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सावधान! ज़ोम्बी पधार रहे हैं

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 पुष्पा गुप्ता

‘    ज़ोम्बी’ किसी ज़माने में सम्मोहन के शिकार ऐसे व्यक्तियों को कहा जाता था, जो चेतना और आत्म-जागरूकता से रहित होते हुए भी किसी दैवीय अथवा तंत्र-मंत्र, जादू-टोने के प्रभाव से जाग्रत और सक्रिय हो जाते थे। उनका मस्तिष्क किसी ऐसे दुष्ट व्यक्ति के कब्ज़े में रहता था, जो उसके माध्यम से अपने स्वार्थ की सिद्धि करता था। 

        उन्नीसवीं सदी की यूरोपीय और अमेरिकी लोककथाओं में ‘ज़ोम्बीज़’ का ज़िक्र बार-बार आता है। वर्ष 1968 में बनी जॉर्ज ए. रोमेरो की अंग्रेज़ी फ़िल्म ‘नाइट ऑफ़ द लिविंग डेड’ और उसके बाद ‘द वाकिंग डेड’, ‘नाइट ऑफ़ द क्रीप्स’, ‘सीमैट्री मैन’, ‘आइ वॉक्ड विद अ ज़ोम्बी’, ‘द सर्पेन्ट एंड द रेनबो’, ‘नाइट ऑफ़ द कॉमेट’, ‘द बियॉन्ड’, ‘ट्रेन टू बूसान’, ‘रेक’, ‘ज़ोम्बी’, ‘शॉन ऑफ़ द डेड’, ‘डेड अलाइव’, ‘ट्वेन्टी ऐट डेज़ लेटर’, ‘पॉन्टीपूल’, ”रिटर्न ऑफ़ द लिविंग डेड’ जैसी दर्जनों फ़िल्में ‘ज़ोम्बी’ की अवधारणा पर आधारित रही हैं।

        जनश्रुतियों, साहित्य और फ़िल्मों ने ‘ज़ोम्बी’ को भयंकरता और नृशंसता के एक वैश्विक रूपक में ढाल दिया है। वह हिंसा, अत्याचार और वीभत्सता का प्रतिनिधि चरित्र बन गया है। ‘ज़ोम्बीज़’ के बारे में जो बात सबसे भयावह है, वह यह कि उसे मारा नहीं जा सकता, क्योंकि वह पहले ही मर चुका और जो सामने है, वह महज एक चलती-फिरती लाश है। ‘ज़ोम्बीज़’ को कैसे समाप्त किया जाये, यह सभ्यता का एक कठिनतम प्रश्न बना हुआ है।

वियतनाम युद्ध के दौर में ‘ज़ोम्बी’ का आतंक चरम तक पहुंच चुका था। सैन्य-उत्पीड़न के शिकार लोगों को यह महसूस होने लगा था कि सरकार किसी ‘ज़ोम्बी’ की तरह उनका भक्षण कर लेना चाहती है। शीत युद्ध के दौरान परमाणु बमों से महाविनाश के भय ने भी ‘ज़ोम्बी’ के अर्थ को व्यापकता और सघनता दी।

        रोमेरो की ‘लिविंग डेड’ शृंखला की छह फ़िल्मों ने ‘ज़ोम्बी’ की धारणा को रूपायित करते हुए उसे ब्रैम स्टोकर के ड्रैकुला के प्रेतों जैसी भयावहता दे दी। ये ‘ज़ोम्बीज़’ सुस्त, मूढ़, बेचैन और मस्तिष्क के भक्षण के लिये निरन्तर आतुर थे। 

       रोमेरो की फ़िल्मों में ‘ज़ोम्बीज़’ को सिर में गोली मार कर शान्त किया जा सकता था, किन्तु यह आसान नहींं था, क्योंकि उनकी तादाद बहुत तेज़ी से बढ़ती थी। ‘ज़ोम्बीज़’ का शिकार हुए लोग उस जैसी आक्रामकता के साथ ही आगे बढ़ आते थे। अपने समकक्ष ड्रैकुला के रक्तपिपासु और ख़ूंख़्वार प्रेतों जैसी बुद्धिमत्ता से रहित ये ‘ज़ोम्बीज़’ अपने विकास का आत्म-नियंत्रण करने में सक्षम नहीं थे।

‘ज़ोम्बीज़’ के अन्धाधुन्ध संहार के पीछे दुनिया के अन्त और मानव सभ्यता के विलुप्त होने से बचने का तर्क रहा है। जोनाथन माबरी, जिन्हें ‘ज़ोम्बीज़’ पर कई पुस्तकें लिखने के कारण विभिन्न उत्कृष्ट पुरस्कार और सम्मान मिले हैं, ने कहा है- “ज़ोम्बी कथाओं और फ़िल्मों में जो कुछ भी अच्छा है, वह ज़ोम्बीज़ के बारे में नहीं है। ये लोगों और उनकी प्रतिक्रियाओं की कथाएं हैं। ज़ोम्बी का सम्बंध उन सभी डरावनी चीज़ों से, जो तेज़ी से फैल जाती हैं, और जिनसे हम बेतरह डरते हैं, जैसे- महामारी, नस्लवाद, सामाजिक परिवर्तन या मानवता का अध:पतन आदि और इन ख़तरों के लोगों पर पड़ने वाले प्रभावों से है। यही इस स्वांग का मर्म है। यह एक ऐसा कोरा कैनवास है, जिसे भरना मुमकिन नहीं है।”

        रोमेरो की क्लासिक फ़िल्म ‘नाइट ऑफ़ द लिविंग डेड’ में हमने देखा है कि ‘ज़ोम्बीज़’ मर चुके हैं, उनकी लाशें सड़ चुकी हैं। पर वे बड़े भारी सख़्तजान हैं, असम्भव हठी हैं। ये मृतक फिर से जीवित हो उठे हैं। वे भयावह शोर करते, दिशाओं को रौंदते चले आ रहे हैं। ‘ज़ोम्बीज़’ ने पिछले कुछ वर्षों में हमारे लौकिक जगत और हमारी कल्पनाओं के बहुत बड़े इलाक़े पर अपना कब्ज़ा जमा लिया है। वे आत्मा तक भूखे हैं। भूख ही उनका वज़ूद है और वह अन्तहीन है। वे अपने आप पैदा नहीं हो सकते किसी प्रचलित तरीक़े से। 

       रोमेरो के ‘ज़ोम्बीज़’ आज बेहद शक्तिशाली हो चुके हैं। एक वायरस की तरह उनके संसर्ग और संक्रमण से उनकी तादाद बढ़ती चली जा रही है। ये ज़िन्दा मांस खाते हैं। इनका दंश बहुत घातक है। वे हतभाग्य लोग, जो ‘ज़ोम्बीज़’ द्वारा पूरी तरह खा लिये जाने से बच जाते हैं, वे मौत के बाद एक परिवर्तित रूप में वापस लौट आते हैं- घिसटते हुए, एक-दूसरे का मांस नोंचते हुए किसी नये शिकार की तलाश में। वे आ रहे हैं…. ज़ोम्बीज़…!

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