोक लगी रही। उसके बाद हमें भर्ती की मांग को लेकर आंदोलन करना पड़ा।
एक छोटा सा आंकड़ा देखिए- भारत का सबसे बड़ा बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, जहां मैं काम करता था, वहां एक कर्मचारी औसतन 2,119 ग्राहकों को संभालता है। जबकि HDFC बैंक, जो SBI का निजी क्षेत्र का प्रतिस्पर्धी है, वहां यह संख्या सिर्फ़ 359 है। यानी SBI का स्टाफ़ निजी बैंक के मुकाबले लगभग छह गुना ज़्यादा ग्राहकों को संभाल रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि लोग असंतुष्ट होंगे और सेवा की गुणवत्ता कमज़ोर होगी।
दूसरी बात है राष्ट्रीयकरण। 1947 के बाद बैंक निजी क्षेत्र के थे। असल में, 1955 में इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण हुआ और उससे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बना। इसके बाद दो बड़ी समितियों की रिपोर्ट आई- एक महालनोबिस समिति और दूसरी आर के हज़ारी समिति। दोनों ने दिखाया कि किसानों और छोटे उद्योगों को बिल्कुल भी कर्ज़ नहीं दिया जा रहा था। सिर्फ़ 9% ऋण ही किसानों और छोटे उद्योगों तक पहुंच रहा था, बाकी सब बड़े उद्योगपतियों, दोस्तों, के पास जा रहा था।
ग्रामीण इलाकों और छोटे उद्योगों के बीच तो बैंक शाखाएं ही नहीं थीं। इसी वजह से श्रीमती इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई, 1969 को राष्ट्रीयकरण किया। राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य मुनाफ़ा कमाना नहीं था, बल्कि आम आदमी को सेवा देना था देशभर में, ख़ासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना, क्रेडिट-डिपॉज़िट रेशियो सुधारना, और पिछड़े राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में शाखाएं बढ़ाना।
शुरुआत में 1969 में 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ और बाद में 1980 में छह और बैंकों का। इसके बाद पूरा परिदृश्य बदल गया। अगर आप 1970 और 1991 की तुलना करें तो 1991 तक ग्रामीण शाखाएं कुल शाखाओं का बड़ा, 58%, हिस्सा बन गईं। क्रेडिट-डिपॉज़िट रेशियो भी बहुत बढ़ा। आम आदमी को कर्ज़ मिलने लगा। 1971 में ही 25% लोन छोटे कर्ज़दारों (10,000 रुपये से कम) को दिए गए थे। 1991 में यह आंकड़ा फिर 95% तक पहुंच गया।
लेकिन फिर दिशा बदल गई। विश्व बैंक से लिए गए ऋण के बाद एक समिति बनी- नरसिंहन समिति। इसने सिफ़ारिश की कि बैंकिंग एक व्यवसाय है और इसे मुनाफ़े के लिए होना चाहिए। क्यों प्राथमिक क्षेत्र को सस्ता कर्ज़ दिया जाए? बैंकिंग को लाभकारी बनाइए। इसके बाद धीरे-धीरे सब बदलने लगा।
एक अहम आंकड़ा है- 1941 और 1991 के बीच, राष्ट्रीयकरण के बाद आय का अंतर कम हुआ। अमीर 1% लोग, जिनके पास देश की 21% संपत्ति थी, उनकी हिस्सेदारी घटकर 6% रह गई। वहीं नीचे के 51% लोगों की हिस्सेदारी बढ़ी। लेकिन 1991 के बाद हालात बदल गए। अब हम देख रहे हैं कि आबादी का 1% ही देश की 50% से ज़्यादा संपत्ति पर क़ब्ज़ा किए हुए है।
यहां बैंकों ने बहुत अहम भूमिका निभाई। देश के GDP का 74% बैंक जमा से आता है। लगभग इतना ही बैंक ऋण से भी आता है। यानी भारत एक बैंक-आधारित अर्थव्यवस्था है। लेकिन दिशा बदल गई और हमने कॉर्पोरेट्स, बड़ी इंडस्ट्रीज़ और इंफ्रास्ट्रक्चर को ज़्यादा कर्ज़ देना शुरू कर दिया।
ख़ासकर 1991 के बाद, डेवलपमेंट फ़ाइनेंशियल इंस्टिट्यूशन, इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया, इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, UTI जैसी संस्थाओं को नियमित बैंकों में बदल दिया गया। ये संस्थाएं पहले दीर्घकालिक कर्ज़ देती थीं। लेकिन लंबी अवधि का कर्ज़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर डाल दिया गया, जिनके पास उस समय उतनी विशेषज्ञता नहीं थी। नतीजतन नॉन-परफ़ॉर्मिंग एसेट्स (NPA) बढ़ गए। लोग असंतुष्ट हो गए कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक उनका साथ नहीं दे रहे।
असल में यह सरकार की नीतियों की वजह से हुआ, ख़ासकर पिछले दस सालों में। जब यह सरकार 2014 में सत्ता में आई, तो जनवरी 2015 में पुणे में एक बैठक हुई जिसे ज्ञान संगम कहा गया। इसमें सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मैनेजिंग डायरेक्टर्स को बुलाया गया। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री भी मौजूद थे। वहां उन्हें बताया गया कि निजी क्षेत्र के बैंकों की तरह काम करना है…
कुणाल कामराः लेकिन निजी क्षेत्र के बैंक इस बैठक में मौजूद नहीं थे… सिर्फ़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही मौजूद थे?
थॉमस फ़्रेंको: नहीं सिर्फ़ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुख ही थे। उन्हीं को निर्देश दिए गए। धीरे-धीरे बदलाव शुरू हुआ।
राष्ट्रीयकरण के बाद एक लीड बैंक स्कीम आई थी, जिसके तहत हर ज़िले को एक सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक सौंपा गया था। उन्हें पांच साल का क्रेडिट प्लान और वार्षिक क्रेडिट प्लान तैयार करना होता था। 1982 में राष्ट्रीय कृषि बैंक, नाबार्ड, अस्तित्व में आया। उसने भी कृषि और ग्रामीण कर्ज़ के लिए पोटेंशियल लिंक्ड क्रेडिट प्लान बनाने को कहा, जिसे बाद में वार्षिक क्रेडिट प्लान में बदल दिया गया। यानी एक ज़िले को समग्र रूप से विकसित करने का दृष्टिकोण था।
फिर सर्विस एरिया अप्रोच आई, जिसमें हर बैंक शाखा को कुछ गांव सौंपे गए कि उनकी देखभाल करनी है। यह सब बदल गया। प्राथमिक क्षेत्र को दिए जाने वाले कर्ज़ का 40% किसानों, छोटे उद्योगों और गांव की इंडस्ट्रीज़ को जाना था। लेकिन इस सरकार ने इसे धीरे-धीरे बदल दिया। अब कोई बैंक अगर 100 करोड़ का लोन किसी फ़ूड प्रोसेसिंग या वॉटर प्रोसेसिंग प्लांट को देता है, तो उसे भी प्राथमिक क्षेत्र माना जाता है। कोई छोटा उद्योग जिसका टर्न ओवर 250 करोड़ है, उसे भी प्राथमिक क्षेत्र में गिना जाता है।
नतीजा यह हुआ कि छोटे कर्ज़ कम हो गए। और अगर आप इसे स्टाफ़ की स्थिति से जोड़ें, तो तस्वीर साफ़ हो जाती है।
मैं तीन शाखाओं में शाखा प्रबंधक रहा हूं। जब मैं नागालैंड में था, हम गांवों में जाते थे और लोगों से कहते थे कि आकर खाता खोलें। वे नक़द पैसे बांस के डिब्बे में भरकर लाते थे। बांस का डिब्बा नोटों से भरा होता था, उन्हें गिनना भी नहीं आता था, बस रख देते थे और कहते थे- आप गिनिए और खाता खोल दीजिए। जिस शाखा में मैं नागालैंड में काम करता था, संसानु नाम की, आज उसे बंद कर दिया गया है, यह कहकर कि वह लाभकारी शाखा नहीं है। उस समय लाभ कमाना उद्देश्य नहीं था। लेकिन नीतियों के बदलाव से सब बदल गया।
जैसा मैंने बताया, जब मैं पहली बार शाखा प्रबंधक बना तो मेरे पास चार फ़ील्ड ऑफ़िसर थे। मैं उन्हें पूरे बाज़ार में भेजता था कि पता करें किन लोगों के यहां खाते हैं, कौन लोग यहां से कर्ज़ लेते हैं, और अगर नहीं तो कहां से लेते हैं। सुबह का बड़ा सब्ज़ी बाज़ार होता था। महिलाएं खाली पत्तों के डिब्बे लेकर आती थीं। वहां एक महाजन खड़ा होता था। वे उससे 500 रुपये का कर्ज़ लेतीं, लेकिन वह सिर्फ़ 450 रुपये देता था और उसे 500 रुपये मान लिया जाता था। वे थोक विक्रेताओं से सब्ज़ी ख़रीदतीं, दिन भर बेचतीं और शाम को 500 रुपये वापस कर देतीं। आप देखिए ब्याज की दर क्या थी?
कुणाल कामराः यानी ब्याज दर 10% प्रति दिन!
फ़्रेको: जी…
तब हमने क्या किया- मैंने फ़ील्ड ऑफ़िसरों से कहा कि इन सबको 5,000 रुपये का कर्ज़ दीजिए ताकि वे महाजनों से छुटकारा पा सकें। इससे बहुत बड़ा बदलाव आया। आसपास के दुकानदारों को भी हम कर्ज़ दे पाए, किसानों को भी। लेकिन दो साल बाद फ़ील्ड ऑफ़िस घटकर दो रह गए, फिर एक।
फिर मुझे लक्ष्य दिया गया कि 100 करोड़ का लोन देना है। अब अगर मैं 1,000 लोगों को छोटे-छोटे लोन देता तो मुश्किल होता। इसलिए मैंने 100 लोगों को 1 करोड़ का लोन दिया और लक्ष्य पूरा कर लिया। यही है कि बैंकिंग कैसे बदल गई।
आज कॉर्पोरेट्स को बेहद सस्ता कर्ज़ मिल रहा है, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। RBI के आंकड़े बताते हैं कि इस देश में 449 कॉर्पोरेट्स जिनके पास 100 करोड़ से ऊपर का लोन है, उन्हें सिर्फ़ 4% वार्षिक ब्याज दर पर लोन दिया जा रहा है।
कुणाल कामराः सालाना?
फ़्रेकोंः सालाना… और यह सिर्फ़ बैंक का फ़ैसला नहीं है, यह RBI और भारत सरकार की नीति है। कहीं भी आपको ऐसा विज्ञापन नहीं मिलेगा कि आइए और 4% पर लोन लीजिए।
एक नीति थी, जो अब भी मौजूद है, लेकिन उस पर अमल नहीं हो रहा।
राष्ट्रीयकरण के बाद प्राथमिक क्षेत्र के तहत बैंकों को कहा गया था कि कुल ऋण का 1% सबसे कमज़ोर वर्ग को 4% साधारण ब्याज दर पर देना होगा। अब कोई बैंक नहीं देता है लेकिन कॉर्पोरेट्स 4% पर कर्ज़ ले रहे हैं।
एक उदाहरण है, देश के सबसे गरीब आदमी हैं– टाटा – उन्होंने एयर इंडिया को खरीदा और बैंक ने उन्हें 10,000 करोड़ का लोन 4% पर दिया। यानी आज कॉर्पोरेट्स को पूरा समर्थन मिल रहा है। जैसा मैंने पहले कहा था, पहले 95% छोटा कर्ज़ आम आदमी को जाता था, अब यह घटकर लगभग 30% रह गया है। कॉर्पोरेट ऋण बढ़ रहा है और यही कॉर्पोरेट्स हैं जो अपने लोन वापस नहीं चुकाते।
कुणाल कामराः अगर कोई छोटा उधार लेने वाला 50,000 रुपये का लोन नहीं चुकाता तो क्या होता है, और अगर कोई कॉर्पोरेट करोड़ों का लोन नहीं चुकाता तो क्या होता है।
थॉमस फ़्रेंको: छोटा उधार लेने वाला अगर लोन नहीं चुकाता। मान लो उसने 50,000 का लोन लिया है और वह नहीं चुका रहा तो बैंक नोटिस भेजता है और सुबह उसके दरवाज़े पर खड़ा हो जाता है। वह शर्मिंदा होता है, कहीं और से उधार लेकर आता है और चुका देता है। कई मामलों में रिकवरी के दबाव के कारण किसानों की आत्महत्याएं भी हुई हैं। आपने कभी देखा है कि कोई अमीर आदमी, जिसने करोड़ों का लोन लिया हो, आत्महत्या करता हो? नहीं।
अनिल अंबानी की एक कंपनी पर 46,000 करोड़ का बकाया था। इस सरकार ने इन्सॉल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड के तहत एक नई प्रक्रिया शुरू की। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) बनाए गए। वहां लोन ट्रांसफ़र होता है, विवाद निपटाने की व्यवस्था होती है। सामने एक रिटायर्ड जज बैठते हैं, बीच में एक ब्रोकर होता है – रिटायर्ड बैंकर या चार्टर्ड अकाउंटेंट होता है। वे बातचीत करते हैं और लोन सेटल हो जाता है। इसे हेयरकट कहते हैं।
मान लीजिए आपको 100 करोड़ चुकाना है, आप सिर्फ़ 1 करोड़ चुकाते हैं और बाकी 99 करोड़ माफ़ हो जाते हैं। अनिल अंबानी के मामले में उन्होंने 46,000 करोड़ में से सिर्फ़ 453 करोड़ चुकाए। यानी बकाया का 2% भी नहीं। और लोन सेटल हो गया। लोन किसने लिया? उनके ही बड़े भाई, मुकेश अंबानी ने… फिर सबसे गरीब आदमी।
इसी तरह वेदांता अग्रवाल (स्टरलाइट अग्रवाल) ने 19 कंपनियां अपने अधीन लीं- वीडियोकॉन में, 95% हेयरकट के साथ। बकाया 72,000 करोड़ था, उन्होंने सिर्फ़ 5% चुकाया और कंपनियां ले लीं। यही कॉर्पोरेट लोन सेटलमेंट की हकीकत है।
लेकिन छोटे उधार लेने वालों के लिए स्थिति अलग है। पहला, उनकी ब्याज दर बहुत ऊंची होती है। दूसरा, अगर वे नहीं चुकाते तो बैंक दबाव डालता है। एक नई व्यवस्था शुरू हुई है- लोन को एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को बेच दिया जाता है।
तमिलनाडु के मदुरै में एक शारीरिक रूप से दिव्यांग छात्र को शिक्षा लोन दिया गया था, 11% ब्याज दर पर। वह तुरंत नौकरी नहीं पा सका, इसलिए चुका नहीं पाया। बैंक ने उसका लोन रिलायंस एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को बेच दिया। रिलायंस, जो खुद सबसे बड़े कर्ज़दारों में से है, बैंक को सिर्फ़ 15% रकम चुकाता है और ये लोन ख़रीद लेता है। फिर वे अपने लोग भेजते हैं वसूली के लिए। उन्होंने उस छात्र के साथ दुर्व्यवहार किया और उसने आत्महत्या कर ली।
तो छोटे उधार लेने वालों के मामले में, अगर 100 लोग डिफ़ॉल्ट करें, रकम छोटी होती है। लेकिन अगर एक कॉर्पोरेट डिफ़ॉल्ट करता है, तो बैंक की बैलेंस शीट पर सीधा असर पड़ता है।
अब क्या हो रहा है—आप लोन देते हैं, वे नहीं चुकाते, उसे नॉन-परफ़ॉर्मिंग एसेट (NPA) कहते हैं। फिर या तो एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को बेच देते हैं, या सीधा समझौता करते हैं, या NCLT में मामला जाता है। नतीजा यह होता है कि बैंक को नुकसान होता है, लेकिन खरीदार और उधारकर्ता दोनों के लिए यह विन-विन सिचुएशन बन जाती है।
कुणाल कामराः यानी मेरी समझ से यह है कि अगर कोई लोन नहीं चुकाता, तो बैंक उसे जिस भी प्रतिशत पर चाहे बेच सकता है। और जिसको बेचा जाता है, उसे पूरा अधिकार होता है कि वह मूल रकम और ब्याज वसूल करे।
थॉमस फ़्रेंको: हां, ये लोन तब तक बोझ बने रहते हैं जब तक पूरी रकम चुकाई न जाए। माता-पिता परेशान रहते हैं। फिर सिबिल स्कोर की समस्या आती है। एक बार अगर आप डिफ़ॉल्ट कर दें तो आपका उधार लेने का स्कोर गिर जाता है। फिर आप किसी भी बैंक से नया लोन नहीं ले सकते।
यह सरकार दावा करती है कि उसने 51 करोड़ लोगों को मुद्रा लोन दिए हैं। इन लोन की सीमा पहले 50,000 से 10 लाख तक थी, अब इसे बढ़ाकर 20 लाख कर दिया गया है। लेकिन यह आंकड़ा झूठा है। जनगणना के अनुसार इस देश में कुल 18 करोड़ परिवार हैं। अब यह संख्या शायद 20–25 करोड़ तक पहुंची होगी। अगर 51 करोड़ लोगों ने लोन लिया होता तो हर घर में दो-दो लोन होते और हर जगह छोटे उद्यम फल-फूल रहे होते। क्या हम ऐसा देखते हैं? नहीं।
कई युवाओं ने यह लोन लिया होगा और वे उसे वापस नहीं चुकाते क्योंकि सत्ताधारी दल के लोग जाकर कहते हैं, “ये तो मोदी जी दे रहे हैं, उसे वापस चुकाने की ज़रूरत नहीं है।” नतीजा यह है कि भुगतान नहीं हो रहा।
बैंकों के पास एक बचाव का रास्ता है- क्रेडिट गारंटी स्कीम। इसके तहत वे बकाया का एक हिस्सा वसूल कर लेते हैं, आम तौर पर 75% तक। बाकी लिख दिया जाता है। लेकिन उस गरीब उधारकर्ता का नाम सिबिल में दर्ज हो जाता है। फिर वह कभी दूसरा लोन नहीं ले सकता। यहां तक कि जब उसके बच्चे लोन लेने जाते हैं तो उनका स्कोर भी प्रभावित होता है- “कि आपके पिता का बकाया है।” लोग यह नहीं समझते।
आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि बैंक छोटे जमाकर्ताओं से बहुत सस्ती दर पर पैसा लेते हैं और उसे महंगी दर पर छोटे कर्ज़दारों को देते हैं – शिक्षा लोन, MSME लोन, किसान लोन – इन सब पर 11–12% ब्याज। जबकि कॉर्पोरेट्स को सस्ता कर्ज़ मिलता है।
कुणाल कामराः शादी के लिए, प्रॉपर्टी बनाने के लिए, किसी भी चीज़ के लिए…
थॉमस फ़्रेंको: हां… हाउसिंग लोन थोड़ा सस्ता है क्योंकि वह इमारत से सुरक्षित होता है।
लेकिन असली सवाल यह है कि बैंक इतना पैसा कहां से लाते हैं? उनके पास इतनी पूंजी नहीं होती। उदाहरण के लिए HDFC की पूंजी सिर्फ़ 750 करोड़ है, लेकिन उसकी जमा राशि 21 लाख करोड़ है। यह आम आदमी ही है जो पैसा जमा करता है। RBI के आंकड़े बताते हैं कि 80% जमा राशि छोटे जमाकर्ताओं की होती है, जिसे हाउसहोल्ड डिपॉज़िट कहते हैं।
एक समय था जब बचत खाते पर 6% ब्याज मिलता था। अब यह घटकर 2.5% रह गया है। फ़िक्स्ड डिपॉज़िट पर पहले 18% तक ब्याज मिलता था, आज यह घटकर 6.5–6.75% रह गया है। बिना इन जमाओं के बैंक के पास लोन देने के लिए पैसा ही नहीं है।
तो बैंक छोटे जमाकर्ताओं से सस्ता पैसा लेते हैं और कॉर्पोरेट्स को सस्ते में देते हैं। लेकिन वही जमाकर्ता अगर हाउसिंग लोन, शिक्षा लोन या MSME लोन चाहता है तो उसे 11–12% ब्याज देना पड़ता है। यही सबसे बड़ी त्रासदी है।
और अगर सभी जमाकर्ता यह तय कर लें कि वे अपना पैसा बैंक में नहीं रखेंगे क्योंकि ब्याज दर बहुत कम है, तो पूरा सिस्टम तुरंत ढह जाएगा। बैंक यह नहीं समझ रहे, RBI भी नहीं समझ रहा। धीरे-धीरे हालात बदल रहे हैं।
पिछले पचास सालों में, पिछले साल हमारी बचत की वृद्धि सबसे कम रही। यह और भी नीचे जाएगी। लोग अब दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं। स्थानीय चिट फंड चलाने वाले हैं जो ऊंची ब्याज दर पर काम करते हैं। कई कंपनियां हैं, म्यूचुअल फंड हैं, जहां लोग निवेश कर सकते हैं और थोड़ा ज़्यादा ब्याज पा सकते हैं। धीरे-धीरे बचत जमा और फिक्स्ड डिपॉज़िट की वृद्धि घट रही है। इसका असर पूरे बैंकिंग सिस्टम पर पड़ेगा। जब तक रिज़र्व बैंक और भारत सरकार इस ख़तरे को नहीं समझते, हम एक संकट की ओर बढ़ रहे हैं।
कामरा: आपके अनुसार नीति कैसी होनी चाहिए? देश को संकट से बचाने के लिए, छोटे कर्ज़दारों और छोटे जमाकर्ताओं के लिए कैसी नीति ज़रूरी है ताकि वे बैंकिंग सिस्टम में भरोसा रख सकें और विकास की दिशा में आगे बढ़ सकें?
थॉमस फ़्रेंको: सबसे पहले, मैं चाहूंगा कि शाखाओं की संख्या बढ़ाई जाए। भारत में अभी औसतन एक शाखा 11,000 लोगों के लिए है। विकसित देशों में और यहां तक कि विकासशील देशों में भी यह संख्या 3,000 से 5,000 लोगों पर एक शाखा है। यानी शाखाओं की संख्या बढ़ाने और ऋण की पहुंच देने की बहुत गुंजाइश है।
आज ग्रामीण शाखाएं कुल शाखाओं का सिर्फ़ 28% रह गई हैं। ग्रामीण इलाकों के लोगों को ऋण की पहुंच नहीं है और वे मजबूर होकर बिज़नेस कॉरेस्पॉन्डेंट्स के पास जाते हैं। उनके पास नियमित नौकरी नहीं होती, वे किसी आरक्षण नीति में नहीं आते। उन्हें सिर्फ़ कारोबार के हिसाब से इंसेंटिव मिलता है। वे कॉर्पोरेट कॉरेस्पॉन्डेंट्स (जैसे रिलायंस) के तहत काम करते हैं और उन्हें कमीशन का हिस्सा मिलता है। इस देश में ऐसे 19.5 लाख लोग हैं।
मैं सुझाव दूंगा कि इन कस्टमर सर्विस पॉइंट्स को बैंक शाखाओं में बदल दिया जाए। तब असली पहुंच होगी। लोग खाता खोल पाएंगे, लेन-देन कर पाएंगे, कर्ज़ ले पाएंगे। वहां फ़ील्ड ऑफ़िसर भी होंगे ताकि लोन दिया जा सके, जो अभी नहीं मिल पाता।
आज नियमित कर्मचारियों की संख्या 10 लाख है, जबकि बिज़नेस कॉरेस्पॉन्डेंट्स की संख्या 19.5 लाख है। इसलिए शाखा नेटवर्क बढ़ाना ज़रूरी है।
दूसरा, स्टाफ़ की संख्या को बहुत बढ़ाना होगा। जैसा मैंने बताया, पब्लिक सेक्टर बैंक स्टाफ़ की भारी कमी से जूझ रहे हैं। पब्लिक सेक्टर बैंक ही आरक्षण नीति लागू करते हैं। निजी क्षेत्र के बैंकों में लगभग 10 लाख कर्मचारी हैं, जबकि पब्लिक सेक्टर में लगभग 7–10 लाख। निजी क्षेत्र आरक्षण नीति का पालन नहीं करता।
अगर शाखाओं और स्टाफ़ की संख्या बढ़ेगी तो स्वाभाविक रूप से जमा भी बढ़ेगा। साथ ही आकर्षक ब्याज दरें दी जानी चाहिए। जब हम बचत खाते पर 5% ब्याज और फिक्स्ड डिपॉज़िट पर 18% ब्याज देते थे, तब भी बैंक मुनाफ़ा कमा रहे थे, घाटे में नहीं थे।
तो आप बचत खाते पर 5% ब्याज दीजिए। फिक्स्ड डिपॉज़िट पर कम से कम 10% ब्याज दीजिए। फिक्स्ड डिपॉज़िट का 35% वरिष्ठ नागरिकों द्वारा किया जाता है। उन्हें अपनी आय के लिए कुछ ज़रूरत होती है। जब आप ऐसा करेंगे तो बचत दर फिर से बढ़ेगी। तब आपको उधार देने के लिए पर्याप्त धन मिलेगा। शाखाओं की संख्या बढ़ेगी तो छोटे कर्ज़ भी बढ़ेंगे।
फिर वही प्राथमिक क्षेत्र ऋण मानदंड वापस लाएं। समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग को कुल लोन का 1% सिर्फ़ 4% ब्याज दर पर दीजिए। किसानों को रियायती दर पर कर्ज़ दीजिए, कॉर्पोरेट्स को नहीं। MSMEs, जो सबसे ज़्यादा रोज़गार पैदा करते हैं, उन्हें सस्ती दर पर लोन दीजिए।
क्रेडिट कार्ड पर आप ऊंची दर वसूलते हैं – लोग 36% तक भी चुका देते हैं। लेकिन बैंक छोटे कर्ज़दारों, MSMEs और किसानों को लोन नहीं दे रहे। वे कहां जा रहे हैं? वे जा रहे हैं नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियों और माइक्रो फ़ाइनेंस संस्थानों के पास और उन पर ब्याज दर को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। दो साल पहले भारतीय रिज़र्व बैंक ने लोन पर ब्याज की सीमा हटा दी। अब ये संस्थाएं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से 10–11% पर लोन लेती हैं और आगे 24–30% पर देती हैं। एक अध्ययन दिखाता है कि 100% ब्याज दर पर भी लोन दिए जाते हैं और वसूली का तरीका- ज़बरदस्ती वसूल किया जाता है।
कई राज्यों ने अब नए क़ानून बनाए हैं कि ज़बरदस्ती वसूली नहीं होनी चाहिए, लेकिन यह अब भी भी जारी है। सिर्फ़ चार राज्यों ने यह क़ानून लागू किया है, लेकिन यह रुका नहीं है। यानी पुराने ज़माने के महाजन, जिन्हें राष्ट्रीयकृत बैंकों ने हटाया था, वे अब नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंशियल कंपनियों के नाम से वापस आ गए हैं।
एक और पहलू है जिस पर बात नहीं होती। जब नरसिम्हन समिति ने निजीकरण का प्रस्ताव दिया था, तब बैंक यूनियनों, ट्रेड यूनियनों और जनता ने इसका विरोध किया। इसलिए किसी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक का निजीकरण नहीं हुआ। लेकिन इसके बजाय एक बदमाशी वाला तरीका अपनाया गया।
HDFC, जो मूल रूप से हाउसिंग डेवलपमेंट एंड फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन था और जिसका उद्देश्य सिर्फ़ आवास ऋण देना था ताकि हर किसी को घर मिल सके, उसे बदलकर यूनिवर्सल बैंक बना दिया गया- HDFC बैंक। आज HDFC बैंक की 55% हिस्सेदारी विदेशियों के पास है। यानी मुनाफ़ा विदेश जा रहा है और इसे अब भारतीय बैंक नहीं कहा जा सकता।
इसी तरह ICICI, जो मूल रूप से इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया था, उसे भी बैंक में बदल दिया गया। वहां भी 55% हिस्सेदारी विदेशियों के पास है।
IDBI, जो उद्योग विकास के लिए काम करता था, उसे IDBI बैंक में बदल दिया गया। यह संकट में चला गया। तब LIC को इसे बचाने को लिए कहा गया। फिर LIC ने 51% हिस्सेदारी ख़रीदी। LIC से कोई IDBI का प्रबंध निदेशक बना। उन्होंने दो साल में इसे संभाला, अच्छा मुनाफ़ा दिलाया। और अब यह बैंक लाभ में है, पिछले साल इसका मुनाफ़ा 7,200 करोड़ रुपये से ज़्यादा रहा।
अब सरकार कह रही है कि नहीं, अब बहुत हो गया, इसे किसी और को बेच दो। और सिर्फ़ एक बोलीदाता है- कनाडा का फेयरफैक्स, जिसका हमारे देश में पहले से ही संदिग्ध इतिहास रहा है। वह अकेला ख़रीदार बनने जा रहा है।
कुणाल कामराः तो मेरा सवाल है सर, जब आप कहते हैं कि बैंक को अच्छा करना चाहिए… हमने यह बताया कि राष्ट्रीयकरण मुनाफ़े के लिए नहीं किया गया था, लेकिन बैंक मुनाफ़ा कमा रहे थे। तो वे किस तरह का मुनाफ़ा कमा रहे थे जो पर्याप्त नहीं था?
थॉमस फ़्रेंको: उन दिनों भी कम से कम 10–15% का मुनाफ़ा होता था। सरकार, जिसकी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में हिस्सेदारी है, वह भी ज़्यादा रिटर्न चाहती है। इसलिए लगातार दबाव डालती है कि मुनाफ़ा बढ़े। जैसे स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने लगभग 97,000 करोड़, यानी एक लाख करोड़ का मुनाफ़ा कमाया। इतना ज़्यादा मुनाफ़ा बनाने के बजाय अगर सिर्फ़ 10,000 करोड़ का मुनाफ़ा होता तो भी एक बड़े बैंक के लिए पर्याप्त था। बाकी पैसा शाखाओं की संख्या बढ़ाने, स्टाफ़ बढ़ाने और पहुंच बढ़ाने में लगाया जा सकता था।
प्रदर्शन को सिर्फ़ मुनाफ़े से नहीं आंकना चाहिए। यह देखना चाहिए कि उनका ग्रामीण ऋण कितना है? छोटे कर्ज़ कितने दिए गए? किसानों को कितना ऋण मिला? हाउसिंग के लिए कितना ऋण मिला? शिक्षा लोन लेने वालों को कितना ऋण मिला?
कुणाल कामराः लेकिन वर्तमान सरकार दावा करती है कि उन्होंने सुनिश्चित किया है कि जो योजनाएं उन्होंने शुरू की हैं उनके माध्यम से ज़्यादा लोग बैंक खाते खोलें और बैंकिंग के दायरे में आएं…
थॉमस फ़्रेंको: उनका दावा है कि जनधन खाते खोलने का वैश्विक रिकॉर्ड बना, सबसे ज़्यादा खाते कम समय में खोले गए। लेकिन एक अहम तथ्य यह है कि 97% जनधन खाते सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने खोले, सिर्फ़ 3% निजी क्षेत्र के बैंकों ने। शुरू में कहा गया था कि न्यूनतम बैलेंस की ज़रूरत नहीं है, शून्य बैलेंस पर भी खाता खोला जा सकता है। लेकिन बाद में बैंकों ने कहा कि कुछ समय तक ठीक है, अब न्यूनतम बैलेंस रखना होगा।
कॉर्पोरेट ऋण पर जो नुकसान होता है, उसे कुछ हद तक सेवा शुल्क से पूरा किया जाता है। बैंकों ने मिनिमम बैलेंस चार्ज लेना शुरू किया। सिर्फ़ 2023 में ही 21,000 करोड़ रुपये न्यूनतम बैलेंस चार्ज से वसूले गए।
पहले ATM कार्ड मुफ़्त दिया जाता था। अब पांच से ज़्यादा लेन-देन पर प्रति लेन-देन 23 रुपये और उस पर 18% GST देना पड़ता है। फिर SMS चार्ज है, निरीक्षण शुल्क है, नक़दी संभालने का शुल्क है, लेन-देन शुल्क है, चेकबुक शुल्क है, इस तरह लोगों पर बहुत सारे चार्ज लगाए जा रहे हैं।
जब बैंक मुनाफ़ा कमा रहे हैं, तो उस मुनाफ़े को फिर से निवेश करना चाहिए। यही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक का उद्देश्य है। अगर वे मुनाफ़े को नई शाखाएं खोलने और स्टाफ़ बढ़ाने में लगाएंगे तो पहुंच भी बढ़ेगी।
कॉर्पोरेट ऋण, बड़े कर्ज़ और छोटे कर्ज़ में फर्क यह है कि छोटा उधार लेने वाला अगर एक लाख रुपये का लोन लेता है तो वह तुरंत उसे किसी काम में निवेश कर देता है। इससे पैसा अर्थव्यवस्था में घूमता है। लेकिन बड़ा उधार लेने वाला तुरंत निवेश नहीं करता, इसलिए अर्थव्यवस्था में गुणक प्रभाव या multiplier effect नहीं होता। यह प्रभाव छोटे कर्ज़ों में, ख़ासकर किसानों और MSMEs को दिए गए कर्ज़ में दिखता है।
इसलिए बैंकिंग सेक्टर की पूरी दिशा बदलनी चाहिए। अभी आप एक बहुत छोटे अल्पसंख्यक वर्ग, कॉर्पोरेट्स, को बड़े-बड़े लोन दे रहे हैं। इसके बजाय ध्यान देश की बहुसंख्या यानी आम आदमी पर होना चाहिए। आय असमानता बढ़ रही है। बैंक पर्याप्त ऋण देकर इस असमानता को कम कर सकते हैं।
पर्याप्त ऋण का मतलब है कि सही फ़ॉर्मूले बनाए जाएं। उदाहरण के लिए, जब मैं फ़ील्ड ऑफ़िसर था और गाय ख़रीदने के लिए लोन दिया जाता था, तो हमें कहा जाता था कि कम से कम दो गाय दीजिए। पहली गाय तुरंत दीजिए, जो दूध देने वाली हो। दूसरी गाय छह महीने बाद दीजिए ताकि पूरे साल दूध की निरंतरता बनी रहे। उस समय इंटीग्रेटेड रूरल डेवलपमेंट प्रोग्राम था, जिसने ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में लोगों को लाभ पहुंचाया।
मैं सुझाव दूंगा कि अब भी ऐसा ही कार्यक्रम होना चाहिए, इंटीग्रेटेड रूरल डेवलपमेंट प्रोग्राम और इंटीग्रेटेड अर्बन डेवलपमेंट प्रोग्राम, जिसमें बैंक आम आदमी के पास जाएं और पूछें कि आपकी ऋण ज़रूरत क्या है। हम आपको लोन देंगे, आप अपना व्यवसाय विकसित करें।
देखिए, चीन क्या करता है। चीन अपने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से कहता है कि आप ऋण दीजिए, लोग उद्यम शुरू करें। अगर वे असफल होते हैं तो सरकार उनकी देखभाल करती है। वहां कहा जाता है कि आप लोन लिख दीजिए, रकम सरकार देगी। मैंने यह इस्राइल में भी देखा है। वह पूंजीवादी देश है, लेकिन स्टार्टअप्स के लिए सरकार मुफ़्त फंड देती है। जब वे अच्छा करते हैं तो बैंक कहते हैं, आप विस्तार कीजिए, हम लोन देंगे।
हमारे देश में ऐसा नहीं है। जब तक हम यह नहीं करेंगे, तब तक रोज़गार नहीं मिलेगा। रोज़गार वृद्धि बहुत तेज़ी से गिर गई है। उन्होंने एक करोड़, दो करोड़ रोज़गार देने का वादा किया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अगले बजट में तो इसका ज़िक्र भी नहीं किया। वे सिर्फ़ स्व-रोज़गार की बात करते हैं।
अगर स्व-रोज़गार को बढ़ाना है तो इसके लिए समर्थन प्रणाली बनानी होगी। छोटे लोन अगर बड़ी संख्या में भी माफ़ कर दिए जाएं तो बैंकिंग सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार को यह करने के लिए तैयार होना चाहिए।
अब इस सरकार की नीति पूरी तरह कॉर्पोरेट्स के लिए, कॉर्पोरेट्स द्वारा और कॉर्पोरेट्स की हो गई है। सिर्फ़ कुछ गिने-चुने लोगों को सब कुछ दिया जा रहा है – अडानी, अंबानी…
2016 में जब बड़े NPA मामलों को NCLT में भेजा गया, उस समय रघुराम राजन थे। वे भी कॉर्पोरेट समर्थक माने जाते थे। उस समय एक नीति घोषित की गई थी कि किसी एक कॉर्पोरेट को सभी बैंक मिलकर 10,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का लोन नहीं देंगे। यानी कंसोर्टियम भी मिलकर किसी एक कॉर्पोरेट को अधिकतम 10,000 करोड़ तक ही दे सकता है। लेकिन आज तक यह लागू नहीं हुआ।
आज बैंकिंग सिस्टम में अडानी का कर्ज़ ही एक लाख करोड़ से भी ज़्यादा ही होगा। कोई सीमा नहीं है और उन्हें सस्ता कर्ज़ मिलता जा रहा है। सरकार का कहना है कि हम कुछ ‘ग्लोबल चैंपियंस’ बनाएंगे, वे देश का ध्यान रखेंगे। यह वही नीति है जिसके बारे में नीति आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कांत ने कहा था। और यही सरकार अब ठीक वही कर रही है और बैंकिंग सिस्टम इसे लागू कर रहा है।
अब सारी नीतियां बैंकों पर थोप दी जाती हैं। उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति नहीं है।
एक और अहम बात यह है कि राष्ट्रीयकरण के बाद हर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में ट्रेड यूनियन के दो प्रतिनिधि होते थे। एक अधिकारी वर्ग से, एक कर्मचारी वर्ग से। वे बतौर निदेशक, निदेशक मंडल में होते थे और उन्हें चौकीदार या Watch Dog माना जाता था। तो हर चीज़ तक उनकी पहुंच होती थी, किसका लोन माफ़ हो रहा है, किसे ज़्यादा ऋण दिया जा रहा है, कौन-सी नीतियां लागू हो रही हैं। वे निगरानी रखते थे।
2014 के बाद यह बंद कर दिया गया। उसके बाद कोई अधिकारी निदेशक या कर्मचारी निदेशक नियुक्त नहीं हुआ। 2017 में ऑल इंडिया बैंक ऑफ़िसर्स कॉन्फ़ेडरेशन ने केस दायर किया। उस समय मैं महासचिव था। केस अभी भी दिल्ली हाई कोर्ट में चल रहा है। हर बार सरकारी वकील कोई बहाना लेकर आते हैं और कहते हैं – हमें तीन महीने का और समय दीजिए। अब 17 सिफ़ारिशें अपॉइंटमेंट्स कमेटी ऑफ़ द कैबिनेट के पास पड़ी हैं। वहां सिर्फ़ दो लोग हैं – प्रधानमंत्री और गृह मंत्री हैं। उनके पास समय नहीं है इस ओर देखने का। महीनों से मामला अटका हुआ है।
इस वजह से बोर्ड पूरी तरह अपारदर्शी हो गए हैं। आप कितने भी बड़े लोन माफ़ कर दीजिए, किसी को पता नहीं चलता। निगरानी की भूमिका ख़त्म हो गई है। इसका असर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर बहुत बुरा पड़ा है। इसे वापस लाना ज़रूरी है।

