महेंद्र मिश्र
बिहार चुनाव के नतीजे लोगों के लिए रहस्य बन गए हैं। वह कुछ अंधेरे में हाथी के पैर वाली कहानी जैसा लगता है। सब का अपना-अपना विश्लेषण है। लेकिन किसी एक निष्कर्ष पर सहमति नहीं बन पा रही है। विपक्षी गठजोड़ के समर्थकों के बड़े हिस्से ने इसे चुनावी धांधली और जबरन कब्जे के हवाले कर संतोष जाहिर कर लिया है। लेकिन अगर इसी नतीजे पर विपक्षी दल भी पहुंच जाएंगे तो मामला बेहद खतरनाक होगा। इस बात में कोई शक नहीं कि चुनाव में धांधली हुई है।
और वह नतीजों में बिल्कुल साफ झलक रहा है। सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन को जो बंपर सीटें मिली हैं वह बताती हैं कि बिहार में उसके पक्ष में आंधी चल रही थी। लेकिन जमीन पर ऐसा कुछ नहीं था। यह बात इन पंक्तियों का लेखक पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता है क्योंकि उसने चुनाव को बेहद करीब से देखा है। इस बात में कोई शक नहीं कि चुनाव में एनडीए बढ़त लिये हुए था और अगर विपक्ष अपनी कमियों और कमजोरियों को दूर कर लेता तो शायद जनादेश अपने पक्ष में करने में वह सफल हो जाता।
राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा से विपक्ष को मोमेंटम ज़रूर मिला था। लेकिन तीन महीने के गैप के चलते विपक्ष के बिखराव की जो कहानी शुरू हुई वह सीट बंटवारे तक जारी रही। और इसका नतीजा यह रहा कि आखिर में 10-12 सीटें फ्रेंडली फाइट के हवाले कर दी गयीं। उन पर कोई आपसी सहमति नहीं बन सकी। आखिरी दौर में प्रचार के दौरान विपक्ष दलों में ज़रूर कुछ एकता दिखी लेकिन तब तक चीजें काफी आगे बढ़ चुकी थीं।
विपक्ष के इस बिखराव के पीछे की जो कहानी बाद में पता चली वह बेहद शर्मनाक है। एक ऐसे समय में जब कि सब कुछ दांव पर लगा हो और एक ऐसी फासीवादी ताकत सामने खड़ी हो जो सब कुछ लील जाने के लिए तैयार हो। बिहार जैसी महत्वपूर्ण चौकी जीतने के लिए उसने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखा हो। तब आप अपनी कुछ सीटें, कुछ स्वतंत्रता और कुछ इगो को आधार बनाकर अपनी पूरी एकता को सूली पर चढ़ाने के लिए तैयार हो जाएं तो इससे बड़ी विडंबना कोई दूसरी हो ही नहीं सकती।
चुनाव की घोषणा के पहले बिहार समेत देश के बुद्धिजीवियों और राजनीतिक विश्लेषकों के दिमाग में बस एक ही सवाल कौंध रहा था और वह था आखिर विपक्ष ने राहुल गांधी की वोट चोरी यात्रा के दौरान जो मोमेंटम बनाया था उसको बनाए क्यों नहीं रख सका? उसके और चुनाव की घोषणा के बीच तीन महीने का गैप क्यों रहा? कोई आंदोलन या फिर किसी तरह के अभियान की बात तो छोड़ दीजिए उस बीच महागठबंधन के नेताओं की एक बैठक तक नहीं हो सकी। यहां तक कि सीट शेयरिंग तक पर कोई सहमति नहीं बन सकी और अंत में सभी दलों ने अपनी-अपनी सीटों की अलग-अलग घोषणाएं कीं। जिसका नतीजा यह रहा कि कुछ सीटों पर विपक्ष फ्रेंडली फाइट में गया।
आखिर में एक प्रेस कांफ्रेंस ज़रूर हुई जिसमें तेजस्वी को मुख्यमंत्री और मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश किया गया। और इसके जरिये अपनी तरफ से एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की गयी। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस गैप के कारणों की जब इन पंक्तियों के लेखक ने तलाश शुरू की तो विपक्षी गठबंधन के एक नेता ने बताया कि इस बिखराव के बीज राहुल गांधी की वोट जनाधिकार यात्रा में ही पड़ गए थे। दरअसल इस यात्रा की घोषणा कांग्रेस ने किया था और इसे वह अपनी पार्टी की यात्रा के तौर पर देख रही थी।
क्योंकि उसको शुरू करने से पहले न तो उसने विपक्ष के दूसरे नेताओं से बात की और न ही उनकी कोई अलग से बैठक की थी। अपनी एकतरफा घोषणा के बाद ही उसने यात्रा शुरू कर दी। चूंकि चुनाव सिर पर था इसलिए गठबंधन के दूसरे नेता और दल भी उस यात्रा का हिस्सा बन गए। उसमें जुटी भीड़ का बड़ा हिस्सा आरजेडी-माले समेत दूसरे दलों के समर्थकों का था। जरूरी जमीनी ताकत न होने से उतनी भीड़ कांग्रेस जुटा भी नहीं सकती थी।
लेकिन कांग्रेस को लगा कि यह भीड़ खुद उसकी अपनी है जो उसके नेता को देखने आयी है। और चूंकि कांग्रेस ने इस बार प्रभारी अल्लावेरू के नेतृत्व में सूबे में स्वतंत्र रूप से खड़ा होने का फैसला ले लिया था। इसलिए उसने उसी भीड़ के आधार पर अपनी दावेदारी भी शुरू कर दी। यहीं से कांग्रेस और आरजेडी के बीच एक पतली दरार पैदा होनी शुरू हो गयी। तेजस्वी को लगा कि यात्रा का तो पूरा श्रेय कांग्रेस ले जा रही है और सूबे में उनका नेतृत्व संकटग्रस्त हो गया है। नेतृत्व की कमान फिर से हासिल करने की जल्दबाजी में उन्होंने भी एक यात्रा का ऐलान कर दिया और सासाराम से उसकी शुरुआत भी हुई लेकिन कुछ जिलों में जाने के बाद ही वह यात्रा अचानक बंद हो गयी। न तो कोई कारण बताया गया और न ही उस पर बहुत बात हुई। दरअसल एक यात्रा के तुरंत बाद दूसरी यात्रा का चल पाना मुश्किल होता है।
उसमें संसाधन से लेकर तमाम दूसरी चीजों की जरूरत पड़ती है। और ऐसा न हो पाने पर मोमेंटम कमजोर पड़ जाता है। दोनों दलों के बीच आयी यह दरार सीटों के बंटवारे में और चौड़ी हो गयी जब कांग्रेस ने तमाम जीत की संभावना वाली सीटों पर अपनी दावेदारी शुरू कर दी। विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी अपनी तरफ खींचने लगे। यहां तक कि एक दौर ऐसा आया जब उन्होंने गठबंधन से अलग होने तक का तकरीबन फैसला ले लिया था। इसकी घोषणा के लिए उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस तक करने की पहल कर दी थी। लेकिन तभी माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने राहुल गांधी से बात की और फिर राहुल गांधी ने सहनी से बात कर उनके साथ न्याय होने का भरोसा दिलाया और उन्हें शांत किया। और यह न्याय उन्हें सरकार बनने पर उप मुख्यमंत्री पद के तौर पर मिला।
बावजूद इसके महागठबंधन और उसके घटक दल एकजुट होकर चुनाव लड़ रहे हैं इसका संदेश भी तेजस्वी कहिए या फिर राजद की अपनी रणनीतिक कमियों के चलते नहीं जा पाया। राजद गठबंधन की जगह तेजस्वी के चेहरे और नेतृत्व पर ज्यादा जोर दे रहा था। यहां तक कि तेजस्वी प्रण के नाम से ही उसने अपना घोषणापत्र जारी किया। नौकरियां भी तेजस्वी ही देंगे और तमाम चीजें भी तेजस्वी ही करेंगे। और इस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान महागठबंधन नहीं बल्कि तेजस्वी और आरजेडी ही प्रचार के केंद्र में रहे। जिसका मतलब था कि सामाजिक तौर पर पूरे प्रचार का संदेश एमवाई यानि मुस्लिम और यादव तक सीमित हो जाना था।
जबकि इस प्रचार को न केवल समावेशी बनाने की जरूरत थी बल्कि इसे समाज के हर उस समूह ले जाने की जरूरत थी जिसका महागठबंधन वोट चाहता था। एमवाई से इतर जातियों खास कर अति पिछड़ों और दलितों तक। जबकि इसके उलट नीतीश का बड़ा चेहरा होने के बावजूद एनडीए उनको आगे करने की जगह पूरे गठबंधन को आगे रखा। यह बात अलग है कि कई जगहों पर वह नीतीश का नाम लेने और उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाए रखने की घोषणा करने के लिए मजबूर दिखा।
यहां एक बात स्पष्ट कर दें कि अति पिछड़ों की आबादी वहां तकरीबन 40 फीसदी के करीब है। लिहाजा वोट बैंक के लिहाज से वह सबसे मजबूत सामाजिक समूह हो जाता है। इस बार सहनी और आईके गुप्ता जैसे नेताओं के जरिये महागठबंधन ने उसमें सेंध लगाने की कोशिश ज़रूर की लेकिन वह मल्लाह और तातर जैसी कुछ छोटी अति पिछड़ी जातियों तक ही सीमित था। उनके न तो चेहरे बड़े थे और न ही वह इतने प्रभावी थे कि इतने बड़े हिस्से को कवर कर सकें। लिहाजा यह कोशिश एक कोशिश ही बन कर रह गयी। जिसका नतीजा यह रहा कि आईके गुप्ता की पार्टी एक सीट तो जीत भी गयी लेकिन 17 सीटों पर लड़ने वाले मुकेश सहनी एक भी सीट हासिल नहीं कर सके।
और उससे बड़ी विडंबना यह रही कि जिस एमवाई को आरजेडी अपने कोर वोट के तौर पर देखता रहा है और पिछली बार के मुकाबले इस बार माना जा रहा था कि ओवैसी की एआईएमआईएम बहुत ज्यादा अच्छा नहीं करेगी और उसका प्रभाव बिल्कुल क्षीण हो गया। नतीजों ने बताया कि वह न केवल प्रभावी रूप से लड़ी है बल्कि विपक्षी महागठबंधन को उसने बड़े स्तर पर डैमेज किया है। उसे कुल पांच सीटें मिली हैं और सीमांचल की तमाम सीटों पर उसने अच्छा वोट हासिल कर विपक्ष को अच्छा खासा नुकसान पहुंचाया है। उदाहरण के तौर पर कटिहार की बलरामपुर सीट जिस पर सीपीआई (एमएल) के कद्दावर नेता महबूब आलम, जो लगातार पिछले कई चुनावों से जीतते रहे हैं, तीसरे नंबर पर चले गए। और वहां एआईएमआईएम का प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहा।
दिलचस्प बात यह है कि यहां एमआईएम और माले को तकरीबन बराबर वोट मिले। और लोकजनशक्ति पार्टी (रामविलास) की प्रत्याशी संगीता देवी महज 389 वोट से ही जीत पायीं। कहते हैं कि पहले मुसलमानों ने ज़रूर आरजेडी के लिए ही मन बन बनाया था। लेकिन जब ओवैसी ने यह कहा कि वह गठबंधन में शामिल होना चाहते थे लेकिन उन्हें जगह नहीं दी गयी ऐसे में स्वतंत्र रूप से लड़ने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा था। लोगों का कहना है कि यही सहानुभूति उनके पक्ष में काम कर गयी।
गठजोड़ के तौर पर भी एनडीए महागठबंधन से ज्यादा मजबूत था। उसके पास सवर्ण हिस्से की सबसे विश्वसनीय पार्टी के तौर पर बीजेपी थी। नीतीश जैसा चेहरा था जिसके पास न केवल कुर्मी, कोइरी और कुशवाहा का कोर वोट था बल्कि अति पिछड़ों का वह सबसे विश्वसनीय प्रतिनिधि था। और मार करने में वह जीविका दीदियों और अपनी अन्य योजनाओं के जरिये हर सामाजिक तबके में सक्षम था। जो चिराग पासवान पिछली बार अलग होकर चुनाव लड़े थे वह इस बार एनडीए के हिस्से थे और उनके पास दुसाध और पासियों का ठोस वोट बैंक था। इसके अलावा पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा केंद्रीय कैबिनेट मंत्री जीतन राम माझी का हिंदुस्तान अवामी मोर्चा यानि ‘हम’ भी इसी गठबंधन का हिस्सा था। उसके पास मुसहरों का एक ठोस वोट बैंक था। इस तरह से अगर कहा जाए तो राजनीतिक और सामाजिक दोनों रूपों में एनडीए महागठबंधन से कहीं ज्यादा मजबूत था।
अब रही प्रशांत किशोर की भूमिका की बात तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सूबे में अगर लोगों के जीवन और रोजी-रोटी के सवाल मुद्दे बने तो इसमें प्रशांत किशोर की बड़ी भूमिका रही है। प्रशांत किशोर ने इसमें एक कैटलिस्ट का काम किया। जिसका नतीजा था कि पलायन, बेरोजगारी और शिक्षा सभी दलों के मैनिफेस्टो के केंद्र में थे। तेजस्वी ने तो इसको अपना केंद्रीय नारा ही बना दिया। जिसमें उन्होंने हर परिवार के कम से कम एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की बात कही थी। और एनडीए ने फिर साल में एक करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा किया था।
प्रशांत किशोर यह जो कुछ कर पाए वह उनके दो साल की जमीनी मेहनत और सोशल मीडिया पर उनके प्रभाव का नतीजा था। लेकिन कोई ठोस सामाजिक आधार न होने के चलते वह कोई कोण नहीं बना सके जो कम से कम शुरुआती दौर में दिख रहा था। और आखिर में दोनों गठबंधनों के बीच ध्रुवीकरण के चलते बिल्कुल सैंडविच होकर रह गए। हालांकि उन्हें 3.5 फीसदी वोट मिला है जो किसी जन्मतुआ पार्टी के लिए कम नहीं कहा जाएगा।
जिस पार्टी को इस चुनाव में सबसे बड़ा धक्का लगा है वह सीपीआई (आईएमएल) है। पिछली बार चुनाव में इसको 12 सीटें मिली थीं जो घटकर दो हो गयी हैं। मामला यहां सीटों भर का नहीं है। यह पार्टी ऐसी थी जिसके बारे में कहा जाता था कि आंधी आ जाए या कि तूफान इसका जनाधार कहीं टस से मस नहीं होने वाला है। लेकिन इस चुनाव में यह बात भी गलत साबित हो गयी। पार्टी अपने बल पर अपने जनाधार वाले इलाकों में नियमित तौर पर चार-पांच विधायकों को जिताने की ताकत रखती थी। और दूसरे दलों से गठजोड़ के बाद निश्चित तौर पर यह संख्या बढ़नी थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
जो यह बताता है कि पार्टी का अपना परंपरागत आधार भी इस बार खिसक गया। उसमें पार्टी के साथ टिके रहने की वह चट्टानी ताकत नहीं रही जिसके लिए वह जाना जाता था। ऐसे में नेतृत्व के लिए यह एक बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए। आखिर कमी कहां रह गयी? और उसको कैसे दुरुस्त किया जा सकता है? संघर्षों की जिस जमीन को नेताओं और कैडरों ने अपना खून-पसीना बहाकर खड़ा किया था वह इतने आसानी से कैसे खिसक गया? यह एक बड़ा सवाल है।
ऐसा नहीं है कि लोग नीतीश से पूरी तरह संतुष्ट थे। लेकिन जब वो लालू यादव के दौर की सत्ता से तुलना करते हैं, जिसमें निश्चित तौर पर सामंती उत्पीड़न को खत्म करने और लोगों को उनकी आवाज देने के उनके योगदान को चिन्हित किया जाता है, लेकिन विकास के मामले में उनकी कमी को एक हद तक जब लोग नीतीश के शासन में पूरा होते देखते हैं तो उनका मिजाज बदल जाता है। इस बात में कोई शक नहीं कि नीतीश के शासन में शहरों में चाहे फ्लाईओवर हों या फिर गांवों को जोड़ने वाली सड़कें या फिर 16-18 घंटे बिजली की आपूर्ति को सुनिश्चित किया गया है।
महिलाओं के लिए नीतीश ने जो किया है वह शायद ही देश में दूसरी कोई सरकार कर पायी हो। और इस चुनाव में महिलाओं को दिए गए दस हजार रुपये ने नीतीश की जीत में निर्णायक भूमिका निभाया है। हालांकि चुनाव से ठीक पहले इसका वितरण किसी भी लिहाज से उचित नहीं कहा जाएगा। यह शुद्ध रूप से वोट खरीदने के लिए दिया गया एक घूस था। अगर देश में कोई स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आयोग होता तो वह कतई इसकी इजाजत नहीं देता। लेकिन ऐसे चुनाव आयोग से क्या उम्मीद करना जो सारी शर्म और हया घोल कर पी गया हो और नंगा होने की हद तक सत्ता के साथ खड़ा है।
अब विपक्ष अगर जनता को इस बात का भरोसा दिलाने में कामयाब हो जाता कि जो कुछ नीतीश के शासन में मिला है वह बना रहेगा और फिर उससे आगे बढ़कर चीजें होंगी तो शायद जनता उसके साथ जाने के लिए तैयार हो जाती। लेकिन वह भरोसा दिलाने में विपक्ष नाकाम रहा। उल्टे लगता है इस बात का खतरा उसने ज़रूर महसूस किया कि आरजेडी के सत्ता में आने के बाद सूबे की कानून और व्यवस्था बिगड़ सकती है। ऐसे में वह चाहकर भी बदलाव के पक्ष में वोट नहीं किया। यह स्थिति उन्हें निराशा की तरफ ले जाती है। जिसमें 15 सालों के आरजेडी के शासन और 20 सालों के नीतीश शासन को देखने के बाद उनमें बेहद हताशा पैदा हो गयी है। उन्हें भरोसा ही नहीं है कि कोई पार्टी उनके जीवन में कोई बदलाव कर सकती है।
अब रही वोट चोरी और मैनिपुलेशन की बात तो जिस तरह की सीटें आयी हैं उसमें उसकी भूमिका निश्चित तौर पर दिख रही है। क्योंकि सीटों की संख्या बताती है कि जमीन पर एनडीए के पक्ष में आंधी और तूफान चल रहा था। जो कि सच्चाई से बहुत दूर है। इस बात में कोई शक नहीं कि एनडीए के पक्ष में बढ़त थी लेकिन दूसरी सच्चाई यह भी है कि विपक्ष उसे कड़ी टक्कर दे रहा था। और अगर वह अपनी कमियों और कमजोरियों को समय रहते ठीक कर लेता और एक मोमेंटम बनाने में कामयाब हो जाता तो चुनावी तस्वीर शायद कुछ दूसरी होती।
और हां आखिरी बात जो इन पंक्तियों के लेखक ने चुनाव के दौरान देखा और समझा। बिहार की स्थिति बेहद खराब है। देश के तमाम सूबों के मुकाबले वह बहुत पीछे छूट गया है। उसकी हालत अफ्रीका के किसी बेहद पिछड़े देश से भी बदतर है। वह तस्वीर पटना के फ्लाईओवरों से जो शुरू होती है तो कस्बों और गांवों तक पहुंचते-पहुंचते न केवल विस्तारित होती है बल्कि और गहरी भी हो जाती है। सूबे के तकरीबन चालीस फीसदी लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन जी रहे हैं। उनको साफ पीने का पानी, शौचालय और बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मयस्सर नहीं हैं।
उनका पूरा दिन अपने परिवार के लिए रोजी रोटी जुटाने में बीत जाता है। लेकिन इस चुनाव में न तो वह पार्टियों के एजेंडे में थे और न ही किसी गोदी मीडिया या फिर वैकल्पिक मीडिया के यूट्यूबर ने उनकी तरफ झांकने की कोशिश की। बिहार में सचमुच में अगर कोई बदलाव करना चाहता है तो उसे इस हिस्से को अपने एजेंडे में शामिल करना होगा और बगैर इसको शामिल किए बिहार में होने वाला कोई भी बदलाव बेमानी साबित होगा।
अब आखिर में बिहार में दलों को मिले वोटों की तथ्यात्मक पड़ताल कर ली जाए। यहां आपको बता दें कि यह आंकड़ा वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह के हवाले से लेकर उन्हीं की टिप्पणियों के साथ इस लेख को समाप्त करते हैं। MGB (RJD + कांग्रेस + लेफ्ट) को कुल 37.3% वोट शेयर मिला। 2024 लोकसभा चुनाव में यह 40.1% था, यानी करीब 2.8% की गिरावट। कोर वोट बैंक (यादव-मुस्लिम-कुछ दलित) अभी भी मजबूत है, लेकिन एंटी-इनकंबेंसी वोट बिखर गया। RJD का व्यक्तिगत वोट शेयर 23% के आसपास रहा, जो स्थिर है।
NDA की बढ़त मुख्य रूप से गठबंधन एकजुटता और छोटे दलों की उनके फोल्ड में वापसी से, MGB से सीधा ट्रांसफर कम दिखता है। NDA (BJP + JD(U) + LJP(RV) + अन्य) को 47.2% वोट शेयर मिला। 2024 लोकसभा में भी NDA का वोट शेयर लगभग इतना ही (48% के करीब) था। बढ़त मुख्य रूप से LJP(RV) के NDA में वापस आने से आई (5-6% वोट जो पहले बिखरे थे)। इंडिपेंडेंट्स और छोटे दलों का वोट शेयर कम हुआ, जो NDA के पक्ष में एकजुट हो गया।
जन सुराज ने MGB से कुछ वोट काटा, लेकिन उसने कोई सीट नहीं जीती। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को 3.5% वोट शेयर मिला। यह मुख्य रूप से महागठबंधन के असंतुष्ट मतदाताओं (खासकर युवा, शहरी और कुछ OBC/muslim) से आया। MGB की 2.8% गिरावट में जन सुराज का योगदान है जबकि आम धारणा यह थी कि यह NDA के सवर्ण वोटबैंक में सेंध लगाएगा। CPI(ML) महागठबंधन का एक प्रमुख घटक रहा है। उसे इस बार 2.84 फीसदी मत मिला है। AIMIM ने भी 1.4% वोट लेकर कुछ सीटों पर असर डाला।

