डॉ. गीता
_नैतिकता और अनैतिकता का स्रोत: अंतर्निहित मानवीय प्रवृत्ति (Innate Instincts) या कुछ और ?_
जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिर्जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्ति:।
केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियोक्तोsस्मि तथा करोमि॥
~गर्ग संहिता (50:36)
दुर्योधन कहता है :
धर्म (सदाचार–righteousness) को जानता हूँ किंतु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं। अधर्म (कदाचार) को भी जानता हूँ किंतु उससे मेरी निवृत्ति नहीं। हृदय में विराजमान कोई शास्ता है, वह जैसे नियोजित करता है, वैसे ही करता हूँ।
तो धर्म (righteousness) मनुष्य को नैतिक या अनैतिक बनाने में सहायक नहीं होता। धर्म व अधर्म को जानने के बावजूद व्यवहार में हमारा आचरण अनैतिक हो सकता है।
पंडे-पुजारी, मठाधीश-महंत, प्रवचनकर्ता बाबा, ख़लीफ़ा-इमाम, मुल्ला-मौलवी, पोप-बिशप तक अनैतिक आचरण करते देखे गए हैं। और धर्म व अधर्म को जाने बिना भी हमारा आचरण नैतिक हो सकता है. निरक्षर, भोलेभाले आदिवासी, वनवासी भी नैतिक आचरण करते देखे जाते हैं।
क्यों?
धर्म की जानकारी से नैतिक आचरण का अनिवार्य सम्बंध नहीं। जानकारी और आचरण दो अलग चीज़ें हैं।
प्लेटो ने जब कहा :
Virtue is knowledge (या Knowledge is virtue), तो ‘knowledge’ शब्द का प्रयोग वे महज़ जानकारी के अर्थ में नहीं कर रहे होंगे।
तो मनुष्य में नैतिकता आती कहाँ से है? धर्म से? नहीं। जानकारी से? नहीं।
सवाल कठिन है। हमारी एक प्रवृत्ति यह भी है कि कठिन सवाल से बचने के लिए हम सवाल पर ही सवाल उठा देते हैं। जैसे—नैतिकता है क्या? जो कल अनैतिक था, आज नैतिक हो सकता है। जो एक व्यक्ति के लिए नैतिक है, दूसरे के लिए अनैतिक हो सकता है।
जो एक मज़हब में नैतिक है, दूसरे में अनैतिक हो सकता है। मानवतावादी के लिए जो अनैतिक है, मार्क्सवादी के लिए नैतिक हो सकता है। आदि-आदि। तो नैतिकता का कोई सार्वभौम और सार्वकालिक मानदंड नहीं है।
हो सकता है। किंतु नीचे नैतिकता के सारतत्व पर कुछ उद्धरण दिए गए हैं–देखें, उनमें दी गई नैतिकता की अवधारणा सार्वभौम और सार्वकालिक है या नहीं?
(A)
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
~पद्मपुराण (सृष्टि- 19: 357)
धर्म (नैतिक आचरण) का सर्वस्व सुनें और सुनकर धारण करें। जो अपने लिए प्रतिकूल है, वैसा आचरण दूसरों के साथ न करें।
(B)
बाइबिल (न्यू टेस्टामेन्ट) में:
“Do for others what you want them to do for you: this is the meaning of the Law of Moses and of the teachings of the prophets.”
~Mathew (5.7.12)
दूसरों के लिए वही करो जो तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे लिए करें: मूसा के क़ानून का यही मतलब है और पैग़म्बरों की यही शिक्षा है।
(C)
इस्लामी हदीस में एक प्रसंग आता है :
मुहम्मद साहब घोड़े पर सवार कहीं जाने को तैयार थे। तभी एक बद्दू ने आकर घोड़े की रक़ाब पकड़ ली और उनसे पूछा—ओ अल्लाह के नुमाइंदे, मुझे जन्नत का रास्ता बता। मुहम्मद साहब ने कहा—“तुम अपने लिए औरों से जैसा बरताव चाहते हो, उनके साथ वैसा ही करो। उनका जैसा बरताव नापसंद करते हो, वैसा उनके साथ न करो…अब रक़ाब छोड़ो (
तुम्हारे लिए यही काफ़ी है)
~किताब-अल काफ़ी (जिल्द-2, पृष्ठ-146)
शायद ही किसी मज़हब के लोग इससे असहमत हों। थोड़ी देर के लिए हम इन तीनों प्रसंगों को भूल जाएँ और प्रकृति-प्रदत्त बुद्धि-विवेक से ही इसे मुद्दे को समझने की कोशिश करें।
मनुष्य पैदा होने के बाद जैसे ही होश सँभालता है, उसे दो चीज़ों का एहसास होता है। एक, अपने होने का, और दो, बाह्य जगत् के होने का। यह भी कि उसको अब इसी बाह्य जगत् में रहना है, जब तक भी रहना है। दोनों का सम्बंध अविच्छेद्य है।
इस सम्बंध का स्वर्णिम नियम वही है जो ऊपर के उद्धरणों में आया है। यह नियम इन ग्रंथों में न भी होता तो मनुष्य को मनुष्य होने के नाते इसका एहसास हो जाता। क्यों?
इसलिए कि यह मनुष्य में अंतर्निहित (innate) है। तो नैतिकता और अनैतिकता और दोनों की भिन्न-भिन्न मात्रा मनुष्य में अंतर्निहित है। यही उसे मनुष्य बनाती है, अन्य प्राणियों से पृथक् और विशिष्ट।
अंतर्निहित माने वह जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती कि वह क्यों है। जैसे, इसकी व्याख्या नहीं की जा सकती कि यह सृष्टि क्यों हैं, हमारी चेतना जैसी भी है, वह कहाँ से और क्यों आई, जिसने हमें अपने और बाह्य जगत के अलग-अलग होने का बोध कराया.
{चेतना विकास मिशन)

