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‘भग’ (योनि) से भगवती और भग से ही भगवान

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डॉ. गीता

     _तमाम भाषाओं की जननी संस्कृत में योनि को भग कहा गया है. भग' शब्द भारतीय शब्द संपदा का सर्वाधिक श्लिष्ट, व्याख्या सापेक्ष और सिद्ध - सिद्धांत एवं मतांतर समुत्पादक  शब्द है.  यह शब्द 'भज' धातु में घ प्रत्यय के संयोग से बना है। भज्यते इति  भज सेवायाम। अथवा भज्यते अनेनास्मिन वेति, एतदाश्रित्यैव कंदर्प सेवते इति भावः।_
       भग के अनेक अर्थों में कुछ उल्लेखनीय है :  द्वादशादित्य में एक, चंद्र, शिव, भाग्य, सौभाग्य, सुखद, नियति प्रसन्नता, समृद्धि, कीर्ति, लावण्य, सौंदर्य, उत्कर्ष, श्रेष्ठता, प्रेम, स्नेह, प्रेममय केलि, आमोद, स्त्रीयोनि सद्गुण, नैतिकता धर्मभावना, प्रयत्न, चेष्टा, मोक्ष सामर्थ्य, सर्वशक्तिमत्ता आदि।

शिव और कृष्ण नामक चरित्र चेतना मिशन के प्रेरक हैं. दोनों ने अपने को भगवान कहा है। तंत्र शास्त्र तथा अन्यत्र पुराण ग्रंथों में जहाँ-जहाँ भी शिव ने शिवा को संबोधित किया है, वहाँ भगवती शब्द संबोधन ही अधिकतर है। भग को ही भजनीय और सेवनीय माना गया है।
कालांतर में भग शब्द अपने अन्य सभी अर्थों का परित्याग कर स्त्री योनि अर्थ मात्र तक प्रायः सीमित हो गया। यहाँ इस भग शब्द के पर्याय में अनेक शब्दों का संग्रह हुआ। भग(योन्यर्थक) के पर्याय शब्दों में प्रमुख हैं – योनि, उपस्थ, स्मर मंदिर, रति गृह, प्रकृति, स्मरकूप संसार मार्ग, स्मर ध्वज, कलत्र आदि ।
भग योनि के अर्थ में सृष्टि संरचना तथा सातत्य – संरक्षण का मूलाधार है। पुरुष इसी स्त्री भग में पति रुप में प्रवेश करता है और अपने संस्थापित वीर्य से पुत्र रूप में निर्गत होता है। मनु स्मृति मे इस जीवन – दर्शन और सर्जना प्रक्रिया को और स्पष्टता से उपस्थित किया है।
नारी के साथ पुरुष के दो ही संबंध हो सकते हैं – पति तथा पुत्र का संबंध। इसी दर्शन के आधार पर डी. एच. लारेंस ने अपना प्रसिद्ध उपन्यास संस एंड लवर्स लिखा। अल्डस हक्सले ने लारेंस के साहित्य दर्शन की व्याख्या में उनके मन को सूचित करते हुए लिखा, ‘शी इज द डोर फार अवर इन गोइंग एंड आउट कमिंग। इसकी भी व्याख्या की गई और कहा गया – वी इन गो एज ए लवर (आर हसबैंड) एंड आउट कम एज ए सन।

भारतीय दर्शन में जिस अर्ध नारीश्वरता तथा दाम्पत्य दर्शन का तत्व विश्लेषण है वहाँ इसे पूज्य, अनिवार्य तथा परमात्म प्रतिष्ठित कहा गया है। श्री यंत्र पूजन यही सृष्टि संरचना प्रक्रिया पूजन है।
 शिवतंत्र शास्त्र के अन्तर्गत योनि तंत्र, रजस्वला तंत्र, जैसे तंत्र ग्रंथों की महनीय और रहस्यात्मक महिमा है। पुष्पीपूजन, लतासाधना, स्मर मंदिर उपासना की परंपरा का निर्धारित एवं निर्भ्रांत इतिहास है।
  _कालिदास जब कहते हैं, 'प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता' तो इस कथन में शैवागम एवं शाक्तागम का समीकृत तत्वदर्शन उपस्थित हो जाता है। प्रिय में (के प्रति) सौभाग्य फला हो पाना ही चारुता (सौंदर्य) है। प्रिय अर्थात शिव। शिव अर्थात शिव-शक्ति या शैवागम। सौभाग्य फला अर्थात शक्ति (पार्वती)। शक्ति (पार्वती) अर्थात शाक्तागम। चारुता अर्थात अर्धनारीश्वरता। यही सामरस्य भाव या आनंद तत्व है। यह समरसता शिव - शिवा - मिलन का उत्तर-परिणाम है।_
       सौभाग्य फला शक्ति सम्मत या स्त्रियोचित धर्म है। भग यहाँ योन्यर्थक है। 'सु-भग' सुंदर, भजनीय, भोग्य और उपासनीय उपस्थ है, जिसके समीप (उप) स्थित (स्थ) होना जीवन धर्म और जिजीविषा (लिबिडो) है।
सुभग से सौभाग्य शब्द बनता है। कहा भी गया है - भगो भाग्यं, सुभगः सौभाग्यं।  सुभग से ष्यज-प्रत्ययांत सौभाग्य शब्द तभी सार्थक होता है, जब वह फलवान बने।
       _स्त्री का फलवती होना पुत्र-पुत्रीवती या अपत्यवती होना है। बिना प्रजनन कर्म के स्त्री अनुर्वरा तथा तत्परिणामतः निष्फला है। समग्र यौनतुष्टि के अभाव में मोक्ष असंभव है। भागवत का कथन है - अतृप्ततस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च।_
  {चेतना विकास मिशन)
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