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बेलाग मन्टो : बेखौफ मन्टो

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“मैं उस सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा जो पहले से ही नंगी है। उसे कपड़े पहनाना मेरा काम नहीं है, ये काम दर्जी का है।”

कोठे की तवायफ़ और एक बिका हुआ पत्रकार एक ही श्रेणी में आते हैं।

लेकिन इनमें तवायफ़ की इज़्ज़त ज़्यादा होती है।

अगर तवायफ़ का मतलब ‘पैसा लेकर इज्जत का सौदा करना’ है तो पूरा मुल्क एक रंडी का कोठा है। माज़रत… मैं कलम को कंडोम पहनाने का क़ायल नहीं।

"... दुनिया में सबसे ज़्यादा सच शराबख़ानों में शराब पीकर बोला जाता है और सबसे ज़्यादा झूठ अदालतों में पवित्र ग्रंथ पर हाथ रखकर बोला जाता है !"

दुनिया में जितनी लानतें हैं भूख उनकी माँ है।

ये ऐब मुझमें शुरु से रहा है कि मुझे झूठ बोलने का सलीक़ा नहीं।

मत कहिए कि हज़ारों हिंदू मारे गए या फिर हज़ारों मुसलमान मारे गए।

सिर्फ ये कहिए कि हज़ारों इंसान मारे गए।

लोग ये समझ नहीं पाते कि “औरत क्या चीज़ है?” पहले उन्हें ये समझने की ज़रूरत है कि..... "औरत 'चीज़' नहीं होती।"

किसी ने सआदत हसन मंटो से पूछा- “क्या हाल है इस वक़्त आपके देश का ?”

मंटो ने जवाब दिया- “बिल्कुल वैसा ही जैसा जेल में होने वाली जुमे की नमाज़ का होता है।

कोई फ़्राडिया अज़ान देता है, कोई क़ातिल इमामत करता है, और पीछे नमाज़ी सब चोर उचक्के होते हैं।”
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सआदत हसन मंटो का जन्म लुधियाना से 35 किलोमीटर दूर समराला में हुआ था। वे मूलतः काश्मीरी थे। उन्होंने आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र में ड्रामा लेखन किया। बम्बई फिल्मी दुनिया में स्क्रिप्ट लेखक रहे।

बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले जाने के बाद वे अपनी जन्मभूमि को बहुत सिद्दत के साथ याद किया करते थे। वे कहते थे……

‘उस ज़मीन में मेरे बाप दादा दफ्न हैं, मेरी पहली औलाद मेरी बेटी भी उसी मिट्टी में सो रही है, मगर अफसोस अब वो मेरा वतन नहीं है”

मन्टो ने उर्दू में अनेक अफसाने और उपन्यास लिखे। उनकी कहानियों में ‘टोबा टेक सिंह ‘,’ खोल दो’,’काली सलवार,, बू’, ‘आंखें’,’ कब्ज’,’ ठंडा गोश्त’ इत्यादि कुछ प्रसिद्ध रचनाऐं हैं।

सच जीने वाला, सच्चाई को ओढने बिछाने वाला ये तेज तर्रार लेखक कहानीकार शायद गलती से वक्त से पहले पैदा हो गया।

सआदत हसन मंटो की जयंति पर उस महान शख्सियत को हार्दिक नमन् और उनकी चिरकाल स्मृति को सादर सलाम।

रणबीर सिंह रमन

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