अग्नि आलोक

धर्म हो या जाति, उनके जरिये इतिहास दोहराने की कोशिश पहले की तरह शायद ही सफल हो

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मृत्युंजय कुमार राय

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और खेल मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने हाल ही में सनातन धर्म की तुलना डेंगी, मच्छर, मलेरिया, और कोविड से की। उसके बाद उनकी पार्टी DMK के सांसद ए राजा ने कहा कि हिंदू धर्म ‘न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए अभिशाप है।’ इन DMK नेताओं के बयानों से जब विवाद हुआ तो उन्होंने सफाई तो दी, लेकिन अपनी बात पर अड़े रहे। उदयनिधि ने कहा कि उन्होंने सनातन धर्म की बुराइयों को खत्म करने की बात कही है, न कि इसे मानने वालों को। उन्होंने इस सिलसिले में छुआछूत और जातिवाद का जिक्र किया। वहीं, राजा ने कहा कि उन्होंने तो डॉ. भीमराव आंबेडकर की कही बातें ही दोहराई हैं, इसलिए इस पर हो-हल्ले की जरूरत नहीं है।

उदयनिधि स्टालिन

क्या है द्रविड़ पहचान

इन बातों की जड़ें तमिलनाडु की राजनीति से जुड़ी हैं, जहां पेरियार की सामाजिक न्याय की लड़ाई का असर कई दशकों से रहा है और आगे भी बना रहेगा। लेकिन राजनीति और धर्म के रिश्ते पर बात करने से पहले यह समझना भी जरूरी है कि सनातन धर्म और द्रविड़ पहचान का अर्थ क्या है। जिस तरह से राजनेता इसे लेकर विवाद खड़े कर रहे हैं, क्या वाकई उसका कोई आधार है?

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस पहचान से पहले इन लोगों की धार्मिक मान्यताएं नहीं थीं। द्रविड़ लोगों का धर्म क्या था और उनकी पूजा पद्धति क्या थी, इसका जवाब आगम साहित्य से मिलता है। कुछ जानकार मानते हैं कि इसकी रचना वेदों के लिखे जाने से पहले की है तो कुछ का दावा है कि इसे वेदों के बाद लिखा गया है।

वैसे, द्रविड़ लोगों की धार्मिक परंपराओं को लेकर जानकारों में मतभेद भी हैं।

इस मामले में भले ही विद्वानों की राय अलग-अलग हो, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आर्य भाषा बोलने वालों के धर्म और द्रविड़ लोगों की धार्मिक परंपराओं के बीच व्यापक मेल हुआ। इस पर आदिवासी धर्मों का भी प्रभाव पड़ा। इन सबके मिलने से ही हिंदू धर्म का आधुनिक स्वरूप उभरा, जिसे आज लोग मानते हैं। गौर करने की बात यह भी है कि तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ गांवों में जिस तरह से आज भी देवियों की पूजा की जाती है, वह द्रविड़ धर्म की पुरानी परंपराओं का ही अटूट सिलसिला है। शक्ति की उपासना इस धर्म की खास बात है, जिसने हिंदू धर्म को गहरे प्रभावित किया। आज द्रविड़ भाषी समाज में भी किसी द्रविड़ धर्म की अवधारणा नहीं है। वहां के बहुसंख्यक समुदाय के लिए भी हिंदू धर्म की कमोबेश वही मान्यताएं हैं, जो उत्तर भारतीय बहुसंख्यकों के लिए। अगर कोई फर्क दिखाने की कोशिश होती है तो उसके पीछे राजनीति और धर्म का वह घालमेल है, जिसने सनातन धर्म को लेकर हालिया विवाद को जन्म दिया है।

धर्म की राजनीति

असल में लोकतांत्रिक समाज में राजनीतिक दलों को हमेशा ऐसे भावनात्मक मुद्दों की तलाश रहती है, जिससे बड़े पैमाने पर वोटरों को प्रभावित किया जा सके। धार्मिक मुद्दे इस पैमाने पर बिल्कुल ठीक बैठते हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि धार्मिक मुद्दों का हमेशा राजनीतिक फायदा हो ही। हां, अयोध्या का मामला ऐसा जरूर रहा है, जिसका बीजेपी को बड़ा राजनीतिक फायदा मिला। ऐसे ही मुद्दे की तलाश में जातीय समूहों की राजनीति भी हुई, जिसका कुछ राजनीतिक दलों को लाभ हुआ। आज भी जातीय आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन हो रहे हैं, साथ ही जातीय जनगणना के जरिये मंडल वाले दौर की तरह राजनीतिक कामयाबी को दोहराने की कोशिश भी हो रही है। लेकिन धर्म हो या जाति, उनके जरिये इतिहास दोहराने की कोशिश पहले की तरह शायद ही सफल हो।

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