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सावधान !अब रोटी के निवाले भी संकट में

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सुसंस्कृति परिहार

आंदोलनरत किसानों की कड़ी मेहनत के बावजूद गेहूं का जो बम्फर स्टाक हुआ था वह भारत सरकार की अदूरदर्शिता की वजह से उन देशों को भेजा गया जो युद्धरत  यूक्रेन और रूस से आयात करने वाले प्रभावित देश थे। ऊंचे दामों की ललक और प्रशंसा की चाहत ने देश के गरीबों की रोटी छीनने की पूरी व्यवस्था कर दी है।एफ सी आई गोदामों में जमा स्टाक भी लगभग ख़त्म कर दिया गया है जो वक्त पड़ने पर ग़रीबों के काम आ जाता था। प्राकृतिक आपदा में भी यह अनाज काम आता था।आज वे किसान भी मंहगा अनाज खरीदने मज़बूरी है जिनके पास पर्याप्त भंडारण की सुविधा नहीं है।उधर मोदी सरकार की बदौलत लगभग 80करोड़ लोग जो शासन के आंकड़ों के अनुसार लगभग मुफ्त राशन पा रहे थे उन्हें अब गेहूं नहीं चावल दिया जाने लगा। गोदामों के खाली होने से राशन व्यवस्था भी ध्वस्त हो सकती है।इस लोकलुभावन चुनावी ऐलान ने भी गेहूं गोदामों को खाली किया।जबकि प्रारंभ यह व्य्वस्था सिर्फ कोरोनावायरस से प्रभावित परिवारों के लिए आंशिक तौर पर की गई थी।आपदा का फायदा उठाकर इसे चुनाव तक जबरिया किया गया।यह भी सरकार की चूक ही कहीं जायेगी। 

 विदित हो मार्च में गेहूं का जो निर्यात हुआ वह लगभग 70लाख टन था। अप्रेल में 14लाख टन और निर्यात किया गया।यह पिछले वर्षों की तुलना में 215% से ज्यादा है।मई में जब सरकार को होश आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी।अब कहा ये जा रहा है कि भारत से गेहूं,मैदा,सूजी ,आटे जैसे समस्त उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है।ज्ञातव्य हो पहले मई 22 में गेहूं की भारी कमी के  कारण इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया और 27अगस्त से मैदा,सूजी और आटे पर प्रतिबंध की नौबत आ गई।सर्वनाश के बाद ये प्रतिबंध कोई मायने नहीं रखता है। सरकार गेहूं आयात की भी योजना बना रही है।इसे ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना कहा जाता है।

सरकार अपनी इस बड़ी गलती से मिली फजीहत को छुपाने के लिए गेहूं की कमी की वजह मार्च में तेज गर्मी होना बता रही है उसका कहना है कि तेज गर्मी से दाना कमजोर रहा और जल्दी सूख गया। जिससे उत्पादन घट गया।जबकि सरकारी अनुमान 111 मीट्रिक टन का‌ था जबकि गेहूं का उत्पादन हुआ 105 मीट्रिक टन। कुल 6 मीट्रिक टन की कमी ।

वर्तमान स्थिति भारत सरकार के पास जो अल्प स्टाक है वह आज़ाद भारत में पहली बार  इतना कम है।ऐसी अदूरदर्शी सरकार की बदौलत आज रोटी का निवाला भी मुश्किल हो रहा है।जो गेहूं पिछले साल 20से 25₹ किलो मिला वह अभी 30 से 35₹ मिल रहा है।अभी गेहूं की आगत फसल बाजार में आने लगभग सात महीने बाकी है।तब तक यह दाम बढ़ा ही है। इंतज़ार करिए जन्हीं किसानों की मेहनत से उत्पन्न अनाज का।ये वही किसान हैं जिन पर हमारी नज़रें टिकी है जिन्होंने अडानी की गोदामों में अनाज भरने से रोकने और उचित गेहूं खरीदी के लिए अपने 700किसान साथी खोकर भी अनाज उगाया।पूरे 370 दिन ठंड ,गर्मी और बरसात के बीच गुजारे। सरकार ने किसानों को परेशान करने की नीयत से इस साल कम अनाज भी खरीदा। लेकिन दूसरे रास्ते आए अनाज को विदेशों में भेजकर मुनाफा कमाया और आपको रोटी के लिए मोहताज कर दिया। किसान आज भी अपनी मांगों पर सरकार के झूठे आश्वासन के खिलाफ लड़ रहे हैं।ये हमारा उत्तरदायित्व हो जाता है हम जागें और सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ एक जुट हों। याद आ रहा वह अनाम शायर  जो कह गया है —

खुदा किसी को कभी भूखा ना रखे  और रखे तो वक़्त से दो रोटी भी दे दे।

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