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भारत जोड़ो यात्रा सत्ता में बने रहने की मुहिम की अगली कड़ी

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,मुनेश त्यागी 

      भारत जोड़ो यात्रा कांग्रेस की अपनी नीतियों के हिसाब से आयोजित की गई है। यह यात्रा उन्हीं क्षेत्रों से गुजर रही है जहां से कांग्रेस को ज्यादा मत मिले थे। कांग्रेस को केरल में 20 में से 19 संसदीय सीटों पर कामयाबी मिली थी। यही हाल कर्नाटक और महाराष्ट्र का है। यहां भी यह यात्रा उन्हीं क्षेत्रों से होकर गुजरेगी जहां पर कांग्रेस को ज्यादा मत मिले थे। यह यात्रा इन्हीं मतों को जोड़े रखने का एक उपक्रम है।

     केरल में यह यात्रा 18 दिन जारी रहेगी। ऐसे ही कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी यह यात्रा 3 से 4 दिन जारी रहेगी। तेलंगाना में भी यह यात्रा 3 से 4 दिन तक गुजरेगी। यह यात्रा गुजरात में 2 दिन, उत्तर प्रदेश में 2 दिन गुजरेगी। मध्य प्रदेश, ओडिसा, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, पश्चिमी बंगाल और उत्तरी पूर्वी भारत में यह यात्रा नहीं के बराबर मौजूद होगी।

     कांग्रेसी एक राजनीतिक पार्टी है। उसकी अपनी राजनीति है। वह यह यात्रा भी अपने हिसाब और राजनीति से निकाल रही है। केरल कर्नाटक और महाराष्ट्र में कांग्रेस अपने वोट बैंक को बरकरार रखना चाहती है, यही उसकी यात्रा का मुख्य मकसद है।

   केरल भारत का शिक्षा, स्वास्थ्य और आय के मामलों में एक अग्रणी राज्य है। वहां पर किसानों को सभी फलों का मिनिमम सपोर्ट प्राइस दिया जाता है। वहां पर सांप्रदायिक दंगे भी ना के बराबर होते हैं। वहां का इतिहास और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का इतिहास नहीं है, तो फिर वहां इस यात्रा का 18 दिनों तक जारी रहने का  कोई औचित्य समझ में नहीं आ रहा है।

     जिन राज्यों में जैसे गुजरात, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और पूर्वी भारत के अनेक राज्यों में, जहां आए दिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की मुहिम जारी है, कानून और व्यवस्था का माहौल काफी खराब है, जहां पर महिलाओं और दलितों के खिलाफ आए दिन अपराध होते रहते हैं, वहां पर इस यात्रा की सबसे ज्यादा जरूरत थी, यहीं पर टूटे और बिखरे हुए भारतीय समाज को जोड़ने की सबसे ज्यादा जरूरत थी, यहीं पर भारत जोड़ो मुहिम को और मजबूती व विस्तार से चलाने की जरूरत थी। मगर कांग्रेश ने ऐसा नहीं किया।

     इस यात्रा का गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी पर क्या कहना है? इन मुद्दों पर भारत जोड़ो यात्रा बिल्कुल चुप है। गरीबों की पहुंच से दूर होती जा रही शिक्षा और स्वास्थ्य पर यह यात्रा कोई बात नहीं करती, इस पर कांग्रेस के नेता मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं। यह यात्रा कांग्रेस की आर्थिक नीतियों पर जुबान खोलने को तैयार नहीं है। कमाल यह भी है कि कांग्रेस बीजेपी की जन विरोधी और देश विरोधी आर्थिक नीतियों पर कोई सवाल नहीं उठा रही है और यह भी बहुत ही अचंभे की बात है कि इस यात्रा में भी कांग्रेसी अपनी आर्थिक नीतियों के बारे में कोई जानकारी नहीं दे रही है।

     उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियां कांग्रेस द्वारा 1991 में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में शुरू की गई थी और इस देश के एक अरब से ज्यादा किसानों मजदूरों छात्रों नौजवानों मेहनतकशों और महिलाओं के विकास की विनाश लीला तभी शुरू हो गई थी। कांग्रेस ने इन जनविरोधी और देश विरोधी नीतियों  को धीरे धीरे लागू किया था, तो मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने इन जनविरोधी और देश विरोधी नीतियों को रॉकेट की रफ्तार से लागू करना करके देश और दुनिया के धन्ना सेठों की तिजोरियां भर डाली है। और देश की अस्सी फ़ीसदी जनता किसानों मजदूरों को गरीब बना दिया है। इन्हीं आर्थिक नीतियों का परिणाम है कि जहां भारत के चंद पूंजीपतियों की संपत्ति दिन-रात बढ़ती जा रही है। वहीं भारत के 85 परसेंट परिवारों की आय घट गई है।

     वैसे भी जब कांग्रेस सत्ता में थी तो तब बीजेपी ने उसकी नई आर्थिक नीतियों का कोई विरोध नहीं किया था और अब जब बीजेपी सत्ता में है तो कांग्रेस इन जनविरोधी आर्थिक नीतियों का कोई विरोध नहीं कर रही है। भारत के पिछले 30 वर्षों के इतिहास को देखकर हम यह बखूबी कह सकते हैं कि इन जनविरोधी और देश विरोधी आर्थिक नीतियों को लेकर कांग्रेस और बीजेपी में कोई फर्क नहीं है। वे दोनों ही मुस्तैदी के साथ इन जनविरोधी आर्थिक नीतियों को लागू कर रही हैं।

       वैसे भी कांग्रेस हमेशा से ही वामपंथी नीतियों और कम्युनिस्टों की विरोधी रही है। 1946 में नेहरू ने कम्युनिस्टों को कांग्रेस से निकाल दिया था। आजादी के बाद बनी केंद्र सरकार में नेहरू ने किसी भी कम्युनिस्ट नेता को अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया था। फिर जनता द्वारा द्वारा चुनी गई केरल की ई एम एस नंबूद्रीपाद की  सरकार को 1959 में कांग्रेस ने गिरा दिया था और फिर बंगाल और त्रिपुरा में यही काम किया गया। अब एक बार फिर केरल में  यही खेल जारी है।

       वैसे भी कांग्रेसी पूंजीपतियों की पार्टी है। उसने भारत में मुख्य रूप से उन्हीं पूंजीपतियों की संपत्तियों को बढ़ाने का काम किया है और वैसी ही नीतियां लागू की हैं। आमतौर पर उसका किसानों, मजदूरों और मेहनतकशों के वास्तविक विकास और जनकल्याण से उसका कोई लेना-देना नहीं है। हमारे देश के और विदेशों के साम्राज्यवादी पूंजीपति और सरमायेदार नहीं चाहते कि इस देश में  कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा फूले फले और आगे बढ़े। इसीलिए देश विदेश के पूंजीपतियों की यह हमेशा कोशिश रहती है कि किसी भी तरीके से कम्युनिस्टों को सत्ता से बाहर किया जाए, किसी भी तरीके से उनकी सरकारों को पलट दिया जाए।

     हम कांग्रेस की इस यात्रा से ना खुश नहीं है और ना ही इसके विरोध में है, कांग्रेश अपने हिसाब से इस यात्रा को आयोजित कर रही है, मगर इस यात्रा के स्थान चुने जाने से हम इत्तेफाक नहीं रखते। जिन क्षेत्रों में इस यात्रा को ज्यादा दिन गुजारने चाहिए थे, वहां इस यात्रा का लगभग कोई नामोनिशान नहीं है और यह अपने वोट बैंक को बचाने में लगी हुई है। कांग्रेस पार्टी सत्ता की भूखी है। उसे किसी भी प्रकार सत्ता और कुर्सी चाहिए। भारत जोड़ो यात्रा भी कमोबेश उसी अभियान की अगली कड़ी है। इससे ज्यादा और कुछ नहीं। यह सिर्फ और सिर्फ अपने वोटों को जोडे रखने के अभियान की ही एक अगली कड़ी भर है। इसका हमारे देश के करोड़ों परेशान किसानों मजदूरों नौजवानों महिलाओं और छात्रों की समस्याओं को दूर करने से कोई लेना देना नहीं है।

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