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*लोक-कथा : वर्चस्व की जंग*

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          ~ सुधा सिंह 

बहुत पहले की बात है. दूर नगर में एक नट रहता था वह छोटी मोटी कलाबाजी है दिखाकर पैसे कमा लेता क्योंकि मनोरंजन के साधन कम थे और कला की कमी इसलिए उसके पास जो भी कलाबाजी हाथी उतने में ही लोग खुश हो जाते थे।

     हर व्यक्ति में हर गुण तो होता भी नहीं है हर काम हर कोई कर भी नहीं पाता नट के दो लड़के थे एक का नाम भीम जो नाम के अनुसार ही खूब मोटा ताजा और दूसरे का नाम लंबू नाम के अनुसार ही खूब विशालकाय , नट ने सोचा जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा तो मेरी कला यहीं पर खत्म हो जाएगी और मेरा नाम धीरे-धीरे लोग भूल जाएंगे क्यों ना मैं अपनी कला किसी को सिखा दूं।

      उसने अपने दोनों बेटों से कलाबाजी या करने के लिए कहा , बड़े लड़के को भीम को जैसे ही रस्सी पर चढ़ाया और सोचा कि दो चार कदम चल कर कला बाजिया सीखे रस्सी टूटी और दिन धड़ाम से नीचे आ गया।

नट का उत्साह कम हो गया लंबा होने के कारण रस्सी पर टिक नहीं पा रहा था बड़ी मुश्किलों से रस्सी पर चढ़ा लेकिन लंबा होने के कारण कभी पेड़ और कभी किसी भवन से उसका सर टकरा जाता उसने भी कलाबाजी के खेल दिखाने से मना कर दिया।

        दोनों बच्चे पढ़ाई करने लगे ; उसके बाद उसके घर खानदान में बहुत सारे बच्चों को उसने इसके लिए तैयार किया पर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसका वजन रस्सी पर चलने योग्य हो। नट ने फैसला किया कि मेरे इस खेल तमाशे में किसी की  रुचि नहीं है , और ना ही कोई योग्य व्यक्ति मिल रहा है। तो अब मुझे अपनी इस कला को खत्म ही करना पड़ेगा।

एक दिन वह गांव से अपना बोरिया बिस्तर बांध कर जा रहा था , रास्ते में उसे धोबी का घर दिखाई दिया उसने सोचा कि अभी ये डंडा और रस्सी तो मेरे किसी काम की नहीं अगर मैं धोबी को दे दूं तो वह, रस्सी से कपड़े सुखाएगा और डंडा भीजानवर हांकने के काम आएगा।

      वह धोबी के घर पहुंचा और अपना रस्सी का गठन और डंडे उसके सुपुर्द  , क्योंकि धोबी के घर पर बहुत बड़ा मैदान था जहां पर कपड़े की धुलाई और अंगाई इत्यादि करके फैलाए जाते थे उसकी बेटी मुनिया वहां पर कपड़े सुखा रही थी. कपड़ों को सुखाते कभी-कभी उन रस्सियों पर झूल जाती। और कभी छलांग मार के , दूसरे अरगनी  पर पहुंचजाती।

     नट यह देखकर हैरान हुआ उत्सुकता बस वह कपड़ों से भरे हुए गलियारे की तरफ चला गया , उसने मुनिया को अपने पास बुलाया और कहा यह बच्ची सुनो , तुमने यह करतब कमाल कहां से सीखा , उसने बताया कि कपड़ों को फैलाते सुखाते बस ऐसे ही मनमानी करते कभी उछल कूद करती हूं क्या इसे करतब कहते हैं।

     नट की आंखों में आशा की मुस्कान जाग गई और बड़ी है उत्सुकता से उसने बोला हां इसी को करतब और खेल तमाशा कहते हैं , यह ग्रुप तो तुम्हें पहले से मौजूद हैं , अगर थोड़ी सी दीक्षा तुम्हें दी जाए तो तुम जल्दी से सीख जाओगी।

अब क्या था नट ने रस्सी और डंडा लगाया और मुनिया को उस पर चलने के लिए कहा , चुकी मुनिया पहले से ही घर में खेल तमाशे करती थी चंचल गिलहरी की तरह इधर-उधर खुद की और उसका शरीर भी छोटा सा पतली काया सरपट रस्सी पर चढ़ गई, लेकिन इस तरह रस्सी के नीचे खेलना और रस्सी के ऊपर चढ़ने में थोड़ा सा अंतर था , मुनिया डर रही थी पर मास्टर नट ने कहा की डरो नहीं , बस संभाल संभाल कर कदम रखो और रस्सी के उस पार छोर तक जाओ , मुनिया ने रस्सी पार कर ले फिर , नट ने इस पार तक बुलाया ऐसा कई बार दोहराया और हे मुनिया सरपट बहुत ही कम समय में रस्सी के इस छोर से उस छोर पहुंच जाती।

      नट और मुनिया के पिता छगन दोनों ही ताली बजाने लगे और मुनिया ने रस्सी से छलांग लगाई और पिता छगन ने उसे अपनी गोद में रोक लिया, नट को जिस चीज की तलाश थी उसे मिल गया वो खुशी के मारे झूम उठा ।

अब जल्द ही वह अलग-अलग गांव में जाकर , कलाबाजी आ दिखाकर खूब पैसे कमाने लगा , कलाबाजी मोनिया दिखाती और पैसे नट को मिलते , धीरे-धीरे मुनिया की ख्याति बढ़ने लगी।

      अब दूर दूर से लोग मुनिया का करतब देखने आते सुंदर-सुंदर गाने चलते दर्द भरे गीत और उधर मुनिया रस्सी पर कभी मटकी रख कभी ट्यूबलाइट रख कभी नृत्य करती और कभी उस पर सरपट दौड़ती कभी गिरती और संभालती दर्शकों की वाहवाही तालियों से पूरा मजमा गुज उठता और पैसे के ढेर लग जाते।

    नट को आदत पड़ चुकी थी ,  सुदूर प्रदेश कहीं भी बुलावा आता वह जल्दी से देर सबेर मुनिया को बुलावा भेजकर , करतब करने के लिए तैयार होने को कहता।

एक दिन तो मुनिया की तबीयत खराब थी , वैध जी ने घर से बाहर निकलने से मना किया था , इधर नटनी एक बड़े सेठ से करतब दिखाने का ठेका ले रखा था जब मुनिया की तबीयत की खबर पता चली तो उसने सेठ से कहा कि , करतब तो नहीं हो पाएगा क्योंकि कलाकार बीमार है।

     सेठ को गुस्सा आया उसने कहा कि अगर करतब नहीं हुआ तो मैंने जो 200 लोगों की भीड़ जुटा रखी है मतदान सर पर है और तुम ऐसा कह रहे हो मेरी इज्जत की बात है जैसे भी हो आज करतब दिखाना पड़ेगा।

     नट मुनिया के घर गया और हाथ जोड़ने लगा , तबियत खराब होने वह कांप रही थी लेकिन नेट में एक सौदा कर लिया था एक शादी में करतब दिखाना था वह आकर गिड़गिड़ाने लगा मुनिया को दया आ गई वह किसी तरह दवाई खा आराम कर करतब दिखाने के लिए राजी हो गए ऐसा कई बार हुआ धीरे-धीरे , मुनिया के पिता ने कहा कि अब  , करतब तमाशा रहने दो वरना किसी ना किसी लालच से बार-बार करतब करवाता रहा।

     धीरे-धीरे नट धनवान हो गया , मुनिया आज भी केवल कलाबाज ही  थी। आई बड़ी जगह करतब दिखाते मुनिया का नाम हो गया।

एक बड़ी जगह पर करतब करते मुनिया को एक प्रस्ताव आया। मुनिया ने दूसरी करतब कंपनी ज्वाइन कर ली और उसमें भी समय देने लगी , उसका अच्छा काम देख कंपनी उसको पैसे भी देने लगी।

अब नट को गुस्सा आने लगा , वह मुनिया के बारे में अनाप-शनाप बातें इधर-उधर कहने लगा और दुनिया से यही कहता कि इसको तो मैंने बनाया।

मुनिया को बहुत बड़े बड़े प्रस्ताव आते पर उसने सोचा कि नट से कभी बेईमानी नहीं , जैसे अपना काम कर रही हूं जरूरत पड़ने पर उसका भी काम कर दूंगी।

     Bपर नट को यह सब कहां मंजूर था वह प्रतिभा से प्रतिस्पर्धा करने लगा , उसे मुनिया की प्रतिभा से जलन होने लगी , वह यह भूल गया कि उसके खाने के लाले पड़ गए थे , अगर मुनिया ना होती तो शायद उसकी इस कला को  कोई आगे न ले जाता ।

     मुनिया के मुंह पर तो अच्छी बातें करता पर कंपनी वालों से जाकर उसके बारे में बुराई करता , उसे जो व्यक्ति मिलता उसे वही कहता इसने मेरी विद्या को चुराया है।

जो व्यक्ति मुनिया और नट की कहानी नहीं जानता वह नहीं समझेगा की सच में मुनिया ने विद्या को चुराया होगा ।

      यह बात उसकी कंपनी के लोगों से भी कहा , मुनिया को मैंने बनाया , मैं उसका गुरु हूं उसने मेरी विद्या को चुराया है और अब खुद बड़ी कलाबाज बनकर करतब दिखा रही चुगली और शिकायतें जंगल में आग की तरह फैलती हैं बात मुनिया के कान में गई उसे बहुत गुस्सा आया।

मुनिया किसी भी तरह के फसाद और विवाद से बचना चाहती थी। पर नट ने उस को मजबूर कर दिया । अंत में मुनिया ने नट से किनारा कर लिया और अपना काम शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे उसकी कला और करतब के लोग दीवाने हो गए , उसका काम भी अच्छा चल गया। शहर में भी करतब दिखाने लगी और शहर में कला का बहुत सम्मान किया जाता था कई जगह से उसे सम्मान भी मिला उसकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि प्रदेश के बहुत बड़े मंत्री  उससे मिलने उसके गांव में आए अब यह बात नेट को बहुत खराब लगी आज उसने ठान लिया था कि वह जो बुराई पीठ पीछे करता है वह आप सबके सामने ही आकर करेगा।

     मुनिया के घर पर एक बड़ी सी भीड़ जुटी हुई थी जिसमें गांव के आसपास के लोग नेता जी से मिलने और नेता जी द्वारा मुनिया को सम्मान दिए जाने कि उस कार्यक्रम के साक्षी बनने के लिए आए थे , मंत्री जी ने मुनिया को 50000 की सम्मान राशि दी और शहर में आकर अपना सम्मान पत्र लेने के लिए आमंत्रित किया , मंत्री जी की इच्छा जाहिर की कि मुनिया अपने संघर्षों के बारे में लोगों को बताएं और ताकि आने वाली पीढ़ी उससे कुछ सीख सके और इस कला के बारे में जानकारी प्रदान करें।

       मुनिया इससे पहले कुछ कहती नट भीड़ में आकर उस पर चोरी का इल्जाम लगाने लगा और कहा कि उसकी एक कला जूठी है मैं कलाबाज हूं मैं खेल तमाशे दिखाता हूं इस खेल का जनक मैं हूं इसमें मेरी कला को चुराया है।

     मंत्री जी को बहुत गुस्सा आया उन्होंने कहा कि अगर यह सच्चाई है तो आप दोनों के कला की परीक्षा ली जाएगी । और जो सही अर्थों में जीतेगा सम्मान उसी को मिलेगा।

      मंत्री जी ने कहा कि ठीक है आप करतब करके दिखाइए , नट की उम्र बढ़ गई थी और वजन भी , वह राशि पर दो कदम भी नहीं चल पाया, फिर उसके घर से उसके बच्चों को बुलाया गया बारी-बारी से दोनों बच्चों को चढ़ाया गया कोई भी उस रस्सी पर  चढ़ करतब कर नहीं कर पाया ,

उन्होंने मुनिया को रस्सी पर चलने के लिए कहा मुनिया झट से रस्सी पर चढ़ गई और अपना करतब दिखाने लगी ,

सब लोग जोर से ताली बजाने लगे तभी एक आदमी ने कहा , मुनिया का इतने दिनों में वजन नहीं बढ़ा , तुम मुनिया ने बताया कि कला एक साधना है और इस साधना को करने के लिए कला को जिंदा रखने के लिए मैं एक पहर का ही भोजन करती  , ताकि मेरा वजन बरकरार रहे और मैं हमेशा करतब दिखा सकूं।

      उसकी बात सुनकर बाकी खड़े लोगों ने दांतो तले उंगली दबा ली और प्रशंसा में अपने  आप गड़बड़ा कर तालियां बज गई।

    मंत्री जी समझ गए थे कि सम्मान का हकदार कौन है और सम्मान की राशि मुनिया को दे दी।

नट को फिर भी नहीं समझ में आ रहा था वह गुस्सा मैं चीख कर सब से यही कह रहा था कि इसमें मेरी कला को चुराया है।

     अब मुनिया ने पूरी भीड़ के सामने सहज भाव से कहा कि यह बात सच है कि मुझे इस कला का ज्ञान नहीं था मैं ऐसे ही उछल कूद और खेल तमाशे घर में करती मुझे नहीं पता था कि इसको करतब दिखाना कहते हैं।

     लेकिन जब से मैं नट के साथ यानी कि अपने गुरु जी के साथ जुड़ी तब से मैं इस साधना में लीन हो गई , और पूरी तन्मयता के साथ इस को सीखने में लग गई अब शायद क्या ये मेरी गलती है कि मैंने अपनी सूझबूझ का प्रयोग करके, क्षेत्र में प्रगति की।

लेकिन मेरे गुरु को यह सम्मान दिया जाए , मुनिया की बात सुनकर नट लज्जित हो गया।

     मैं कुछ कहता इससे पहले उसके दोनों पुत्रों ने कहा कि पिताजी ने बहुत प्रयास किया कि हम लोग इस कलाबाजी को सीखिए पर हम कभी नहीं सीख पाए जिसके अंदर सीखने की ललक होती है , वह सीख  जाता है , उसी गुरु ने हम सबको सिखाया पर हम सब चिकने घड़े निकले पर मुनिया को यह गुण पहले से प्रदत्त था और उसने पिताजी जी का सानिध्य पाकर उसी और परिपक्व कर लिया। इस सम्मान की सही हकदार मुनिया ही है।

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