अग्नि आलोक

बस्तर बस्तरः एक मील का पत्थर

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कनक तिवारी 

मैंने पुुस्तक ‘बस्तर बस्तर‘ को दो भागों में बांटा है। शुरुआती आधी किताब एक विशेष आदिवासी परिवार को केन्द्रीय भूमिका में रखते बस्तर के आदिवासी जीवन की मानव गंध को अपनी सांसों में आरोहित, अवरोहित करती दण्डकारण्य क्षेत्र का ज़िंदगीनामा लिखती है। यह कोई चलताऊ कथा नहीं है। यह बस्तर के जीवन की धड़कनों की आत्मकथा है, जो अपनी थपकियों, बतकहियों, हिचकियों और चीत्कारों तक में सुनी जाती रहती है। लेखक की बहुविध कलात्मकता है कि कथा एक साथ कई स्तरों पर बार बार पढ़ी, सुनी, गूंथी और समझी जा सकती है। अलबत्ता यह महज़ कथा नहीं है। पाठक उस वक्त खुद एक बस्तरिहा जीवन में रूपान्तरित होकर लोक जीवन की उंगली पकडे़े यायावर की तरह अनुभवसिद्ध होने लगता है। वह भौंचक, आतंकित और शांत भी होना महसूस करता है। कथा के कई किरदार खानाबदोश और खामोश भी कर दिये जाते हैं। फिर भी मनुष्य होने और होते रहने का हौसला नहीं टूटता। जीवन के प्रति उसका पारस्परिक लगाव इसलिए कमतर नहीं होता। क्योंकि वह अपने माहौल के भूगोल, इतिहास और संस्कृति को अपनी ही शख्सियत का बाहरी परिचय मानता है। आदिवासी के लिए बस्तर फकत भूगोल, इतिहास या केवल अर्थशास्त्र या समाजशास्त्र नहीं है। वह उसके लिए एक औपचारिक मानव संसाधन विश्वविद्यालय भी नहीं है। उसमें मनुष्य होने का अहसास कुदरत के जरिए रूपायित होता है। तो वह उसका नामकरण बस्तर ही कर सकता है। बस्तर आदिवासी की दुनिया का समग्र है। इसी दुनिया में लोकबाबू के कारण वह समझता चलता है कि सरकार, काॅरपोरेट, भ्रष्ट नेता, नक्सली, पत्रकार, सुरक्षा सैनिक, अफसर और तमाम तरह के शोषक आकर उसकी उखड़ती सांसों को तेजी से उखाड़ने का कोई एजेंडा लेकर आए हैं। आदिवासी टूट रहा है। कुचला जा रहा है। हिंसक भाषा में कहें तो उसकी बोटी बोटी काटी जा रही है। उसे तेलंगाना या आंध्र सहित अन्य पड़ोसी राज्यों में पलायन करना पड़ रहा है। वह पुलिस के थानेदार को धरती का सबसे बड़ा हुक्काम समझता है। अपनी बेटी, बहन, पत्नी की अस्मत लुटते देखकर उसके मन में विद्रोह, कायरता और लाचारी की टीसती प्रतिक्रिया होती है। उसका दमन ताजा इतिहास की सबसे घिनौनी राष्ट्रीय घटना है। ऐसी घटनाओं के गुणनफल को लोकबाबू जोर देकर ‘बस्तर बस्तर‘ कहते हैं। केवल बस्तर कहने से मानो किसी कालखंड में भूगोल के किसी इलाके का कोई बयान हो रहा हो। ‘बस्तर‘ शब्द के दोहराव से भी यदि एक प्रागैतिहासिक आदिवासी संस्कृति का अहसास यदि किसी व्यक्ति को विचलित नहीं करता तो वह इन्सान नहीं केवल संवेदनरहित दोपाया है। ‘वह नर नहीं, नर पशु  निरा है और मृतक के समान है।‘ 

लोकबाबू ने किताब का क्लाइमैक्स दरअसल तीसरे अध्याय ‘सलवा जुडूमः गिरी गाज बस्तर पर‘ बस्तर की एक ‘एकमेवो द्वितीयो नास्ति‘ परिघटना को लेकर विस्तारित और विषयांकित किया है। यह शब्दों का विपर्यय या उपहास है कि सलवा जुडूम का अर्थ शांतिपूर्ण मार्च होता है। यह तो शाब्दिक अर्थ की घिनौनी उलटबांसी है। (मैंने खुद इसी परिघटना को लेकर काफी कुछ लिखा है। इसकी संवैधानिक मीमांसा करते इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी सहकार किया है।) नेता-काॅरपोरेट गठजोड़ मेरी और लोकबाबू की नज़र में निश्चित ही देश का सबसे घिनौना समाज विरोधी राजनीतिक गुनाह है। बस्तर के घने रहे जंगल आदिवासी का रहवास भर नहीं हैं। बस्तर उनकी धमनियों में बहता रक्त है। उस रक्त की जांच केवल बस्तर के वन कर सकते हैं।

आदिवासी की ज़िंदगी में अन्यों बल्कि शहरी सभ्यों का हस्तक्षेप और उसे वहां से बेदखल करने की साजिशें बीसवीं सदी में ज़्यादा सघन होकर इंसानी गुनाहों का सबसे बड़ा कारनामा हैं। मराठों, फिर अंगरेज़ी शासन काल और भारत की आज़ादी के बाद सबसे ज़्यादा बल्कि केवल आदिवासी हैं जो औद्योगिक सभ्यता नामक हथियार के शिकार हुए। वे नहीं चाहते कोई उनके लिए कुछ करने का जबरिया अहसान जताए। मौजूदा हालात में उन्हें सरकार से भी मदद नहीं चाहिए। कहते भी हैं भले ही उनके लिए योजनाएं नहीं बनाई जाएं। जो लेकिन उनका है, उन संसाधनों की डकैती नहीं की जाए। चार, चिरौंजी, हर्र, बहेरा, आंवला, तीखुर, कोदो, कुटकी, महुआ, लोहा, कोयला, पानी, फूल, पत्ती, पेड़ और सबसे बढ़कर पुश्तैनी आदिवासी ज्ञान सरकारें बलात्कारियों की मुद्रा में अपने और कारपोरेटियों के लिए झपटती हुई उनके जिस्म, जेहन तथा जीस्त को जिबह कर रही हैं। यही पीड़ा तो है लोकबाबू के उपन्यास में। उनकी अनोखी कलम कोई अकादेमिक सामाजिक शोध या विरोध पत्र लिखने के बदले बस्तर की इंसानी जिंदगी को गल्प के तंतुओं में बींधकर ऐसी मानव कथा कह देती है जो पाठक के संज्ञान आने के बाद उसमें केवल संवेदना के स्फुलिंग नहीं उगाती। पाठक अपनी समझ की वरीयता के किसी औपन्यासिक चरित्र में अंतस्थ होकर उसकी पीड़ा या उद्दाम खुद भोगने लगता है। इस तरह के उपन्यास तो हमारे छत्तीसगढ़ के स्वर्ग बस्तर की पृष्ठभूमि बल्कि गोद में रहकर पढ़ सकने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। नतीजतन श्रेय लोकबाबू का है। (जारी है।)

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