भाजपा के स्थापना दिवस और कांग्रेस की स्थापना के सवा सौवें वर्ष के आयोजन छह अप्रेल को देश में बस्तर सहित हो रहे थे। उस दिन नक्सलियों ने उन्हें तोहफे के रूप में सुरक्षाकर्मियों की लाशों का अंबार दे दिया। नक्सल हिंसा के इतिहास की अंकगणित का वह सबसे बड़ा आंकड़ा हुआ जब दंतेवाड़ा जिले के चिन्तलवार गांव के निकट हजारों की संख्या में जंगलों में छिपे नक्सलियों ने सर्च करने जा रही पुलिस पार्टी को लोथड़ों में बदल दिया। नक्सलियों की निंदा की गई है। हमले को कायराना कहा गया है। हताहत परिवारों के लिए क्षतिपूर्ति की घोषणाएं की गईं हैं। नक्सलियों को नई चुनौतियां भेजी गईं हैं। पुलिस बल में और इजाफा करने की मांग हो गई है। पुलिस के हथियारों को अधुनातन बनाने की मुहिम फाइलों में सरकने लगी है। लेकिन इसके बावजूद नक्सली ज्वार है कि बस्तर में थम ही नहीं रहा है। सुरक्षाकर्मियों की हत्याओं की जितनी भी निंदा की जाए, कम है। नक्सलवाद का ऐसा घिनौना स्वरूप भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण कभी नहीं रहा। आने वाला समय भी संदिग्ध और संकुल है।

बस्तर के सांस्कृतिक-सामाजिक विनाश की कथा मोटे तौर पर साठ के दशक में पूर्व शासक प्रवीरचंद्र भंजदेव की सरकारी हत्या के द्वारा शुरू हुई। प्रवीर आदिवासियों के लिए भगवान थे।
भले ही उनकी हरकतें अपरिभाषेय होती थीं। तत्कालीन मध्यप्रदेश की कांग्रेस, संविद और भाजपा सरकारों ने बस्तर को मध्य युग का एक टापू और विदेशी सैलानियों को दिखाने के लिए एक तिलिस्मी पर्यटन स्थल बनाकर रखा। यह तो आज तक प्रचारित है कि छत्तीसगढ़ आदिवासियों का वह इलाका है जहां अब भी वे अधनंगे रहते हैं। नहाते तक नहीं। उनकी स्त्रियां ब्लाउज नहीं पहनतीं। जरूरत होने पर वे कीड़े मकोड़े, पशु पक्षी और पेड़ की छाल तक खा लेते हैं। उन्हें रोशनी से परहेज होता है। वे महुए की कच्ची शराब पीकर उन्मत्त रहना चाहते हैं। वे घोटुल जैसी कबाइली परंपरा को अपने से चिपकाए हुए हैं जिसे एक तरीके से कामुकता का विद्यालय कहा जा सकता है। इन षड़यंत्रकारी अफवाहों को गढ़ने के परदे के पीछे आदिवासियों के शोषण का खुला खेल शुरू हो गया था। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, गुजरात, बिहार, तमिलनाडु, गुजरात और राजस्थान वगैरह के व्यापारी परिवार धीरे धीरे बस्तर में बसते गए। उन्होंने राजनीति, सामाजिक संस्थाओं, खदानों, वन उत्पादों आदि पर अपना शिकंजा कसना शुरू किया। आदिवासी उनके लिए रामायणकालीन चारणों की तरह उपस्थित समझे गये। बस्तर में विकास के किसी भी बड़े उपक्रम में आदिवासियों का सीधा हस्तक्षेप नहीं है।
व्यापारियों और उद्योगपतियों ने लौह अयस्क तथा अन्य खनिजों के अतिरिक्त चार, चिरौंजी, कत्था, तीखुर, तेंदूपत्ता, महुआ, लकड़ी जैसे वन उत्पादों पर सफलतापूर्वक डाका डालना शुरू किया। आदिवासी टुकुर टुकुर देखता रहा। सरकारी कारिंदे डकैतों की रक्षा करते रहे और अपना कमीशन लेते रहे। कोई शिक्षक बस्तर के सुदूर गांव में पढ़ाने नहीं जाता। वह विधायकों का निजी सचिव और सलाहकार बन जाता है। सरकार ने हाईकोर्ट तक में हलफनामा दायर किया है कि बस्तर में कितनी भी कोशिश करें डाॅक्टर नियुक्त होने पर भी कार्यभार ग्रहण नहीं करते। सड़कों की हालत पगडंडियों से ज्यादा खराब रही है। शराब बनाने के पुश्तैनी अधिकारों को छीनकर देसी विदेसी शराबों के ठेकों का बस्तर में जंगल उगाया गया। आबकारी मंत्री विधानसभा में फरमाते हैं कि हमें गौरव है कि हमने शराब ठेकों के जरिए कमाई का राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किया है।
बस्तर की बालाओं और हस्तशिल्प के उत्पादन वगैरह के चित्र देसी विदेसी पर्यटकों को भेंट देने के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों की सड़कों के किनारे और सरकारी कैलेंडरों, डायरियों वगैरह में चस्पा करने को सांस्कृतिक क्रांति कहा जा रहा है। पटवारियों के रेकाॅर्ड में बस्तर के अधिसंख्य आदिवासी जमीनों के कब्जे से या तो नदारद हैं या अतिक्रमणकारी। पुलिस को देखते ही वे भागते रहे हैं कि उनकी स्त्रियां, मुर्गियां और बकरियां किस तरह बचा ली जाएं।
नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कारपोरेशन के इतिहास की छाती और अफसरों की जेबें इस गर्व से फूल रही हैं कि वहां लौह अयस्क का रेकाॅर्ड उत्पादन होकर उसे जापान जैसे विदेशी मुल्कों को सीधे बेचा जा रहा है। भले ही उससे बस्तर के विकास का कोई सीधा संबंध आदिवासी को दिखाई नहीं देता। बस्तर को तबाह करने के लिए शाल वनों को काटकर पाइन या देवदार के वृक्ष लगाने की कुटिल योजना लगभग सफल होने की स्थिति में आ गई थीं जब इंदिरा गांधी ने उसे रद्द कर दिया। यही हाल बोधघाट जल विद्युत परियोजना का था जिसके विवाद के चलते उसे रोकना पड़ा। बस्तर के अधिकांश इलाकों में मंत्री तो दूर विधायकों तक को दौरा करने से परहेज होता था।
नरोन्हा और ब्रम्हदेव शर्मा जैसे कलेक्टरों को छोड़कर बड़े जिलाधिकारी वार्षिक आयोजनों की तरह कहीं कहीं दिखाई देते रहे। लेकिन अपने राजनीतिक आकाओं के लिए सब कुछ ‘कलेक्ट‘ जरूर करते रहे। शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, सड़कें, सिंचाई पेयजल, खाद्यान्न, कल्याणकारी योजनाएं वगैरह में बस्तर राष्ट्रीय औसत से तो बहुत पीछे है ही, वह प्रदेश के औसत का भी पिछलग्गू है। कोई दो वर्ष पहले योजना आयोग के एक विशेषज्ञ दल ने चौकाने वाली खस्ता माली हालत का बस्तर को देखकर चित्रण किया है और सरकारी बदइंतजामी पर कटाक्ष किया है। सरकारों ने उस रिपोर्ट को न तो श्वेत पत्र की तरह जारी करने की हिम्मत जुटाई और न ही उस पर सार्थक बहस मुबाहिसा किया।
इस मनोवैज्ञानिक ऐतिहासिक, भौगोलिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में बस्तर में नक्सलियों ने अपने पैर पसारे और अब सरकारों के पैर उखाड़ने का उनका दुस्साहस है। इसमें कहां शक है कि नक्सली हिंसा का विचार हर तरह से कुचल दिया जाना चाहिए। लेकिन हर तरह का अर्थ केवल गोला बारूद, सुरक्षा बल, सेना या ग्रीन हंट नहीं है। सरकारें अपनी नाकामी को छिपाने के लिए किसी नए भूत को पैदा नहीं करें तो अच्छा है। यह ज्यादा खतरनाक है कि बस्तर में आदिवासियों से सब कुछ छीन लेने के बाद अब उनके पैरों तले की जमीन खिसकाई जा रही है। वहां टाटा और एस्सार सहित बड़े स्टील कारखाने आदिवासियों की जमीनें जबरिया छीनकर लगाए जा रहे हैं। टाटा का दुस्साहस तो यहां तक है कि उसने राज्य शासन की पुनर्वास नीति के बरक्स अपनी पुनर्वास नीति जारी की है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट वह पुण्य स्थली है जहां टाटा और एस्सार द्वारा आदिवासियों की जमीनों को सरकारी मदद से हड़पने के कथित आरोप वाली जनहित याचिका की सुनवाई उस दिन हो गई जिस दिन हाईकोर्ट के सारे वकील हड़ताल पर थे। और दूसरे मुकदमों की सुनवाई नहीं हुई थी। बस्तर में पुलिसिया एनकांटर और तरह तरह के जुल्मों को लेकर जितनी भी जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लंबित हैं यदि उनका निराकरण जल्दी हो जाता तो न्यायपालिका को नक्सलवाद को हल करने के लिए बड़ा प्रतिभागी समझा जा सकता था।
छत्तीसगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के अनिल अग्रवाल की स्टरलाइट कंपनी ने औने पौने में बाल्को कारखाना खरीदकर आरोपों के अनुसार सैकड़ों एकड़ सरकारी भूमि पर कब्जा कर हजारों पेड़ कटवा दिए हैं। सरकार विधानसभा में अभियुक्त भाव से यह स्वीकार कर चुकी है। कोरबा और रायगढ़ जिलों को भाजपा और कांग्रेस के राजनीतिक रसूखदारों के मौजूदा राजनीतिक वंशज प्रदूषण और नाजायज कब्जों के जरिए तबाह कर रहे हैं। सरकार है कि आदिवासियों से सुन रही है कि वे जी तो रहे हैं पर मनुष्य ही नहीं रहे। मुक्तिबोध ने अपनी भयानक कविता ‘अंधेरे में‘ जिस भयावहता का अंतिम ड्राफ्ट छत्तीसगढ़ में बैठकर तैयार किया था, वह छत्तीसगढ़ में ज्यादा सच हो रहा है।
गरीबों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के जवानों और निरीह जनता को नक्सली वनैले पशुओं की तरह मार रहे हैं। वह कृत्य घृणा और सरकारी हिंसा के योग्य है। पुलिस के आला अफसर बार बार खेद प्रकट करते हैं कि उनसे कहीं चूक हो रही है। लेकिन ऐसी कथित चूकों के लिए आज तक कोई जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? पुलिस के आला अफसरों को अपना काम छोड़कर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए बहुत फुर्सत छत्तीसगढ़ में क्यों मिल जाती है? दहशतगर्दी फैलाना, ठेकेदारों से जबरिया वसूली करना, हर तरह के विरोध का सिर काट लेना, हर निष्पक्ष व्यक्ति को मुखबिर करार देना नक्सलियों का फैशन बन गया है। फिर भी वे बुद्धिजीवियों से मध्यस्थता करने और उनकी पैरवी करने की अपील तो करते हैं। सरकारों के अदृश्य सलाहकार इतने कूढ़ मगज हैं कि वे सिविल समाज को सरकार के लिए अछूत बनाते रहते हैं। हिंसा मनुष्य-व्याकरण में एक अल्पविराम तो हो सकती है लेकिन स्थायी हल का पूर्ण विराम नहीं। सरकार और नक्सली वार्ता करें न करें, लोकतंत्र में जन-संवाद की भूमिका खारिज नहीं की जा सकती। सिविल समाज की निष्चेष्ट तटस्थता छत्तीसगढ़ में एक भयानक त्रासदी के द्वार पर है। जिस राज्य में सर्वोच्च नौकरषाही पर करोड़ों में खेलने के आरोप हैं। गृह मंत्री सार्वजनिक बयान देते हैं कि उनका विभाग सर्वाधिक भ्रष्ट है। प्रतिपक्ष कौरव सभा में पराजित पांडवों की भूमिका में है। मंत्रियों के भ्रष्टाचार का सेंसेक्स भारत में सर्वाधिक छत्तीसगढ़ में उछाल पर है। सलवा जुडूम बस्तर में शिविर भर नहीं है। वह राजनीति में दोनों बड़ी पार्टियों का यथार्थ बन चुका है। देश का सबसे बड़ा और काला नजरबंदी कानून छत्तीसगढ़ में ही बना है। लेकिन नक्सलवाद को कुचलने के बदले उस कानून को फुफकारा ही नहीं काटा भी जा रहा है। अंगरेजी तेवर के ग्रीन हंट के साथ साथ यदि उसके हिन्दी अनुवाद ‘हरित क्रांति‘ को भी अमली जामा पहनाया जाए, राज्यपाल संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूचियों के अनुकूल आचरण करें। पंचायत राज अधिनियम के साथ ‘पेसा‘ को भी संयुक्त किया जाए, वन भूमि के व्यवस्थापन पर ईमानदारी से अमल किया जाए, सभी सरकारी योजनाओं में आदिवासियों के हक और हिस्सेदारी को सारे खतरे उठाकर भी सुनिश्चित किया जाए, आदिवासियों की भूमियों को अरबपति उद्योगपतियों के लिए वधू का दहेज नहीं समझा जाए, भ्रष्टाचार के दर्जनों लम्बित प्रकरणों पर सी.बी.आई. को जांच पूरा करने की हरी झंडी दिखाई जाए, तब ही तो आदिवासियों से कथित मुख्यधारा में लौटने की अपील का कोई सार्थक प्रयोजन होगा। आज बस्तर जल रहा है। यह समय इतिहास के मनुष्य कुरचित भूकंप का है। भूकंप के साथ साथ या कुछ समय बाद ज्वालामुखी के भी फट पड़ने की आशंका होती है।
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी का ही तो अखबार है प्रभात खबर ।कहा जाता है हरिवंश जी सलवा जुडूम के खिलाफ रहे हैं ।वह खुद बताएं। उन्होंने मुझसे कहा था कि बस्तर में आदिवासियों के बुरे हालात पर एक शानदार रिपोर्ट मुझे भेजें। वह रिपोर्ट मैंने भेजी। और वह छपी है। आपके पढ़ने के लिए डाल रहा हूं ।अगर हरिवंश जी ने यह सब नहीं किया होता तो शायद वह उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सोचे जा सकते थे?