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बिड़ला हाउस:जहां महात्मा गांधी की हत्या हुई,अब उसे गांधी स्मृति के नाम से जाना जाता है

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30 जनवरी भारत के इतिहास में एक ऐसी तारीख़ है जो शोक, आत्ममंथन और चेतावनी, तीनों का प्रतीक बन गई है. इसी दिन साल 1948 में नई दिल्ली के बिड़ला हाउस के प्रांगण में महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. वही बिड़ला हाउस जो आज गांधी स्मृति के नाम से जाना जाता है. एक ऐसा स्मारक-संग्रहालय जहां दीवारें सिर्फ़ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन, विभाजन की पीड़ा, नैतिक साहस और असहिष्णुता के ख़तरों की कहानी कहती हैं.दिल्ली के जिस बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी की हत्या हुई, उसे अब गांधी स्मृति के नाम से जाना जाता है. यहां बापू ने जीवन के अंतिम 144 दिन बिताए थे. बापू का यहां रहना उनके उस प्रयास का हिस्सा था जिसमें वे दिल्ली में रहकर शांति, सद्भाव और नैतिक दबाव के माध्यम से राजनीतिक नेतृत्व तथा समाज दोनों को दिशा देना चाहते थे. पढ़ें बिड़ला हाउस से कैसे हुआ बापू का जुड़ाव और क्या है इसका इतिहास.

आइए, बापू की पुण्यतिथि के बहाने बिड़ला हाउस का इतिहास जानते हैं और राष्ट्रपिता की हत्या की टाइम-लाइन और अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर भी झांकने का प्रयास करते हैं

निजी निवास से राष्ट्रीय स्मृति तक का सफर

बिड़ला हाउस का निर्माण मशहूर उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला ने साल 1928 में करवाया था. यह उनके परिवार का दिल्ली स्थित निवास था. यह लगभग सात एकड़ में फैला हुआ है. इसमें 12 बेडरूम का बंगला और बाग हुआ करते थे. साल 1971 में सरकार ने बिड़ला परिवार से यह बंगला खरीद लिया. साल 1973 में 15 अगस्त को इसे गांधी स्मृति के रूप में जनता को समर्पित किया गया. यह नई दिल्ली में 30 जनवरी मार्ग पर स्थित है.

Ghanshyam Das Birla

उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला.

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जी.डी. बिड़ला का कई राष्ट्रीय नेताओं से निकट संबंध रहा और महात्मा गांधी भी समय-समय पर यहां ठहरते थे. यह घर उस दौर में एक तरह से राजनीतिक-सामाजिक संवाद का स्थान बन गया था, जहां बैठकें होतीं, सलाह-मशविरा होता और देश के भविष्य को लेकर गंभीर चर्चाएं चलतीं.

महात्मा गांधी अपने जीवन के अंतिम 144 दिन यहीं बिताए थे. यह घर केवल उनके ठहरने की जगह नहीं था. 1947-48 के तनावपूर्ण महीनों में, जब देश विभाजन की हिंसा, शरणार्थी संकट और साम्प्रदायिक उन्माद से गुजर रहा था, बापू का यहां रहना उनके उस प्रयास का हिस्सा था जिसमें वे दिल्ली में रहकर शांति, सद्भाव और नैतिक दबाव के माध्यम से राजनीतिक नेतृत्व तथा समाज दोनों को दिशा देना चाहते थे.

महात्मा गांधी ने अपने जीवन के अंतिम 144 दिन इसी बिड़ला हाउस में बिताए जिसे गांधी स्मृति के नाम से जाना जाता है.

1947-48: उथल-पुथल और महात्मा गांधी की भूमिका

स्वतंत्रता के साथ ही विभाजन की त्रासदी आई. पंजाब, बंगाल, दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में हिंसा फैली. लाखों लोग विस्थापित हुए. महात्मा गांधी उस समय सत्ता के औपचारिक केंद्र से दूर रहकर भी समाज की अंतरात्मा बनने की भूमिका निभा रहे थे. उन्होंने कई जगह जाकर शांति-प्रार्थनाएं कीं, उपवास किए और दोनों समुदायों से हिंसा रोकने की अपील की.

दिल्ली में उनका जोर विशेष रूप से इस बात पर था कि शरणार्थियों के दुख को समझते हुए भी बदले की भावना न पनपे, और अल्पसंख्यक समुदाय के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो. यही नैतिक रुख कुछ कट्टरपंथी विचारधाराओं को असहनीय लगा. महात्मा गांधी के खिलाफ़ नफरत, अफवाह और आरोपों का माहौल बनने लगा, जिसका चरम 30 जनवरी 1948 को दिखाई दिया.

महात्मा गांधी.

30 जनवरी 1948: हत्या का दिन

30 जनवरी की शाम बापू बिड़ला हाउस के बगीचे में होने वाली नियमित प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे. वे धीरे-धीरे चलते हुए लोगों से मिलते-बोलते आगे बढ़ रहे थे. इसी दौरान नाथूराम विनायक गोडसे ने उनके पास पहुंचकर बेहद नज़दीक से गोलियां चलाईं. महात्मा गांधी गिर पड़े. कुछ ही क्षणों में देश ने अपने राष्ट्रपिता को खो दिया.

यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी. यह उस विचार की हत्या थी, जो सत्य, अहिंसा और धार्मिक-सामाजिक सह-अस्तित्व पर आधारित था. लेकिन इतिहास ने दिखाया कि किसी व्यक्ति को मारकर विचार को हमेशा नहीं मारा जा सकता, उलटे ऐसी घटनाएं समाज को लंबे समय तक झकझोरती रहती हैं.

बिड़ला हाउस का यही वो हिस्सा है जहां बापू को गोली मारी थी.

कब-क्या हुआ?

आज गांधी स्मृति में जाते ही एक गहरा मौन-सा महसूस होता है. परिसर में वह मार्ग चिन्हित है जहां से महात्मा गांधी प्रार्थना सभा की ओर चले थे. संग्रहालय के हिस्से में महात्मा गांधी के जीवन, स्वतंत्रता आंदोलन, उनके पत्रों, फोटोग्राफ़, और अंतिम दिनों के संदर्भों को प्रदर्शित किया गया है. यह स्थान सिर्फ़ दर्शनीय नहीं, शिक्षणीय है. यह याद दिलाता है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा, विचार और असहमति की मर्यादा टूटे तो हिंसा कितनी जल्दी सामान्य बन सकती है.

बापू की हत्या में इस गन का इस्तेमाल हुआ था.

30 जनवरी की सीख: स्मृति, शोक और संकल्प

पुण्यतिथि मनाना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है. यह अपने समय की सामाजिक हवा को परखने का अवसर भी है. क्या हम असहमति को सुन पाते हैं? क्या हम किसी व्यक्ति या समूह के बारे में घृणा को राजनीति कहकर स्वीकार तो नहीं कर लेते? महात्मा गांधी की हत्या हमें बताती है कि नफरत विचारों को नहीं हराती. वह समाज को घायल करती है, और पीढ़ियों तक उसके निशान रहते हैं.

गांधी स्मृति, इसलिए, सिर्फ़ अतीत का संग्रहालय नहीं है. यह वर्तमान के लिए एक दर्पण है. 30 जनवरी को जब हम बापू को याद करें, तो उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाने के साथ-साथ अपने सार्वजनिक व्यवहार में सत्य, संयम और करुणा के लिए भी थोड़ा-सा स्थान बनाएं. यही उनके प्रति सबसे सार्थक श्रद्धांजलि हो सकती है..

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