Site icon अग्नि आलोक

कश्मकश भरी भारतीय राजनीति से रहें सतर्क?

Share

     -परमजीत बाबी सलूजा 

 देश की सियासत में भारी उथलपुथल है, सतही तौर पर यह भले न दिखाई देती हो पर अंदरखाने सियासी हवाएं काफी गर्म हैं। देश की आंतरिक राजनीति में पक्ष और विपक्ष दो विपरीत ध्रुव में इस पोजीशन के साथ खड़े हैं कि तालमेल की कोई गुंजाइश नहीं है। वहीं देश की बाह्य राजनीति भी सत्तारूढ़ गठबंधन के अनुकूल नहीं हैं, जिसका खामियाजा अंततः देश ही भोग रहा है। 

मई 2014 से अप्रैल 2024 तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने वाली मोदी भाजपा का असल संकट जून 2024 में आए लोकसभा चुनाव परिणाम हैं, जिसने उसे तीसरी बार सरकार बनाने का जनादेश तो दिया पर बहुमत से दूर कर दिया था और वह गठबन्धन सरकार चलाने को मजबूर हो गई। मोदी जी को इससे पूर्व गठबन्धन सरकार चलाने का कभी अनुभव नहीं था। बतौर मुख्यमंत्री, गुजरात में भी उन्होंने बहुमत की धमक से सरकारें चलाईं तथा केंद्र में भी दोनों बार बड़े बहुमत से सत्ता हांकी। बहुमत के अभाव का प्रभाव सीधे सीधे इस सरकार के पिछले पंद्रह महीनों के कार्यकाल की कार्यप्रणाली पर साफ दिखता है, एनडीए सरकार पूरी तरह से किंकर्तव्यविमूढ़ सी दिखती है। उसके हर राजनैतिक दांव उल्टे पड़ते दिखते हैं। बहस इस बात की है कि इस सरकार की आंतरिक नीतियां अधिक विफल है कि विदेश नीतियां ? इस पर समग्र समझ की आवश्यकता है।

नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार की विदेश नीति आजाद भारत की सबसे  विफल विदेश नीति है, इसे मानने मुझे कोई गुरेज नहीं है। वह राजनयिक तथा कूटनीतिक दोनों स्तरों में अत्यंत नकारा साबित हुई है। 2014 तक देश अपनी स्थापित नीतियों, किसी भी  गुट में शामिल हुए बिना भारत के हितों को सुरक्षित रखते हुए सभी देशों से सम्मानजनक संबंध रखेगा, विश्व शांति हेतु सक्रिय रहेगा पर ही चलता रहा, सरकार चाहे किसी की रही हो,  पर मोदी जी ने उन सारी परम्पराओं को दरकिनार कर मोदी डॉक्ट्रिन पेश की जिसमें देश की बजाए वह केंद्रबिंदु में आ गए, बस यहीं से देश पीछे छूटता गया, उसके व्यापक हितों की हानि शुरू हो गई। सबसे पहले अपने ही दक्षिण एशिया में दक्षेस शिखर मंच को अप्रासंगिक बना हम अपने पड़ोसियों से ही दूर हो गए, हमारी स्वीकार्यता खत्म हो गई। ब्रिक्स संगठन को अपनी अमेरिकी नीति की वजह से हम स्वयं ही कमजोर कर गए। गुट निरपेक्ष संगठन को मजबूती देकर हम फिर से विश्व पटल पर अपनी भूमिका को बढ़ा सकते थे पर अमेरिका के पिछलग्गू बनने की होड़ में मोदी जी ने इस अवसर को भी खो दिया। क्वाड संगठन में रहकर भी हम देश के व्यापक हितों पर काम नहीं करा पाए। G20 संगठन में होने पर भी हम इसका दोहन अपने पक्ष में नहीं करा पाएं। UNO में भी हमारी स्थिति पहले से कमजोर है। इन सब का कारण मोदी जी का आत्मकेंद्रित आचरण है जिसमें उन्होंने स्वयं को ही राष्ट्र मान लिया। इसका खामियाजा भारत अपने पड़ोसियों सहित विश्व के अधिकांश देशों से दूरियों के रूप में भुगत रहा है। आर्थिक महाशक्ति की ओर बढ़ते हमारे कदम ठिठक गए, सामरिक मामलों में हमारी मजबूत धमक कमजोर पड़ चुकी है, बड़े और मजबूत लोकतंत्र की हमारी पहचान फीकी पड़ चुकी है, सर्वधर्म समभाव की हमारी बुनियाद खोखली हो चुकी है, सबसे परिश्रमी युवा राष्ट्र की हमारी ताकत दुनिया में मजदूर सप्लायर देश के रूप में बदल चुकी है, हमारी समृद्ध सामाजिक, सांस्कृतिक परंपरा ने कट्टर और असहिष्णु समाज के रूप में स्थान ले लिया है। किसी भी देश की विदेश नीति स्वयं के राष्ट्रीय हितों और स्थायित्व पर टिकी होती है पर हमारी सरकार का किसी भी अंतरास्ट्रीय मुद्दों पर स्थाई और साफ स्टैंड नहीं रहा है। मोदी जी, अपनी आत्ममुग्धता के लिए देश की विदेश नीति का बंटाधार कर गए यह स्थापित तथ्य बन चुका है। सरकार  सत्ता के मद में भले ही इन तथ्यों को नकार दे पर हमारी विदेश नीति का कटु सत्य यही है, हम चौतरफा विफल हो रहे हैं तथा हमें कमजोर मुल्क के तौर पर देखा जा रहा है।

मोदी सरकार की आंतरिक नीतियां भी कई झंझावतों में उलझी हुई है। किसी भी राष्ट्र के नवनिर्माण में अनेक कारणों का समावेश होता है, सारे मानदंडों पर खरा उतर कर ही मजबूत राष्ट्र की प्रगति संभव है। इस सरकार की कथनी और करनी में ही इतना फर्क है कि लक्ष्य हासिल किया ही नहीं जा सकता। सरकार के कथनी में यह बात है कि सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास पर करनी में इसका कोई मोल नहीं है। सरकार की अबतक की किसी भी नीतियों पर नजर डाल लीजिए वह सर्वसम्मति से नहीं लाई गईं, बल्कि थोपी गई हैं। नई भूमि अधिग्रहण नीति, नई पेंशन योजना, नोटबंदी, बेतरतीब जीएसटी, नई शिक्षा निति, लॉकडाउन, नया मोटर व्हीकल कानून, सीएए एनआरसी, लेटरल एंट्री, तीन कृषि कानून, आदि किस पर इस सरकार ने सर्वानुमति बनाने की कोशिश की ? सभी को जनता पर थोपा गया इस वजह से कुछ को वापस लेना पड़ा, कुछ में संशोधन करना पड़ा और कुछ को थोप ही दिया गया। सत्ता की धमक तथा भावनात्मक दोहन से आप अपनी बात भले मनवा लें पर यह देश की भावना के अनुरूप नहीं होने की वजह से इसमें असंतोष की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है और कब वह चिंगारी का रूप ले ले, कहा नहीं जा सकता है। सामान्य बहुमत से दूर होने पर इसकी आशंका अधिक होती है। देश के असल बुनियादी मुद्दों बेरोज़गारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद, सामाजिक, धार्मिक भेदभाव, आम जनता से शिक्षा की दूरी, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव पर सरकार चुप्पी साध लेती है तथा झूठे आंकड़ों से भरमाने लगती है। इन ज्वलंत मुद्दों को वह पिछले ग्यारह वर्षों से भावनात्मक मुद्दों से भटकाती आ रही है कि भारत आर्थिक महाशक्ति बन गया है, विश्वगुरु बन गया, मोदी जी ने सारी दुनिया में धूम मचा दी है, हिंदुओं को सारी दुनिया गर्व से देख रही है, पाकिस्तान जैसे विरोधी देश थर थर कांपते हैं। हमारे पासपोर्ट की ताकत बढ़ गई है। 

सरकार में दूरदृष्टि का अभाव आनेवाले समय में उसे बहुत भारी पड़ेगा यह निश्चित है। भावनात्मक दोहन की एक निश्चित मियाद होती है, जिस पर देश को भरमाया जा सकता है पर निद्रा से जागने पर जनता असल मुद्दों पर ही वापस आती है, यह जागरण का समय देश में भी आ चुका है, मोदी सरकार को अपने पड़ोसी देशों तथा दुनिया पर नजर डालने की जरूरत है कि वहां असल मुद्दों से भटकाने के क्या परिणाम सामने आ रहे हैं ? वहां से समय रहते सबक लेकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। अपनी कार्यप्रणाली में एकला चलो, अहंकार, आत्ममुग्धता, विपक्ष को कुचलने की फितरत, जनता पर निर्णयों को थोपने का शगल को त्यागने का यही उचित समय है। 

मेरी राजनीतिक, सामाजिक समझ कहती है कि मोदी सरकार की कार्यप्रणाली में देश की आंतरिक तथा बाह्य नीतियों में कोई सकारत्मक बदलाव देखने को नहीं मिलेगा। उसका सबसे बड़ा कारण है कि यह सरकार असल समस्याओं को चिन्हित ही नहीं करती उसके निवारण की बात तो दूर। फिर एक तो इस सरकार में अहंकार का पुट काफी है दूसरा, अभी भी एक बड़ा वर्ग इसके हर गलत फैसले के साथ मजबूती से खड़ा है जो इस सरकार में आत्ममुग्धता को जारी रखने का ठोस कारण रहेगा तीसरा, सारी संस्थाओं पर मजबूत पकड़ उसे अपना ट्रैक बदलने से रोके रखेगा चौथा, अपनी खरीदी हुई बेगैरत मीडिया की झूठी वाहवाही में उसे असल मुद्दों पर ध्यान के लिए समय ही नहीं मिलेगा पांचवां, संघ या भाजपा से मोदी, शाह से कोई असल मुद्दों पर बात करने वाला सामने नहीं आएगा। इन वजहों से मुझे सरकार की कार्यप्रणाली में आमूलचूल बदलाव की संभावना नहीं दिखती है। मेरा मानना है कि मोदी अपनी समझ से ही आगे भी ऐसे ही चलेंगे। यह तो सत्य है कि मोदी जी, शाह के भरोसे लीक से कुछ हटकर करने की कार्ययोजना पर गंभीरता से काम कर रहे हैं क्योंकि आज की तारीख में उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं है तथा विपक्ष भी बेहद मजबूत और आक्रामक है, इसके अलावा उन्हें संघ के भीतर से भी कठिन चुनौती मिल रही है, पार्टी के भीतर के अपने विरोधियों से भी दो चार होना पड़ रहा है। मोदी, शाह के तीन मजबूत स्तंभ चुनाव आयोग की गिरती साख, केंद्रीय जांच एजेंसियों का कम होता इकबाल और गोदी मीडिया की खत्म होती विश्वसनीयता भी उनके लिए सिरदर्द से कम नहीं है। ऐसे में इन दोनों से काफी बड़े की उम्मीद मुझे दिखाई दे रही है। यकीनन वो मुख्य समस्याओं के समाधान से हटकर, विशुद्ध रूप से अपनी राजनैतिक, प्रशासनिक पकड़ को मजबूत करने वाले कदम होंगे।

इस दिशा में उनका पहला कदम होगा देश में नया परिसीमन जल्द से जल्द कराकर संसद में अपने मुफीद हिंदी पट्टी में सीटें बढ़ाई जाएं क्योंकि  दक्षिण भारत में उन्हें अपना बड़ा विस्तार नहीं दिख रहा, पूर्वोत्तर में इससे ज्यादा बढ़त नहीं बनाई जा सकती है।  प्रख्यात किसान नेता, समाजसेवी श्री पुष्पेंद्र चौधरी जी का मत है कि मोदी सरकार उत्तरप्रदेश को तीन भागों में विभाजित कर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कमजोर करने की बिसात बिछा रही है। सभी को पता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता 80 सीटों वाले उत्तरप्रदेश से होकर ही जाता है ऐसे में उसे प्रशासनिक रूप से तीन भागों यथा पश्चिमी उत्तमप्रदेश, अवध प्रदेश तथा पूर्वांचल प्रदेश, में विभाजित कर योगी को राजनैतिक रूप से कमजोर किया जा सकता है। वह पूर्वांचल के ही मुख्यमंत्री रह जाएंगे। अवध प्रदेश में  किसी ब्राह्मण को तथा पश्चिमी प्रदेश में किसी जाट को कमान देकर भाजपा से नाराज़ चल रहे ब्राह्मण समाज और जाट समाज को आसानी से साधा जा सकता है। इससे पीडीए की राजनीति के  जरिए आगे बढ़ रहे अखिलेश यादव को भी लक्षित कर रोका जा सकता है, इस तथ्य में दम है और यह मूर्त रूप ले सकता है क्योंकि यूपी का बंटवारा बहुत बड़ी घटना बन जाएगी।  दूसरा, जिस तरह से एस.सी. वर्ग के आरक्षण में मुस्लिम समाज के लोगों का हक नहीं है पर एस.टी. वर्ग तथा ओबीसी वर्ग में है, मोदी,शाह चाहते हैं कि इन दोनों वर्गों में से भी मुस्लिम आरक्षण को हटाया जाए, इनका तर्क है कि मुस्लिमों, ईसाईयों में जातिभेद नहीं हैं, इससे हिन्दू ओबीसी वर्ग को आसानी से मुस्लिमों के खिलाफ बरगलाया जा सकता है कि मुस्लिमों को इससे बाहर करने से आपको लाभ मिलेगा। यह ओबीसी वर्ग तथा मुस्लिमों में गहरे तक तनाव बढ़ाने वाली चाल है, इससे देश में नई लामबंदी देखने को मिलेगी। उधर संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने संकेत दे दिया है कि काशी और मथुरा के मुद्दे पर संघ प्रत्यक्ष भले शामिल नहीं होगा पर उसके लोग आगे बढ़ सकते हैं इससे भी देश में सांप्रदायिक तनाव नए रूप में सामने आएगा। समान नागरिक संहिता संघ और मोदी जी की बहुत पुरानी मांग है जिस पर अब मोदी सरकार तेजी से आगे बढ़ेगी। लब्बोलुआब यह है कि मोदी जी देश के ज्वलंत मुद्दों को दरकिनार कर अपने राजनैतिक लाभ वाले कदमों से देश को साधने का खेल जारी रखेंगे, पर शायद वक्त बदल रहा है इसका इल्म मोदी सत्ता को नहीं है। देश का युवा लंबे अरसे तक बरगलाया नहीं जा सकता है उसकी बेहतर भविष्य की आस हर बीतते दिन, टूटती जा रही है, देश ही नहीं विदेशों में भी उसके सपने टूट रहे हैं।  इस युवावर्ग की सामूहिक पहचान Gen Z के रूप में है अर्थात जो पीढ़ी 1997 से 2012 के दरमियान पैदा हुई है। सारे आधुनिक संचार माध्यम इनकी जद में है, सारी दुनिया की खबरें इनकी पहुंच में हैं, पड़ोसी देशों से लेकर एशिया, यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तक की घटनाओं से वह वाकिफ है इसलिए  सरकार इनकी समस्याओं पर शुतुरमुर्ग की तरह आचरण न करे बल्कि समय रहते इनसे संवाद कर स्थिति को भयावह बनाने से पहले ही रोक ले। किसानों की जायज मांगे मान ले, चुनावी घपलों को स्वीकार कर चुनाव आयोग को पारदर्शी बनाने की पहल शुरू कर ले, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं को आम जनता के जद में लाने का प्रयास शुरू कर ले, महिलाओं के सम्मान, उन पर यौन अपराध पर सख्त हो जाए, दलित शोषित वर्ग को बराबरी के साथ त्वरित न्याय सुनिश्चित करे, यही असली मुद्दे हैं जिनसे देश दो चार हो रहा है, इन्हीं मुद्दों से ध्यान भटकाकर मोदी सरकार ने देश के साढ़े 11 साल बर्बाद कर दिए हैं अब भी वहीं रवैया रहा तो उनकी बर्बादी तय है। देश अब और झेलने के मूड में नहीं है, वह सरकार की जवाबदेही चाहता है, वह मोदी जी के मन की बात नहीं सुनना चाहता बल्कि अपने दिल की बात सुनाना चाहता है। यह सरकार राहुल गांधी की कितनी ही निंदा करे, चरित्र हनन करे पर उस बंदे में इस देश के प्रति, आम जनता के प्रति खासकर युवाओं के प्रति गजब की समझ है, तमाम विपरीत धाराओं में बहते हुए भी उसने इस देश के लिए सत्य को खोज लिया उस पर चल रहा है, इस सरकार के पास तो सारे संसाधन हैं फिर वह क्यों असफल है ? इसका सिर्फ एक कारण है कि जहां राहुल गांधी नेक नियति से अपने दुरूह राह पर चल उसे सुगम बना रहे हैं वहीं मोदी, शाह बदनीयती से अपने कदम उठाते हैं जिससे नाकामियां ही उनके पल्ले आती हैं, इस दिशा में राहुल जी से सीख लीजिए, सुधार आएगा। इतिहास बेहद निर्मम होता है, वह सभी का समभाव से हिसाब करता है। आपका बोया, आपका कहा ही सामने आएगा, सनद रहे।

Exit mobile version