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बैताल कथा -नौटंकी

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व्यंग्य : विवेक मेहता

रात के गहराते ही हमेशा की तरह राजा ने श्मशान में प्रवेश किया। पेड़ पर से लाश को उतारा। पीठ पर लादा और चल पड़ा। लाश के अंदर छुपा बैताल अपने काम में लग गया। बोला- “राजन तुम थक गए होगे तुम्हारी थकान दूर करने के लिए कहानी सुनाता हूं-


किसी समय में जम्बूद्वीप में दूरदृष्टि के अभाव के चलते, तात्कालिक फायदे के लिए निर्णय लिए जाने लगें। आदमी से ज्यादा मशीनों को महत्व दिया जाने लगा। इसके कारण पैसे वाला और पैसे वाला होता गया, गरीब और गरीब होता गया। वोट बैंक बढ़ाने के चक्कर में द्वीप एवं द्वीप के सभी गणतंत्रों में लुभावनी योजनाओं पर खर्चे होने लगें। उद्योगपति करोड़ों रुपए के लोन लेकर दिवालिया होने लगें। फिर औने- पौने दाम पर बैंक से सेटलमेंट होता और दूसरा उद्योगपति बैंक से लोन लेकर उसी संपत्ति को खरीद लेता। दूसरे उद्योगपति की रूचि भी बाद में पब्लिक ऑफर निकालकर जनता से पैसे वसूल करने की रहती। द्वीप में उत्पादन बढ़ाने के बजाएं यही धंधा चल निकला था। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा। सरकारी खर्चो में कटौती करने के लिए अघोषित रूप से सरकारी भर्तियां, सेना में भर्तियां कम कर दी गई या बंद कर दी जाने लगी। बेरोजगारी बढ़ने लगी। कभी द्वीप या किसी गणतंत्र में नौकरी की घोषणा होती तो सालों परीक्षा, रिजल्ट, इंटरव्यू, कोर्ट केस में निकल जाते। और अक्सर पेपर आउट हो जाते,भर्ती टल जाती। इसबीच बेरोजगार उम्र दराज भी हो जाता। ऐसे समय में एक अर्ध सरकारी संस्थान को दो पोस्ट भरने की अनुमति इसी अलिखित शर्त पर मिली थी कि इन पोस्टों में से एक पर मंत्रीजी का उम्रदराज होने की देहलीज पर खड़ा व्यक्ति रखा जाएगा और दूसरी पर मैनेजमेंट का वैसा ही व्यक्ति। सेटिंग हो जाने के बाद जल्दी में रोस्टर क्लियर करवाया गया। विभागीय अनुमति दिलवाई गई। विज्ञापन दिए गए। आवेदन मंगाए गए। पारदर्शिता दिखाने और ईमानदारी जतलाने के सारे प्रयास किए गए। सब में जल्दी इतनी कि- ‘अभी नहीं मरे तो स्वर्ग नहीं मिलेगा!’ जल्दी में, उत्साह में नियम को देखने परखने का समय भी नहीं मिला। अच्छा दिखाने के चक्कर में आवेदन जांचने की कमेटी में गलत लोगों को रख लिया। वे लोग नियमों की जानकारी रखने वाले और उसके तहत काम करने वाले थे। नियम था कि आवेदक की उम्र, विज्ञापन के 90 दिवस के बाद जो हो उसे माना जाए। दोनों उम्मीदवारों इस आधार पर उम्र दराज सिद्ध हो रहे थे। कमेटी ने दोनों उम्मीदवारों का आवेदन निरस्त करने का सुझाव दिया। लगता था कि ऊपर वालों का सारा खेल चौपट। मगर नेताओं, अफसरों का खेल कभी चौपट हुआ हैं? ‘ना खाता हूं, ना खाने देता हूं’ वाले जुमले को सीढ़ी बनाकर प्रगति करने वाले के सहयोगी मंत्री ने इंटरव्यू में अपने आदमी भेजे। पेपर सेट भी हुआ। लीक भी हुआ। यूं तो मैनेजमेंट कई बार तनखा भी मैनेज नहीं कर पाता था मगर यहां सब मैनेज कर लिया। गोटियां बैठ गई थी। आंखों पर पट्टी बांधवाकर, पैसों के खेल से, जैसा तय था वे दोनों उम्मीदवार चयनित कर लिए गए।”
इस कहानी को सुनाने के बाद पीठ पर लदे बैताल ने राजा विक्रमादित्य से प्रश्न किया- “ईमानदारी का दिखावा, ढोंग करने वाले लोग ऐसी बेईमानी कर लेते है फिर भी लोगों उन्हें ईमानदार ही क्यों समझते हैं? इस सवाल का जवाब जानते हुए नहीं दोगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे राजन।”
राजा ने मौन भंग कर उत्तर दिया- “यह कलयुग हैं। अब हाथी के ही नहीं, नेताओं-अफसरों के खाने के दांत और दिखाने का चेहरा अलग होता हैं।”
उत्तर सुनकर बैताल लाश को लेकर पेड़ पर लटक गया।

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