सुसंस्कृति परिहार
1 जनवरी 1818 को कोरेगांव भीमा में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा सेना के बीच लड़ी गई थी। इस लड़ाई की खास बात यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे तले 500 महार सैनिकों ने पेशवा बाजीराव-2 की 25000 सैनिकों की टुकड़ी से लोहा लिया था। इस दलित महार जाति की ऐतिहासिक विजय की स्मृति में अंग्रेजों ने जय स्तंभ भी बनाया था। जहां प्रतिवर्ष एक जनवरी को बड़ी संख्या में दलित महार जन हज़ारों की तादाद में इकट्ठा होकर अपनी जय का उत्सव मनाते हैं और इसे अपनी अस्मिता से जोड़कर गौरवान्वित होते हैं। हेनरी टी प्रिंसेप की किताब हिस्टरी ऑफ़ द पॉलिटिकल एंड मिलिट्री ट्रांजैक्शंस इन इंडिया में इस लड़ाई में महार दलितों से सजी अंग्रेज़ टुकड़ी के साहस का ज़िक्र मिलता है। अपने मृत सैनिकों की स्मृति में कंपनी ने कोरेगांव में ‘विजय स्तंभ’ (एक ओबिलिस्क) का निर्माण किया। स्तंभ का शिलालेख घोषित करता है कि कैप्टन स्टांटन की सेना ने पूर्व में ब्रिटिश सेना की गर्वित विजय हासिल की। कोरेगांव स्तंभ शिलालेख में लड़ाई में मारे गए 49 कंपनी सैनिकों के नाम शामिल हैं। इनमें से 22 महार जाति के लोग हैं।
इस बार, कोविड-19 के मामले बढ़ने और संबंधित प्रतिबंधों के बावजूद भी बड़ी संख्या में लोग जय स्तंभ क्षेत्र में जुटे। हालांकि 31 दिसंबर की मध्य से दो जनवरी सुबह तक सम्पूर्ण पुलिस क्षेत्र में 144 धारा लगाई गई थी। प्रशासन की ओर से धारा 144 के तहत जारी एक आदेश के अनुसार स्मारक के आसपास के गांवों में बैनर आदि लगाना, ऐसी सामग्री पोस्ट करना जिससे अफवाह फैलने की आशंका हो, समुदायों के बीच घृणा पैदा हो सकती हो, आदि पर प्रतिबंध लगाया था। 60 वर्ष से अधिक वय के स्त्री पुरुष और 15 साल तक के बच्चों को भी जय स्तंभ नहीं जाने दिया गया।
जबकि महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार, राज्य के गृह मंत्री दिलीप वलसे पाटिल, समाज कल्याण मंत्री धनंजय मुंडे भी आज सुबह पेरने गांव के पास स्थित जयस्तंभ पहुंचे। यहां भारी पुलिस बल लगाया गया था। यदि 200वीं जयंती के वर्ष को छोड़ दें तो कभी भी भारी भीड़ के होते हुए यहां कोई लड़ाई झगड़े और जन हानि नहीं हुई। युद्ध की 204 वीं वर्षगांठ को चिह्नित करने के लिए जय स्तंभ को भारतीय सेना की महार रेजिमेंट के प्रतीक चिन्ह से सजाया गया है। इस बार स्मारक को फूलों से भी सजाया गया है, तिरंगे के साथ-साथ उस पर महार रेजीमेंट का प्रतीक चिन्ह भी था। ध्यान देने की बात यह है कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि पेशवाई की हार के बाद महारों को कोई राहत मिली या दी गई थी। सही बात तो ये है कि उनकी जाति का उत्पीड़न निरंतर चलता रहा बल्कि जैसा पहले बताया गया कि अकृतज्ञ ब्रिटिश सेना ने उनकी पिछली बहादुरी को नजरअंदाज करते हुए अपनी सेना में उनकी भर्ती पर रोक लगा दी। अंग्रेजों ने उनकी भर्ती शुरू करने की याचिकाओं पर तब तक ध्यान नहीं दिया, जब तक उन्हें पहले विश्व युद्ध का डर नहीं दिखा। इसके बाद ही उन्होंने सेना में महारों की भर्ती दोबारा शुरू की।
अंग्रेजों को, यहां तक की दलित आंदोलन का श्रेय भी दिया जाता है। लेकिन इसके साथ यह समझने की भी जरूरत है कि ये किसी विशेष उद्देश्य के कारण नहीं बल्कि मूलतः उनकी औपनिवेशिक सोच के चलते था। दलित समाज को इस सच्चाई को भी समझना होगा। वे सस्ते और बहादुर ,गरीब लोगों की तलाश में थे।
पेशवा, अंग्रेज या आज के शासन तंत्र में दलित अभी भी उत्पीड़न की ज़द में है। इसलिए महार जाति की अस्मिता और बहादुरी का प्रतीक जय स्तंभ को मानते हुए बाबा भीमराव अम्बेडकर ने भी इस जलसे में उनमें ऊर्जा भरने की हमेशा कोशिश की। इसी तरह सन् 2017 दिसम्बर की 31 तारीख थी ऐल्गार परिषद ने पुणे के ऐतिहासिक शनिवार बाड़ा में एक बैठक की जिसमें प्रकाश अम्बेडकर,सोनी सोरी, जिग्नेश, उमर खालिद, बी जी कोल्से पाटिल आदि महत्त्वपूर्ण लोग उपस्थित थे। 1 जनवरी 18 को यहां पथराव हुआ कई गाड़ियां और दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया यहां तक की एक 24 वर्षीय युवक की मौत भी हो गई।
घटना के ठीक दूसरे दिन बाद पिंपरी पुलिस स्टेशन में हिंदूवादी नेताओं संभाजी भिड़े, मिलिंद एकबोटे और तीन अन्य लोगों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज की गई। इस मामले को आगे तफसील और जांच के लिए पुणे ग्रामीण पुलिस को सौंपा गया लेकिन 8 जनवरी को एक व्यक्ति के कहने पर एल्गार परिषद की बैठक से में उपस्थित सभी लोगों को गिरफ्तार करने के आदेश दिए गए। इससे यह समझा जा सकता है कि किस तरह हिंदुत्ववादी ताकतों के संगीन मामले को जबरिया सामाजिक कार्यकर्ताओं के मत्थे मढ़ा गया जबकि वे सब उस कार्यक्रम में शामिल भी नहीं थे। उन्हें न केवल माओवादी आतंकी कहा गया बल्कि यह भी कहा गया कि वे मोदीजी की हत्या का प्लान बना रहे थे ।
एल्गार की बैठक में उपस्थित लोगों के साथ ही साथ उनके संपर्क के लोगों जिनमें मशहूर मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्त्ता ही थे। उन्हें अगस्त 2018से जेल में बिना अपराध बताए ठूंसा गया है । ये अच्छी बात है इस सरकार ने जिस तरह इन मशहूर सामाजिक कार्यकर्ताओं को फंसाने की कोशिश की वह संजाल धीरे धीरे क्षत विक्षत हो रहा है। एडवोकेट सुधा भारद्वाज और कवि वारवर राव को डिफाल्ट जमानत मिलने के बाद सात अन्य लोगों को भी जमानत ज़रूर मिलेगी तथा इस वर्ष उनकी ससम्मान घर वापसी का इंतज़ार रहेगा । क्योंकि जिस फर्जी तरीके से इन सबको फंसाया गया उसकी जांच रिपोर्ट में ये ग़लत पाया गया है।
वस्तुत:ये लड़ाई अंग्रेजों के साथ युद्ध लड़ने वालों का साथ देने की नहीं है बल्कि पेशवाई काल से अब तक जातीय उत्पीड़न और दमन की है। गरीब की भूख का फायदा कौन नहीं उठाता। इसमें शक नहीं वे बहादुर भी है। भारतीय सेना में मौजूद महार रेजीमेंट की भी अनेक शानदार उपलब्धियां हैं। इन उपलब्धियों से हौसले बुलंद करना जुर्म नहीं है। वे गर्व करें। किंतु बराबरी का दर्जा हासिल करने खुद भी संघर्ष करें।
उनकी बराबरी की लड़ाई में संविधान के साथ मानवाधिकार दिलाने वाले भी महत्वपूर्ण है जो आज जेल में हैं। आज अम्बेडकर जी नहीं है किन्तु संविधान तमाम दलितों के साथ हैं। याद रखना होगा जय स्तंभ पर पढ़ने लिखने की शपथ लेकर आगे बढ़ना ही समान दर्जा दिलायेगा। अम्बेडकर भी यही चाहते थे। इसलिए मज़बूत इरादों के साथ आगे बढ़ना ख़ूब पढ़ना तथा हक के लिए लड़ना होगा ताकि समाज और देश में समरसता आ सके। बाबा साहेब भी यही कहते थे– “शिक्षित बनो, संगठित रहो और उत्तेजित बनो”

