कुमार चैतन्य
चैतन्य आत्मा के जो भी मूलभूत आत्मिक गुण हैं उनका अनुभव योग के माध्यम से स्वयं के आन्तरिक जगत में स्थित होकर भी किया जा सकता है। वे अनुभव अभौतिक अर्थात अधिभौतिक होते हैं।
इन आन्तरिक अनुभवों को समझने और समझाने का एक और दूसरा भी आयाम होता है। वह आयाम (पहलु) मनोजगत का है। जितने भी आन्तरिक या आत्मिक गुणों के अनुभव मनुष्य को होते हैं, वे सब के सब मनोवैज्ञानिक अनुभव होते हैं।
या यूं कहें कि मनोदैहिक (Psycho somatic) अनुभव होते हैं। अर्थात ये अनुभव मन के क्षेत्र में घटित हुए अनुभव होते हैं जो मन (विचार) के द्वारा ही होते हैं।
इस मनोदैहिक अनुभवों के विषय को हमें समझ लेना चाहिए। “मन मेरा है, मेरा मन – ऐसा हम हमेशा कहते हैं। अर्थात मन आत्मा के सन्निधि में तो है पर यह मन आत्मा की एक अधिभौतीक अवस्था का नाम है।
जब विचार तरंगे उठ रही होती हैं तो मन है और यदि विचार तरंगे नहीं उठ रही होती हैं तो मन नहीं होता है। मन उस वक्त मर्ज होता है। लेकिन आप उन दोनों अवस्थाओं को देखने वाले (दृष्टा) फिर भी वैसे के वैसे ही बने रहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि मन आपकी ही शक्ति है लेकिन आपसे अलग है और आप चेतन सत्ता (आत्मा) अलग हैं।
आत्मा के अनुभवों के विषय को भी स्पष्ट समझ लेते हैं। सुख, शान्ति, प्रेम, पवित्रता, शक्ति, ज्ञान और आंनद आदि जिन भी गुणों का अनुभव आत्मा करती है ये आत्मा के आत्मिक गुण होते हैं। इन्हें ही हम मौलिक गुण कहते हैं। इन गुणों के अनुभव वास्तव में मनोदैहिक अनुभव होते हैं। हमारे इस स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर है।
सूक्ष्म शरीर के भीतर मनस शरीर (मानसिक शरीर) होता है। मनस शरीर (मेंटल बॉडी) में जब एक निश्चित प्रकार के संवेदन पैदा होते हैं तब उसकी एक निश्चित प्रकार की अवस्था होती है। वह निश्चित प्रकार की अवस्था होना ही गुणों का अनुभव करना है। मान लीजिए एक निश्चित प्रकार की अवस्था से जो अनुभव हुआ उसे हमने सुख के गुण की अनुभूति का नाम दे दिया।
मन जब एक दूसरी अवस्था में होता है तो हम उसे शान्ति के गुण की अनुभूति का नाम दे देते हैं। मन जब एक तीसरी अवस्था में होता है तो हम उसे प्रेम का नाम दे देते हैं। इत्यादि इत्यादि… इसी तरह अनुभूतियों की अनेक अवस्थाएं होती हैं। ठीक वैसे ही एक निश्चित प्रकार की मनस अवस्था बनने पर अन्य अनेक गुणों की अनुभूति होती है।
मन जब अन्य प्रकार की अवस्थाओं में होता है तो उन अवस्थाओं को हम दूसरे प्रकार के गुणों के अनुभव का नाम दे देते हैं।
आत्मिक स्वरूप के गुणों के अनुभवों की अनुभूति करने के लिए मनुष्य परमात्मा से मिलने की इच्छा करता है। परमात्मा से मिलने की प्यास में वह अनेक कर्म कांड करता है। वह यही सोचता है कि जब परमात्मा एक दिव्य व्यक्ति की तरह है। जब वह मिलेंगे तब ही मुझे ये आत्मिक गुण अनुभव होंगे अर्थात तभी मुझे आत्म अनुभूति या परमात्म अनुभूति होगी।
वह यही सोचता है कि परमात्म मिलन एक भौतिक जगत की स्थूल अथवा पदार्थगत प्रक्रिया है। वह यही समझता है कि जब वह कोई प्रकार का भौतिक रूप का परमात्म मिलन होगा तब ही मेरी आन्तरिक आध्यात्मिक प्यास बुझेगी। मनुष्य अपनी कल्पनाओं में परमात्मा को एक व्यक्ति की तरह देखता है। परमात्मा से एक व्यक्ति की तरह ही मिलना चाहता है। उसके लिए अनेक प्रकार की विधि अपनाता है। मनुष्य भौतिक देह व दुनिया में परमात्मा को ढूंढता है।
बहुत गहरे मनोविज्ञान को समझोगे तो पाओगे कि मनुष्य असल में करना तो चाहता है स्वयं के आत्म स्वरू की अनुभूति ही, पर चूंकि मनुष्य को सदियों से भक्ति और सतसंगों में यही समझाया गया है कि परमात्मा से मिलने के लिए कहीं दूर जंगल जाना होगा। वह दूर कहीं हिमालय का वासी है। उससे मिलने के लिए बड़ी कठिन तपस्या करनी होगी।
बहुत तप जप विधि विधान करने होंगे। उसे परमात्म अनुभूति या परमात्म मिलन का नाम दे दिया गया है। लेकिन वह इस बात से अनभिज्ञ है कि उन आत्मिक गुणों के अनुभवों को अपने स्वयं के अन्दर ही प्रतिष्ठित होकर किया जा सकता है।
आत्मिक गुणों के अनुभव कहीं बाहर से नहीं आते। ये अनुभव मनुष्य के मनोजगत में ही घटित होते हैं। अध्यात्मिकता कहती हैं कि इन अनुभवों को बिना किसी भौतिक उद्दीपनों के , बिना किसी भौतिक सहयोग के भी किया जा सकता है। राजयोग भी इन्हीं अनुभवों में प्रवेश करने की ध्यान विधि है। जब चेतना स्वयं के अन्तर की ओर उन्मुख (अंतर्मुखी) होती है, तो शनै शनै वह अपने उस केन्द्र पर स्थित हो जाती है जहां से आत्मा के सभी मौलिक आत्मिक (अधीभौतिक) गुणों का अनुभव होने लगता है।
इसे ही योगियों ने “कस्तूरी कुंडलि बसे” कहा है। जैसे मृग के स्वयं के अंदर ही कस्तूरी विद्यमान रहती है लेकिन वह उसे प्राप्त करने के लिए पूरे जंगल में घूमता है। अर्थात परमात्म अनुभूति की अल्केमी (रासायनिक प्रक्रिया/मनोदैहिक – आध्यात्मिक प्रक्रिया) मनुष्य आत्मा के स्वयं के भीतर ही है।
परन्तु मनुष्य परमात्म अनुभूति (मिलन) को बाहर की घटना समझ उसे बाहर ढूंढते हैं। भावार्थ यह है कि आत्मिक अनुभूति का केंद्रिभूत अनुभव ही अपने आप में बड़ा मीठा और अलौकिक आनन्द से सराबोर कर देने वाला अनुभव होता है। वह अलग बात है कि किसी आध्यात्मिक आभा से संपन्न आत्मा के सन्निध्य में रहकर यह आत्मिक अनुभूति का केन्द्रीय अनुभव सहज हो सकता है। लेकिन इस आत्मिक अनुभूति में ही परमात्म अनुभूति समायी हुई रहती है.
जैसे ही कोई आत्मा स्वयं के दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार देह से प्रथक होकर कर लेती है तत्क्षण वह आत्मा अपने स्वदेश को और परमात्मा के परम दिव्य स्वरूप को भी अनुभव करने के लिए योग्य हो जाती है। योग का विज्ञान यह कहता है कि आत्म अनुभूति की पराकाष्ठा परमात्म मिलन की पृष्ठभूमि तो है ही है। पर इससे भी अधिक यह स्वयं में ही इतनी तृप्तिदायक है कि यह स्वतः ही और ज्यादा प्रगाढ़ होकर परमात्म अनुभूति में परिवर्तित हो जाती है।
यह निश्चित ही ठीक बात है कि भौतिक जगत के बाहरी उद्दीपन भी अनेक प्रकार के होते हैं। वे उद्दीपन भी निमित्त कारक बन कर आत्मा के मनस शरीर में कुछ निश्चित प्रकार के संवेदन पैदा करते हैं। वे संवेदन आत्मा को वैसे वैसे आत्मा के गुणों के अल्पकालिक अनुभव कराते हैं। लेकिन वे अनुभव अन्तर जगत के अनुभवों के समक्ष फीके, न्यूनतम तीव्रता वाले और अल्प समय अवधि वाले होते हैं।
उपरोक्त विवेचन से हमें यह स्पष्ट हो गया कि आन्तरिक गुणों के अनुभव दो तरह से अर्थात दो प्रक्रियाओं से के द्वारा होते हैं। पहला – आत्मिक जगत में योग के माध्यम से प्रवेश करने से। दूसरा – बाहरी जगत में स्थूल इन्द्रियों के माध्यम से पदार्थ के द्वारा हुए प्रभावों से। इन दोनों प्रकारों की प्रक्रियाओं की विधियां तो अलग अलग हैं। लेकिन दोनों के अनुभव एक जैसे होते हैं। परन्तु यहां समझने की महत्वपूर्ण बात यह कि दोनों विधियों के द्वारा अनुभव एक जैसे होते हुए भी इन दोनों के अनुभवों के परिणाम में दिन – रात, जमीन – आसमान का अन्तर होता है।
भौतिक जगत के उद्दीपनों के द्वारा किए हुए अनुभव :- ये अनुभव मनुष्य की चेतना को पदार्थ जगत से जोड़ते हैं। मनुष्य की चेतना बहुत संकीर्ण होती जाती है। इन अनुभवों के होने की प्रक्रिया में मनुष्य की शक्तियां और अनुभूति करने की क्षमता कम होती जाती हैं। मनुष्य की संवेदनशीलता न्यूनतम होती जाती है। मनुष्य की चेतना पदार्थ के साथ तादात्म स्थापित करती जाती है और पदार्थ में बंधती चली जाती है। यह पदार्थ चेतना उसे पदार्थ के परतंत्र करती जाती है। जीवन अस्वाभाविक होता जाता है। योग के माध्यम से आन्तरिक जगत में प्रविष्ट होकर किए गए आत्मिक गुणों के अनुभव :- ये अनुभव मनुष्य की चेतना को आत्मा के स्वरूप और परम ऊर्जा के स्रोत परमात्मा से जोड़ते हैं। ये अनुभव मनुष्य की चेतना की आभा (शक्तियों) को अनन्त गुणा बढ़ा देते हैं। मनुष्य को अनहद का अनुभव कराते हैं। योग मनुष्य की चेतना को परम स्वतंत्रता का खुला उन्मुक्त आकाश देते हैं।
निष्कर्ष यह हुआ कि एक जगत है स्थूल भौतिक अनुभवों का। दूसरा जगत है सूक्ष्म मनोदैहिक अनुभवों का। इन दोनों जगत के अनुभवों में बहुत गहरा तालमेल है। एक जगत में किया हुआ अनुभव दूसरे जगत के अनुभव को प्रभावित करता है। दूसरे का अनुभव पहले के अनुभव को प्रभावित करता है।
जीवन है तो ये दोनों जगत हमारे साथ हैं ही हैं। इन दोनों जगत को संभाले हुए मनुष्य को जीवन में चलना होता है। लेकिन जीवन की प्रगाढ़ता का अनुभव योग के द्वारा आत्मिक गुणों के अनुभव करने में निहित है। पदार्थ जगत के बाहरी उद्दीपनों के माध्यम से अनुभव करने में ना तो जीवन की प्रगाढ़ता है और ना ही दिव्यता है।
उसमें ना तो चेतना का उत्थान है और ना ही उसमें जीवन का अहोभाव है। उसमें ना तो परमात्म अनुभूति का आनन्द है और ना ही उसमें चेतना की परम स्वतंत्रता का अनुभव है।*
उपरोक्त ये दोनों प्रकार की स्थितियां हमारे सामने स्पष्ट हैं। जब हम अपने आध्यात्मिक (आत्मिक) अनुभवों को बढ़ाने के लिए पुरुषार्थ (साधना) करने लगते हैं तब भी उपरोक्त आन्तरिक और बाहरी वाली दोनों स्थितियां रहती हैं। साधना करते हुए भी जब तक जीवन है तब तक ये दोनों स्थितियां रहेंगी ही रहेंगी। साधना करते करते केवल इतना किया जा सकता है कि इन स्थितियों के समीकरण को बदला जा सकता है। इन दोनों प्रकार के अनुपात में एक भारी अन्तर लाया जा सकता है।
आध्यात्मिक योग साधना करते करते आन्तरिक अनुभवों के अनुपात को निरन्तर बढ़ाया जा सकता है। इस प्रक्रिया में पदार्थ के स्थूल इन्द्रियों के अनुभवों का अनुपात कम से कम होता जाएगा। इस बदलते अनुपात में साधना की प्रगति के कई पड़ाव आते रह सकते हैं। साधना का समय ऐसा भी आता है जब पदार्थ गत अनुभवों की पूर्णाहुति हो जाती है और आत्मा स्थूल जगत के भौतिक देह के अनुभवों से परे हो जाती है।
उसे सम्पूर्ण अवस्था कहें या फरिश्ता कहें या कुछ और अच्छा सा नाम दे दें, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। लेकिन उस वक्त भी आत्मा होश पूर्वक अपनी पूर्ण चैतन्यता के साथ अपने मनोदैहिक अनुभवों में रह सकती है और दूसरों को भी मनोदैहिक अनुभव करा सकती है। इसी अवस्था का नाम “कस्तूरी कुंडल बसै।” की अवस्था है।

