Site icon अग्नि आलोक

आधारभूत चिंतन : सरल है जटिल विश्व-व्यवस्था*

Share

        ~डॉ. गीता 

ब्रह्माण्डीय प्रबंधनशीलता यानी विश्व व्यवस्था जितनी जटिल है, उतनी सरल भी है। लोक में जो देखा जाता है, वह दैवकृत है। मनुष्य भले ही समझे कि वह स्वकृत व्यवस्था है। ब्रह्मा जी जीव को आयु निश्चित कर देते हैं। ब्रह्मा जी अत (प्राकृत व्यवस्था) के एक उच्च अधिकारी हैं। वे अपने साथ एक व्यक्तिगत सहायक रखते हैं। उनका यह सहायक चित्रगुप्त कहलाता है।

        चित्र =लेख, लिखावट। गुप्त = रहस्यमय, छिपा हुआ, आवरणयुक्त। जिसका लेख दूसरा (देवेतर मनुष्यादि) न पढ़ सके तथा जो छिप कर अदृश्य वा अप्रकट / अप्रत्यक्ष रूप से जीव के कर्मों का लेखा तैयार करता है, उसका नाम चित्रगुप्त है।

       चित्रगुप्त का यह लेख मनुष्य देह में तीन स्थान पर अंकित होता है-ललाट हस्तौ पादौ च ललाट की रेखाएँ, दोनों हाथों की रेखाएँ तथा दोनों पैरों की रेखाएँ। रेखा शास्त्री इनके रहस्य का उद्घाटन, ब्रह्मा जी की कृपा से, करने में समर्थ होता है। ऐसे रेखाशास्त्रियों को आदरपूर्वक नमस्कार करता हूँ। चित्रगुप्त अपने लेख की ३ कापी तैयार करता है। एक ब्रह्मा जी के पास रहती है। दूसरी कापी विष्णु जी के पास अवलोकनार्थ भेजी जाती है। तीसरी कापी शिव जी के पास सूचनार्थ दी जाती है।

       ब्रह्मा जी अपनी कापी के आधार पर उसे शरीरादि प्रदान करते हैं। विष्णु अपनी प्रति के आधार पर जीव के पालन-पोषण का प्रावधान करते हैं। शिव अपनी प्रति से निर्देशित होकर जीव को रोग शोक मृत्यु देते हैं। जो इन देवों को सतत नमस्कार करता है, वही इस दिव्य व्यवस्था को जानता है।

ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। इसलिये वे मुखर अधिक हैं। उनका सारा कार्य वाक् शक्ति से होता है। उनके दोनों हाथ फँसे रहते हैं। एक हाथ में दिव्य जल से भरा कमण्डलु तथा दूसरे हाथ में विद्युन्माला । जल और विद्युत् (ज्ञान) से जीवन पनपता है। एक बार जिसे जैसा सुरूप / कुरुप शरीर मिल गया, वह जीवनभर वैसा ही रहता है।

       इसमें परिवर्तन सम्भव नहीं। क्योंकि यह कर्म विपाक का फल है। शरीर के संरक्षण का दायित्व विष्णु पर है। इसके लिये शक्ति चाहिये। शक्ति भुजाओं में हो तो कर्म होते हैं। विष्णु सहस्रबाहु हैं। इनकी असंख्य भुजाओं में अमित शक्ति है। जीव इस शक्ति को पाने के लिये विष्णु की उपासना करता है।

      विष्णु की इस शक्ति से सभी जीवित एवं हृष्टपुष्ट रहते हैं। शिव जी पञ्चमुख (विस्तृत मुख) वाले देव हैं। सम्पूर्ण सृष्टि को गटकने/ निगल जाने की क्षमता शिव में है। जो जीव नियम का उल्लंघन करते हैं, शिव जी उन्हें रोग-शोक, आधि-व्याधि, दारिद्र्य विपन्नता देते हैं। इससे बचने के लिये लोग शिव की पूजा करते हैं। भूत प्रेत पिशाच राक्षस कूष्माण्ड विनायक ज्वर एवं योगिनीयों द्वारा शिव जी सब को भयभीत करते रहते हैं।

     जो शिव की शरण में जाता है, वह इन सब भयों से मुक्त हो जाता है तथा मृत्यु के समय भी सुख से मरता और उत्तम गति पाता है।

 शिव जी आकाश को अपना आसन बनाये हुए विद्यमान हैं। आकाश ही कैलाश है अर्थात् शिव का वास स्थान कैलास वा आकाश है। आकाशस्थ शिव को पाना (तक पहुँचना) जितना कठिन है, उतना ही सरल उन्हें देखना है।

     अपने प्रकाश से तीनों लोकों को आलोकित करने वाले सूर्य ही शिव हैं। अन्धे इसे भले न मानें, चक्षुवान् तो माने गे ही ऐसे चक्षुवानों/ विद्वानों को मेरा नमस्कार तथा न मानने वाले अन्धों / मूढ़ों को भी मेरा नमस्कार ।

     आकाश में विद्यमान सूर्यमण्डल हो ज्योतिर्लिंग है। १२ मास हैं। १२ मासों के सूर्य के अलग-अलग नाम हैं।

       अरुणो माघमासे तु सूर्योों वै फाल्गुने तथा। 

चैत्रमासे तु वेदांगो भानुवैशाख तापर ज्येष्ठमासे तपेदिन्द्र आषाढ़े तपते रविः।

 गभस्ति: श्रावणेमासे यमो भाद्रपदे तथा॥

 इथे सुवर्ण-रेताश्च कार्तिके च दिवाकरः।

 मार्गशीर्षे तपेन्मित्रः पौधे विष्णुः सनातनः॥

    ~भविष्यपुराण.

माघ मास में अरुण, फाल्गुन मास में सूर्य, चैत्र मास में वेदांग और वैशाख मास में भानु नाम से सूर्य तपते हैं। ज्येष्ठ मास में इन्द्र, आषाढ़ में रवि, श्रावण मास में गभास्ति और भाद्रपद मास में यम नामा सूर्य तपते हैं। आश्विन में सुवर्णरता कार्तिक में दिवाकर, मार्गशीर्ष में मित्र और पौष में सनातन (आद्यन्तरहित) विष्णु नामा सूर्य वपते हैं।

इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन एवं नमस्कार से आत्मिक शान्ति मिलती है। इसके लिये कहीं जाने की आवश्यकता नहीं। जो जहाँ है, वहीं से इन्हें देखे और भक्तिपूर्वक अर्घ्य अर्पित करते हुए नमस्कार करे। पूजा का यह सरलतर विधान है। 

       लोक में जितने भी पूज्य शिवलिंग हैं, वे सब पार्थिव हैं। इन्हें कभी भी ज्योतिर्लिंग नहीं माना जा सकता। क्योंकि इनमें ज्योति नहीं है। ज्योति के बिना ये ज्योतिर्लिंग कैसे हो सकते हैं ? सभी शिवलिंग पत्थर के हैं। पत्थर पृथ्वी से उद्भूत है।

       इसलिये हर एक पत्थर का लिंग पार्थिव हुआ। मैं अपार्थिव/दिव्य लिंग को ही ज्योतिलिंग मानता हूँ यह ज्योतिर्लिंग आकाश में है। दिन के समय द्वादश मासों के सूर्य द्वादश ज्योतिर्लिंग हैं। रात के समय द्वादश राशियों (नक्षत्र समूह) द्वादश ज्योतिर्लिंग हैं। जिनमें नैसर्गिक ज्योति है, वे सब ज्योतिर्लिंग हैं। इन ज्योतिर्लिंगों का प्रतिदिन पूजन अर्चन करने से साधक का शरीर ज्योतिर्मय हो जाता है।

      पत्थर के लिंग की उपासना करने से उपासक का मन बुद्धि आदि प्रस्तरवत् जड़ हो जाता है।

विष्णु के वक्षस्थल में श्रीवत्स (लक्ष्मी) का चिह्न है। भृगु की परीक्षाप्रणाली से खिन्न होकर विष्णु पत्नी लक्ष्मी ने भृगु को शाप दिया कि ब्राह्मण लक्ष्मीहीन (दरिद्र) हो जायें। ब्राह्मणों ने भृगु को अपना नेता चुना था। इसलिये शाप ब्राह्मणों को दिया गया।

      भृगु ने लक्ष्मी को ब्राह्मणों की दासी बनाने के लिये भृगुसंहिता प्रणाली ब्राह्मणों को दिया। भविष्य कथन की यह पद्धति अचूक है। भृगु संहिता जिस ब्राह्मण के पास है, वह लक्ष्मीच्युत नहीं होता।

    भृगु नाम काल का काल का कथन सर्वमान्य है। काल संहिता झूठी कैसे हो सकती है ?

      ललाट में ब्रह्मा जी का निवास है। यह विचार शक्ति का केन्द्र है। हथेली में विष्णु का आवास है। यह क्रियाशक्ति का केन्द्र है। पादतल में शिव की स्थिति है। यह गमन शक्ति का केन्द्र है। मनुष्य चलता है तो उसके पैरों से दब कर अनेकों क्षुद्रजीव मरते रहते हैं। पैरों का सम्पर्क भूतल से रहता है। भूमि एक शूद्र देवता है। भूमि-पाद-सम्पर्क से पादस्थ शिव शूद्र देवता हैं। शिव शूद्रों द्वारा पूज्य है।

      हाथों से रक्षा एवं भरणपोषण होता है। इसलिये हस्तस्थ विष्णु क्षत्रिय राजाओं एवं वैश्यों के देवता हुए। यही कारण है कि राजाओं एवं वैश्यों के घर लक्ष्मी टिकती हैं। मस्तक में बुद्धि विचार ज्ञान होता है। इनका संबंध ब्राह्मणों से है। अतः ब्रह्मा जो कि मस्तकस्थ हैं, ब्राह्मणों के देवता हुए।

हर व्यक्ति अपने आप में ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र है। विचार करता है, इसलिये ब्राह्मण है दूसरों की रक्षा करता है, इसलिये क्षत्रिय है। वह लोगों का पालन पोषण करता है, इस लिये वैश्य है। पैदल चलता है, इसलिये शूद्र है। सबमें ब्रह्मा विष्णु शिव हैं, इसलिये सभी त्रिमूर्ति स्वरूप हैं। 

      त्रिदेवों की तीन शक्तियाँ हैं। ब्रह्मा के पास वाक्शक्ति, विष्णु के पास लक्ष्मी तथा शिव के पास चण्डिका। जो आदेश देता है तथा उस आदेश का पालन कराता भी है, वह ब्रह्मा है। जो लक्ष्मीवान् धनवान् ऐश्वर्यवान् है, वह विष्णु ही है। सभी लोग लक्ष्मी धन के पीछे भाग रहे हैं। इसलिये सभी विष्णु है। लक्ष्मी नाम सीता का। सीता की उत्पत्ति भूमि से हुई है। सीता को जनक (ज्ञानी) पुत्री रूप में प्राप्त करते हैं। इस सीता को सामर्थ्यवान् राम पत्नी के रूप में वरण करते हैं। इस सीता को भक्तगण माता के रूप में पा कर अह्नादित होते हैं।

      इसी सीता को रावण (राक्षस वृन्द) काल मृत्यु रूप में ग्रहण कर अपना सर्वनाश कर बैठते हैं। यह सीता सर्वत्र है। धरती से जो मूल्यवान् वस्तु निकले तथा जिसका व्यापारिक महत्व हो, वह सीता है। पेट्रोल, प्रकृतिक गैस, डीजल, मिट्टी का तेल, सोना लोहा आदि धातुएँ, कोयला, हीरा आदि पत्थर, यूरेनियम आदि रेडियो धर्मी पदार्थ, अन्न, फल, जल आदि खाद्य पदार्थ ही सीता के रूप में में सर्वत्र हैं। जो इन पदार्थों को पुत्रीरूप में आदरपूर्वक ग्रहण करता है वह जनक/विदेह वा ज्ञानी है।

       जो पत्नीरूप में ससम्मान ग्रहण करता तथा त्यागता है, वह राम / ब्रह्म स्वरूप है। जो बलपूर्वक इनका दोहन करता, अपहरण करता, अधिकार में रखता वह अहंकारी प्रमत्त राक्षस तथा समाजद्रोही है। उसका इसी के द्वारा समूल नाश होता है। इन पदार्थों को जो पुरुषार्थ से प्राप्त कर विवेकपूर्वक अपनाते उपयोग में लाते वे सत्पुरुष धन्य हैं। सीता माता को मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ, सा सीता पातु माम् ।

संहार का हेतु क्रोध है। यह अहंकार का पुत्र है। सब में अहं है। सभी शिव हैं। चण्डिका शक्ति के कारण व्यक्ति चण्ड रूप धारण करता है। चण्ड होने पर शरीर का कोई भी अंग शस्त्र के रूप में, वह प्रयोग करता है। मुक्का मारना, लात मारना, दांत काटना, आँख तरेरना, कटुवाक्य कहना चण्ड होने का लक्षण है। शत्रु का सामना होने पर चण्ड होना स्वाभाविक है। अपने भीतर की चण्ड वृत्ति का स्वामी होने से व्यक्ति शिव है।

      सभी शिव हैं। असुन्दर को मिटाने के लिये इस चण्डिक शक्ति तथा इसके अधिपति शिव का ध्यान करता हूँ। शिवोऽहम्।

       बहुत कम लोग हैं जिन्हें विद्वान् होने की लालसा है। बहुत अधिक लोग हैं जो धनवान होने की इच्छा रखते हैं। कुछ लोग हो ऐसे हैं जो युद्ध पिपासु/युयुत्सु हैं। कुण्डली में लग्न (भाव १) ब्रह्मा है, दुस्थान (भाव ६, ८, १२) शिव है तथा शेष स्थान (भाव २, ३, ४ ६, ७, ९, १०, ११) विष्णु है। लोक में इन के उपासकों की संख्या का अनुपात क्रमशः १,८, ३ है। इससे ब्रह्मा विष्णु शिव = १:८ : ३ सिद्ध होता है।

ब्राह्मण के पादतल में शिव जी रहते हैं। ब्राह्मण का पादतल जिसके ऊपर पड़ जाता है, वह धन्य हो जाता है। विष्णु के वक्ष पर यह पड़ा। वे शिवत्व को प्राप्त हुए और भृगु का सम्मान किये। कबीर की छाती पर संत रामानन्द का पैर पड़ा। कबीर धन्यहो उठे, आत्म ज्ञानी हुए।

       विभीषण के पेट पर उसके भाई रावण ने लात जमायो, विभीषण को राम मिले और वह कृतकत्य हुआ। भृगु रामानन्द रावण सभी ब्राह्मण थे। ब्राह्मण के चरणों के नीचे की धरती धन्य हो जाती है। शिवतत्व की वर्षा करने वाले ब्राह्मणों को मेरा नमस्कार ।

      ब्राह्मण के करतल में गोविन्द विष्णु का वास होता है। ब्राह्मण जिसके ऊपर अपना हाथ रख देता है, वह अभय हो जाता है। ब्राह्मण के मस्तक में कमलासन ब्रह्मा विराजते हैं। इससे ब्राह्मण जो सोचता है, वह होता है। जो कहता है, वह फलीभूत होता है। ब्राह्मण जिसे वरदान आशीर्वाद दे, वह धन्य हो जाता है। इतना ही नहीं वह जिसे शाप दे, वह भी कल्याणप्रद है।

      नारद ने विष्णु को शाप दिया। विष्णु ने उसे सहर्ष अंगीकार किया। इससे विष्णु को तीन बार अवतार लेना पड़ा। नृसिंह, राम एवं कृष्ण के रूप में वे सर्वाधिक ख्यातिलब्ध देव हैं। ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवये तीनों देव ‘काल’ हैं। ऐसा श्रुतिमत है। 

     विष्णुर्ब्रह्मा च भगवान् रुद्रः काल इति श्रुतिः।

   ~कूर्म पुराण (उ. वि. ३५।७१)

Exit mobile version