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महिला विरोधी पूर्वाग्रहों से मुक्त रखने की बड़ी पहल, सुप्रीम कोर्ट बोला, जबान संभाल के!

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राजेश चौधरी

सुप्रीम कोर्ट ने जजों को अदालती फैसलों में महिलाओं के लिए पूर्वाग्रह भरे शब्दों से परहेज करने को कहा है। इसके लिए हैंडबुक जारी की गई है। चीफ जस्टिस ने कहा है कि जेंडर स्टिरियोटाइप (घिसे-पिटे या रूढ़िवादी) शब्दों का उपयोग अदालती कार्रवाई में होता रहा है, जिन्हें पहचान कर हटाने और उनके बदले वैकल्पिक शब्दों का इस्तेमाल करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह एक प्रगतिशील पहल हुई है। वैसे सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर अपने फैसलों के जरिए भी स्टिरियोटाइप अवधारणा को खत्म करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब इस मामले में एक हैंडबुक जारी कर चीफ जस्टिस ने जजों से कहा है कि वह ऐसे शब्दों और वाक्यों से परहेज करें।

गलाम नहीं हैं महिलाएं

सुप्रीम कोर्ट ने हैंडबुक जारी कर जजों को अदालती फैसलों में ऐसे स्टिरियोटाइप सोच वाले शब्दों के बदले वैकल्पिक शब्दों और वाक्यों के इस्तेमाल की सलाह दी है। मिसाल के तौर पर रखैल शब्द के बदले शादी से बाहर महिला का किसी और पुरुष से रोमांटिक रिश्ता जैसे शब्द इस्तेमाल करने को कहा गया है। ऐसे ही वेश्या को सेक्स वर्कर, उत्तेजक कपड़े को ड्रेस, बहकाने वाली महिला के बदले महिला, व्यभिचारिणी शब्द के बदले सिर्फ महिला, बिन ब्याही मां के बदले सिर्फ मां, परपुरुषगामिनी के बदले शादी से बाहर दूसरे पुरुष से संबंध, नाजायज औलाद के बदले वैसे बच्चे जिनके पैरंट्स की शादी न हुई हो, अफेयर के बदले शादी से बाहर के संबंध, छेड़छाड़ के बदले गलियों व सड़कों पर सेक्शुअल हरासमेंट और हाउस वाइफ के बदले होम मेकर शब्द प्रयोग करने की सलाह दी गई है।

पहले के जजमेंट

सुप्रीम कोर्ट अपने जजमेंट के जरिए भी इस तरह के संदेश देता रहा है।

नहीं रही मजबूरी

साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे तमाम फैसलों के जरिए रूढ़िवादी सोच और रवैये को खारिज करता रहा है। फिर भी, उसका ताजा कदम विशेष अहमियत रखता है। अदालती फैसलों में वेश्या या रखैल जैसे शब्दों से असहजता महसूस होती रही है, लेकिन अब तक उसे मजबूरी के रूप में स्वीकार किया जाता था। अब हैंडबुक जारी कर इन शब्दों का विकल्प दे दिया गया है, जिसके बाद इन शब्दों के प्रयोग पर पूरी तरह रोक लगने की उम्मीद की जा सकती है।

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