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मूलभूत मुद्दा : गंवार या सभ्य 

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           प्रखर अरोड़ा 

गांव में पैदा होने वाले पूरी जिंदगी शहर में बिताने के बाद भी गंवार ही रहते हैं, सभ्यता संस्कृति से उन्हें परहेज होता है, भदेसपन को, वह भाषा का हो या आचार का, भद्रता से ऊंचा दर्जा देते हैं और मुझ पर भी वही असर तो आप कुछ कम जानते हैं।  

    मैं गांव के बाहर आकर भी अपने गांव में ही रहा क्योंकि लगा आधार ही कमजोर हो  तो अधिरचना अपने आप धंस जाएगी।

      आप इसे इस तरह समझें  कि कच्चा माल ही न हो तो पकाएंगे क्या?  पेड़ ही न हो तो काठ की कुर्सी कैसे बनाएंगे, जिस पर बैठ कर आप सोचने लगते हैं पेड़ कुर्सी से ही पैदा हुए थे, या अधिक से अधिक यह कि पेड़ कुर्सी बनने के लिए पैदा हुए थे।

       सच यह है कि कुर्सी पर बैठने के बाद आदमी  के पास न समझ रह जाती है, न सभ्यता, न संस्कार न भद्रता, क्योंकि कुर्सी दिमाग पर भारी पड़ती है।  कुर्सी सवार समझता है जो गंवार  है वह असभ्य होता है क्योंकि सभ्यता शहर में पैदा  हुई,  जब कि सचाई यह है कि सभ्यता गांवों में पैदा हुई और शहर में चोर, उचक्के  और लुटेरे पैदा हुए,  इसलिए यहां आ कर नष्ट हो गई।  

      यदि विश्वास न हो तो गावों की उतनी ही बड़ी आबादी में अपराधों की संख्या का मिलान समान आबादी के किसी शहर से करके देख लें।  सभ्यता जिस सभा के आचार की उपज है वह सभा गावों में ही होती थी – ग्रामसभा,  पंचायत, बिरादरी पंचायत के रूप में।

      उसमें जिस तरह की शिष्टता का निर्वाह किया जाता है अगर उसकी शिक्षा आपकी संसद या विधानसभा के सदस्यों को मिल जाए तो देश की आधी समस्याएं तो इतने से ही हल हो जाएंगी। 

      मुस्कराइए नहीं, आप दोनो में फर्क कर ही नहीं पाते। सभ्य को सभी का ज्ञान और ध्यान रहता है, जब कि सिविलाइज्ड आदमी इतना स्वार्थी और अकेला होता है कि अपने पड़ोसी या बगल वाले फ्लैट के आदमी को भी नहीं पहचानता। 

     आज जो अपने को सिविलाइज्ड देश कहते हैं उनका इतिहास देख लीजिए और उसका मिलान सफल चोरों, उचक्को, तस्करों, जलदस्युओं, पिंडारियों, ठगों और माफिया से कर लीजिए सभी का इतिहास एक जैसा मिलेगा। आप को यह पता होगा ही नहीं कि अंग्रेजों ने पिंडारियों को कैसे मात दी और ठगी प्रथा को क्यों और कैसे खत्म किया। 

     इसे आप माफिया के गैगवार से समझ सकते थे। मुझे पूरा विश्वास है कि इसे आप समझ न सके होंगे। इतनी बात मेरे कहने से समझ सकते हैं कि गैंगवार में जो जीतता है, वह हारने वाले से शरीफ नहीं होता है और असली माफिया वही होता है।

     हारने वाले तो गुंडे बदमाश होते हैं। माफिया वह होता है जिसका राजसत्ता में पहुंच होती है, जिसका गॉडफादर मानवतावादी मुखौटा और कल्याणकारी जामा पहन कर निकलता है तो लोग ‘जय जगदीश हरे’ गाने लगते हैं। इन सभी कसौटियों पर कस कर देखें तो कंपनी विश्व की सबसे बड़ी, सबसे संगठित माफिया थी और उसने किसी प्रतिद्वन्द्वी को पनपने नहीं दिया। 

     यदि इतनी संपन्नता के बाद भी सिविलाइज्ड देशों के आचरण पर गौर करें तो उन्हें सभ्य नहीं मान पाएंगे, भारतीय माफिया के बाप भले मान लें। 

     सभा और सिटी में जो अंतर है वही सभ्यता और सिविलाइजेशन में होता है।  सिटी को हम नगर कहते हैं और शहरी को नागर जिसके साथ एक ही पूर्वपद शोभा पाता है – नट जो खटने वालों को नटखट बना देता है, नागर लोगों को मनचला या नटनागर और जिसका प्रतिनिधित्व नटवरलाल करते हैं।

       पर इतना समझाने के बाद भी आप को नट का मतलब समझ में न आया होगा, इसके क्रिया रूप ‘नटना’ का भी नहीं, क्योंकि आप को यह पता नहीं कि नट का मूल संदिग्ध है। जानकार लोग यह सुझा सकते हैं कि नट नृत और नृत्य का तदभव है, पर सवाल करें कि नाटक और नाट्यशास्त्र  को क्या नृत्य और नृत्यशास्त्र कहा जा सकता है। नहीं, आप भी कहेगे और मैं भी।  

     अब आपका पाला ऐसे ज्ञानियों से पड़ेगा जो कहेंगे यह द्रविड़ मूल का शब्द है – नट/नड- चलना, नटप्पु – आवागमन, नडमाटुृ – चलना फिरना, और आपको अब यह समझ में आ गया होगा कि नटना – पलटना  का द्योतक क्यों हैं? पर यदि आप कोशों पर भरोसा करते हों तो फिर धोखा खा जाएंगे। कोश का संपादन करने वालों को भाषा के मर्म का पता न था।

     उन्होंने परिश्रम अपनी जरूरत के अनुसार किया औरअनुकरणीय किया पर भारत की बोलियों का ज्ञान बोली क्षेत्र बदलते ही इतना कठिन हो जाता है कि हम उन्हें समझ लेने पर भी उनको जानते नहीं हैं, फिर इसकी आशा विदेशियों से करना जिनके अपने इरादे भी रहे हों उचित नहीं।

     लानत हमारे ऊपर है कि हमने उसे निखोट नहीं बनाया। नतीजा यह कि शब्द-अर्थ शृंखला में एक पाले में रहते हैं और फिर दूसरे में जाकर आर्य-द्रविड करते रहते हैं।  

     नट का अर्थ चलना करने वालों के नट दिखाई देता है, नत, गत, नाता-गोता,  नति (उन्नति, अवनति, उद्गति, प्रगति)  के आंतरिक तर्क समझ नहीं आते। 

      अब सवाल यह है कि नत-नट, नद-नड. नाद-नाड  और (नाटियाल, नाडर, नाडार, नानदेर, नन्दिग्राम जैसे उपनामों में कोई आंतरिक संबंध है। मैं जानता हूं आप कोरे हैं पर मेरी हालत भी वही है। एक अंतर अवश्य है कि मैं मानता हूं, अब तक जो हुआ वह जहां सही लगता है वहां भी सतही है, आप कहते हैं जो दूसरों ने अपने इरादे से किया वह हमारे लिए काफी है। 

     मैं बौद्धिक माफिया तंत्र से बाहर निकलने और निकालने के लिए प्रयत्नशील हूं, आप कहते हैं इतनी झंझट क्यों मोल ले, माफिया को उसकी फीस चुका कर अपना कारोबार करना फायदे का है।

    भारत की आत्मा गांवों में बसती है क्योंकि भारतीय सभ्य है सिविलाइज्ड नही।

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