Site icon अग्नि आलोक

जन्म-कर्म, मृत्यु-पुर्जन्म और ज्योतिष 

Share

    पवन कुमार, ज्योतिषाचार्य 

   वैज्ञानिकजन लैब में आदमी का क्लोन बनाने लगेंगे जैसे अभी जानवरों के बना देते हैं। टेक्नोलॉजी उपलब्ध है लेकिन सरकारों ने अभी आदमी की क्लोनिंग बैन कर रखा है।

   ऐसा कभी तो होगा ही. तब व्यक्ति का जन्म मृत्यु या भाग्य से कोई सम्बन्ध कैसे बनेगा? अभी माना जाता है की भगवान ही किसी को पैदा करता है. जिस समय पर शिशु अपनी पहली सांस लेता है, उस समय से उसके जन्म का आरम्भ होता है. पहली सांस वह तब लेता है जब जन्म के बाद उसकी नाड़ी काटी जाती है। 

   अगर लैब में किसी शिशु को क्लोनिंग से पैदा किया जाए तब क्या होगा? आजकल लोग सिजेरियन ऑपरेशन से बच्चे का जन्म समय खुद तय करने लग चुके हैं. ऐसा करने से क्या बच्चे का भाग्य बदल सकते हैं?

   इसी प्रकार से मृत्यु के समय को भी आधुनिक मेडिकल साइंस अपने कई मशीनों से आगे बढ़ाने में कामयाब हुईं है, कुछ घंटे या दिनों तक। लेकिन मृत्यु तो तय होती है.

    सिर्फ जिसके पास बहुत अधिक धन होता है वह वेंटिलेटर और कुछ मशीनों के सहारे कुछ घंटे या दिन मरे हुए की भांति ज्यादा दिन जबरदस्ती सांस ले पाता है. क्या इसका मतलब आज के जमाने में ज्योतिष और भाग्य के मायने बदल चुके?

  आजकल लोग स्त्रियां अपना एग और पुरष अपना स्पर्म या स्त्री पुरष जीगोट को मेडिकली सुरक्षित रखवा लेते हैं और अपनी मर्जी से जब चाहे तब गर्भ धारण करके बच्चा अपनी मर्जी से उत्पन कर लेते हैं।

    पहले मुझे कई लोगों ने जुड़वां बच्चों के भाग्य के विषय में ठगने की कोशिश की थी लेकिन मैने कई ऐसे केस पकड़ कर जुड़वा बच्चो के केस भी ढंग से हैंडल कर दिए थे। जुड़वां बच्चों में सबसे ज्यादा कठिन केस होमॉजीगोस जुड़वां बच्चो वाले होते हैं। हीटरॉजीगोस बच्चों का फिर भी आसानी से पता चल जाता है। 

     अगर आप ज्योतिष के जानकर हैं तो कृपया इस विषय पर सोचें और डिस्कस करें.

        क्या अपनी मर्जी से सिजेरियन ऑपरेशन द्वारा बच्चे का जन्म समय खुद तय करके उसका जन्म नक्षत्र और ग्रह स्थिति तय कि जा सकती है? इसका जवाब हमारे शास्त्रों में है। 

   जब मेघनाथ का जन्म होना था तब रावण ने ग्रहों को बांध कर रख दिया था ताकि मेघनाथ ऐसे ग्रह स्थिति में उत्पन हो की कोई भी उनका वध ना कर सके. तब शनि ने अपनी एक टांग  आठवें घर में घुसा दी थी।

   यह कुछ और नहीं बल्कि कहानी के रूप में यही स्थिति बताई गई है. उसी तरह आजकल की टेक्नोलॉजी के सहारे कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से बच्चे का जन्म समय खुद तय करके उसका भाग्य बदल देना चाहता है। ऐसा नहीं किया जा सकता बेशक बच्चे की जन्म कुण्डली अच्छे ग्रह बता रही हो. जिस नक्षत्र में गर्भ धारण होता है प्राकृतिक रूप से बच्चा  उसी नक्षत्र में जन्म लेता है। 

    मेडिकल साइंस के अनुसार कुल गर्भधारण का समय 280 दिन. मां के मासिक धर्म आने वाले दिन से।

   मां का मासिक धर्म आया तो 14 वे दिन एग रिलीज होता है। स्त्री 14 वे दिन बहुत कामुक और सुंदर लगती है.  उसको संभोग की बहुत इच्छा होती है. नेचुरली किसी भी स्त्री का मुख्य बायोलॉजिकल  जीवन का उद्देश्य संतान उत्पन्न करना ही होता है। वह गर्भरोधी उपाय अपनाए, सिर्फ़ मजे के लिए संभोग कराए, यह अलग बात है.  शायरी में भी चौदहवीं का चांद शब्द इस्तेमाल किया जाता है।

   उस एग की ओवरी से रिलीज होने के बाद 6 घंटे का लगभग समय फॉल्पियन ट्यूब के L शेप मोड़ तक पहुंचने में लग जाता है. वहां पर एग 12 घंटे लगभग दो नक्षत्रों का समय स्पर्म मिलने का इंतजार करता है : ठीक वैसे ही जैसे गली के मोड़ पर कोई लड़की अपने बॉयफ्रेंड के आने का इंतजार करती है। 

   मोड़ पर खंबे के नीचे वह दोनों और ध्यान रखती है अगर इस साइड से कोई जान पहचान का आया तो दूसरी तरफ छुप जाती है. यही काम एग सबसे पावरफुल स्पर्म को सेलेक्ट करने में लगाता है. मतलब नखरे करता है।

   अगर स्पर्म आया और एग फ़र्टिलाइज़ हो गया तो ठीक नहीं तो एग डेड होकर यूट्रस के रास्ते मासिक धर्म के साथ बाहर निकल जाता है। ठीक वैसे ही जैसे लड़की गली के मोड़ पर बॉयफ्रेंड का इंतज़ार करके थक कर घर वापिस निकल जाती है।

 यजुर्वेद में लिखा है : यथा पिंडे यथा ब्रम्हांडे। मतलब जो बाहर सब कुछ है वहीं हमारे अंदर भी है। इस केस में अगर लड़की की जान पहचान का कोई अंकल या आंटी उसे देख ही ले और उससे पूछ ले कि वह वहां क्यों खड़ी है तो लड़की कहती है वो ना मेरी सहेली आ रही है उससे मुझे एक किताब लेनी है। लड़की मन में गाली देती है कि बूढ़े या बूढ़ी को भी अभी ही आना था। सोचती है कि अंकल आंटी को उसने बेवकूफ बना दिया। 

  उसे क्या पता कि अंकल आंटी ने भी अपने समय वहीं सब खेल किया था जो वह लड़की अब कर रही है. उसी का नतीजा अंकल आंटी आज तक भुगत रहे हैं. वही भविष्य उस लड़की का भी होगा। 

  14.5 दिन मासिक धर्म के बाद ही एग फ़र्टिलाइज़ हो सकता है। मतलब 280-14.5= 265.5 दिन तक ही एग से बच्चा बन पाएगा। 

   चन्द्र का महीना 29.5 दिन का होता है. मतलब चंद्र 29.5 दिन में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है।

    अब 9 चन्द्र माह में दिन हुए 29.5×9= 265.5 हिसाब बराबर हुआ। बाईचांस अगर बच्चा सातवे माह में भी उत्पन हो जाए तब भी जन्म नक्षत्र वहीं होगा।

    इसका मतलब जिस नक्षत्र में एग फ़र्टिलाइज़ हुआ उसी नक्षत्र में बच्चा भी पैदा होगा। अगर कोई व्यक्ति सिजेरियन ऑपरेशन से बच्चे को अपनी मर्जी से आगे पीछे बाहर निकाल दे तो भी उसका जन्म नक्षत्र नहीं बदल सकता। 

   उस केस में अगर बच्चे की जन्म कुंडली देखनी हो तो फल तभी सही निकलेगा अगर मां की वो वाली मासिक धर्म की डेट पता होगी. नहीं तो ऐसे बच्चे की जन्म कुंडली का फलादेश कन्फ्यूजन पैदा करता है। अगर सिजरियन जन्म अपनी मर्जी से ना करके नेचुरल कारणों से हो तब यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती। 

     आधुनिक विज्ञान से अगर किसी ने एग या स्पर्म  लैब में सुरक्षित कर लिया हो तो भी मां कि उस मासिक धर्म की तिथि की जरूरत होगी जिस मासिक धर्म के बाद निकला एग उस मां ने लैब ने सुरक्षित रखा था। यह पता करना पड़ेगा कि उस मासिक धर्म की डेट के 14.5 दिन बाद कौन सा नक्षत्र था। चाहे उस एग से बच्चा सौ साल बाद ही पैदा क्यों ना किया जाय। 

     यही बात अगर कल को लैब में ही चाहे बच्चे क्यों ना उत्पन किए जाएं लागू होगी।

क्या मेडिकल साइंस किसी की मृत्यु को आगे बढ़ा सकता है?

  वेदों और उपनिषदों में प्राण दस प्रकार के कहे गए हैं। इनमे पांच मुख्य और पांच उप प्राण कहे गए हैं :

   (1) अपान (2) समान (3) प्राण (4) उदान (5) व्यान। 

    उपप्राणों को (1) देवदत्त (2) वृकल (3) कूर्म (4) नाग (5) धनंजय नाम दिया गया है।

   मैं इनकी डिटेल में नहीं जा कर सिर्फ इतना बताना चाहता हूं कि ये प्राण हमारे शरीर के अलग अलग अंगों का नियंत्रण करते हैं।

    जैसे धनंजय प्राण हमारे हृदय के धड़कने पर कंट्रोल करता है। अब मेडिकल साइंस आधुनिक यंत्रों मशीनों से इन प्राणों को कुछ हद तक कंट्रोल कर सकता है मतलब इनके चलने का समय बढ़ा सकता है।

    लेकिन इन प्राणों में स्थित एक आत्म तत्व होता है जो सभी दसों प्रकार के प्राणों के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। यह आत्म तत्व वहीं होता है जिससे हम अपने होने का अहसास रखते हैं। अगर हमारा यह अपने होने का अहसास समाप्त हो जाए तो यही मृत्यु कहलाती है। 

आपका दिल या किडनी निकाल कर किसी और में ट्रांसप्लांट कर दिया जाए तो उस अंग से जुड़ा प्राण आपके मरने के बाद भी जीवित रहेगा लेकिन उसमें आप अपने होने का अहसास नहीं कर सकतें। जबकि आपका धनंजय प्राण अभी भी किसी और के शरीर में जीवित है।

    इसी प्रकार से जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो ये दस प्रकार के प्राण एक साथ नहीं निकलते। मृत्यु के बाद भी जैसे आखें कई घंटों तक जीवित रहती है मतलब आखों के प्राण जो कूर्म प्राण कहलाते है आपके मरने के कई घंटों के बाद तक जीवित रहते हैं. अगर ये आंखें किसी और को ट्रांसप्लांट कर दी जाए तो आपके कूर्म प्राण कई और वर्षों तक जीवित रह सकते हैं। 

     अतः मृत्यु का संबध किसी अंग या सारे अंगों के जीवित रहने से बिल्कुल नहीं है। इसलिए आधुनिक मेडिकल साइंस सिर्फ अपने आधुनिक यंत्रों और मशीनों से सिर्फ इन अंगों की आयु बढ़ा सकते है। आपके जीवन और मृत्यु के समय को परिवर्तित नहीं कर सकते। 

     आत्म तत्व या अपने होने के अहसास को ही जीवित रहना कहते हैं। जब जब भी यह अहसास समाप्त ही जाता है हमारी मृत्यु हो जाती है। कई बार हमारी जीवन में टेंपररी मृत्यु भी होती है. अगर उस समय हमारा शरीर या बाकी दस प्राण सही सलामत हों तो हमारा उसी शरीर में कई बार पुनर्जन्म भी होता है। 

     अगर किसी बार हम किसी कारण अपने होने का अहसास खो देते हैं और इसी बीच हमारे ये दस प्रकार के प्राण समाप्त हो जाए तो हम दुबारा से उस शरीर में नहीं आ पाते।

    इसलिए ज्योतिष में हमारा कई बार पुनर्जन्म एक ही शरीर में लिखा होता है और हम उस समय को कहते हैं कि मारक समय चला हुआ है। 

     इसलिए मैं लोगों से कहता हूं कि जितना मर्जी बुरा समय चला हो हिम्मत ना हारे और अपने शरीर को पुष्ट रखें। 

     जब जब भी हमारे अपने होने का अहसास समाप्त होता है या इस अहसास में कोई डिस्टर्बेंस आती है उस समय हमारे असली प्राण या अपने होने का अहसास जो जीवन चलाए रखने के लिए जरूरी है।

    हमारे बाकी दस में से कई प्राण भी आउट ऑफ कंट्रोल हो जाते हैं और हम बीमार पड़ जाते हैं। अगर कल को मेडिकल साइंस इस काबिल हो जाए कि हमारा दिमाग भी किसी और में ट्रांसप्लांट कर दे तो सारा ज्ञान , सारी जानकारी तो दूसरे के शरीर में जीवित रहेगी लेकिन आपके अपने आप के होने का अहसास तब भी ट्रांसफर नहीं हो सकता। वह मर जाता है।

     जैसे भगवान शिव ने गणेश जी का सिर हाथी के सिर से बदल दिया लेकिन हाथी का अपने होने का अहसास गणेश जी में नहीं आया बल्कि गणेश जी का ही अस्तित्व उस शरीर में बना रह।

     इसीलिए याद रखे आप के होने का अपना अस्तित्व का अहसास ही आपको खुश या दुखी करता है। यह संसार तभी है जब आप खुद हो। अगर आप खुद ही नहीं होते तो यह संसार भी नहीं होता ना अपने ना बेगाने ना समाज ना धर्म ना खुदा ना भगवान।

     इसी लिए वेदों में लिखा है कि अपने को ही ब्रम्ह समझो अपने को भगवान भगवान। क्योंकि आप अगर हो तभी सब कुछ है नहीं तो कुछ हो या ना हो कोई मतलब नहीं। 

  फिर पूजा अर्चना करने का क्या मतलब?

  पूजा अर्चना कि विभिन्न विधियों से हम अपने इन दस प्रकार के प्राणों को बल दे सकते हैं जिससे हम स्वस्थ रूप से अपने अस्तित्व से इन दस प्रकार के प्राणों को कंट्रोल कर सकते हैं। 

   जब हम किसी शक्ति पर विश्वास करके उसकी मूर्ति स्थापित करके उस पर ध्यान लगाते हैं तो हमारी अपनी ही ऊर्जा वापस हम पर ही फोकस हो जाती है जो ऊर्जा सांसारिक कारणो से बर्बाद हो रही होती है।  

   हम अपने को ऊर्जावान कर लेते हैं और अपने अस्तित्व को ज्यादा मजबूत बना लेते हैं। किसी भी भगवान की मूर्ति या मंदिर पर विश्वास करके असल में हम अपने खुद पर ही ज्यादा विश्वास करने लग जाते हैं। एक प्रकार से किसी भी भगवान की मूर्ति हमारी खुद पर श्रद्धा ही होती है।

  प्रश्न उठता है कि अगर जीवन सिर्फ एक बायलॉजिकल प्रोसेस है तो इस संसार में मैं जीऊं या मरुं क्या फर्क पड़ता है? अगर इस संसार को चलाने वाला कोई नहीं या मेरा अपना कोई नहीं तो इस संसार में जीने का क्या मतलब?

     हमारे वेद कहते हैं कि जिन नियमों के तहत संसार की सारी वस्तुएं चलती हैं पृथ्वी सूर्य के चारों ओर सौर मंडल गैलक्सी के चारों ओर। हम भी उन्हीं नियमों के अनुसार जीते मरते हैं. 

   भगवान वही है जिसने ये नियम बनाए हैं। हम इन्हीं नियमों में बंधे है। 

    इन्हीं नियमो ग्रह स्थिति जन्म नक्षत्र के आधार पर अध्ययन करके किसी का भविष्य फल निकाल लेना ही ज्योतिष है। 

    मैने हजारों जन्म कुंडली का अध्ययन करके पाया है कि जिस नक्षत्र में एग फ़र्टिलाइज़ होता है,  गर्भ धारण उसी नक्षत्र में जन्म होता है और उसी नक्षत्र में मृत्यु।

  मेडिकल साइंस द्वारा जब धनंजय प्राण का त्याग होता है तभी मृत्यु घोषित की जाती है।

  सबसे बड़ा प्रश्न है : मै कौन हूं, कहां से आया हूं, किसलिए आया हूं, मुझे क्या करना है, कहां मुझे जाना है?

   यह बातें अपनी बीवी से फोन पर मत कह देना। नहीं तो जवाब मिलेगा तू मेरे बच्चों का बाप है, तू अभी कुछ देर पहले घर से बाहर आया था, तुझे सब्जी लानी है, और जल्दी से घर वापिस आना है। अब जल्दी से घर वापिस आ जाओ बाकी का ज्ञान तुम्हे घर वापिस पहुंचने पर देती हूं। 

    चलो अब सीरियस हो जाते हैं। यह प्रश्न हम को बहुत उलझाते हैं। जैसा कि मैं लिख चुका हूं कि हमारे में कुल दस प्रकार के प्राण होते है :

    5 मुख्य प्राण हैं (1) अपान (2) समान (3) प्राण (4) उदान (5) व्यान। 

उपप्राणों को (1) देवदत्त (2) वृकल (3) कूर्म (4) नाग (5) धनंजय नाम दिया गया है।

     लेकिन ये प्राण सिर्फ हमारे अंगों को चलाए रखने के लिए जरूरी है। इनको एक सामंजस्य से चलाए रखने के लिए एक आत्म तत्व या आप के होने का अहसास बहुत जरूरी है। 

    यह जो आप के अस्तित्व का अहसास है यही आत्म तत्व है। यह आत्म तत्व ही ब्रह्म या भगवान है।

    जैसा तू वैसा मैं यह हमारे शास्त्रों वेद और उपनिषदों में लिखा है। अब तुझे अपने इन दस प्राणों को चलाने में कई वस्तुएं बाहर के विश्व से लेनी पड़ती है जैसे सांस लेने के लिए वायु। 

    इसलिए वेदों में कहा गया है कि बाहर से जो भी वस्तु तू अपने इन प्राणों कि चलाए रखने के लिए लेता है तुझे उन सभी वस्तुओं के दाता को सम्मान देना है.

    यह प्रकृति का तुम पर कर्ज है और अपने जीवन में अपने कर्मों से तुझे ये सारे कर्ज चुका कर ही जाना है। चाहे इच्छा से चुका या अनिच्छा से।

    तू एक आत्म तत्व है और आत्म तत्व ही रहेगा बाकी यहीं से लिया है यहीं चुका कर जाना है। तेरे पास शुरू में शून्य था बाद में भी तेरे पास शून्य ही रहेगा। जिस नक्षत्र में गर्भ में आया उसी नक्षत्र में जन्म लेगा और उसी नक्षत्र में शरीर छोड़ेगा। 

     जब कोई बच्चा मां के गर्भ में होता है तो उस बच्चे में सांस लेने की क्षमता नहीं होती जैसे ही वह गर्भ से बाहर आता है तो वह प्रकृति से खुद सबसे पहले वायु से सांस लेता है।

     इसका मतलब वायु प्राण जिससे उसके फेफड़े काम करते है वह प्राण उसे मां के गर्भ से बाहर आने पर ही मिलते हैं। उससे पहले नहीं। लेकिन जब उसमे वायु प्राण गर्भ में नहीं थे तब भी उसमे एक आत्म तत्व मौजूद था। 

     जब वह अभी ज़्यगोट ही था, तब ना उसका हृदय था ना दिमाग ना कोई खून ना मांस ना कुछ. मतलब उपर लिखित दस प्राणों में उस बच्चे में कोई भी प्राण नहीं था लेकिन आत्म तत्व तब भी था। 

     मैं कौन हूं इस प्रकार के प्रश्न सिर्फ आपका दिमाग पूछ रहा है आप का आत्म तत्व या आप के होने का अहसास यह प्रश्न कभी नहीं पूछता। यह दस प्रकार के प्राण ही एक तरह से दस शक्तियां या महाविद्याएं हैं। 

      वेदों में लिखा है तू वहीं है जो वो है मतलब भगवान। तू खुद ही ब्रम्ह है। सिर्फ इन दस प्राणों के कारण तू इन सभी प्रश्नों के मायाजाल में उलझा है और कुछ नहीं। तू भी और मैं भी ब्रह्म या भगवान ही है। ना तू कहीं से आया है ना तुझे कहीं जाना है तुझे इन्हीं नक्षत्रों के अनुसार तरह तरह की देह धारण करनी है बार बार छोड़नी है। यह एक अंतहीन प्रक्रिया है। 

       जैसे जितने तारे है जिनमे कार्बन नाइट्रोजन ऑक्सीजन CNO न्यूक्लियर साइकिलिक रिएक्शन चलता रहता है जिससे यह ब्रम्हांड चलता है। जिसको हम इंटरस्टेलर ऊर्जा कहते है। जब ब्रह्माण्ड बना होगा ये सब चीजें भी बनी होगी। 

     उसी समय यह आत्म तत्व भी बना। जब तक ब्रह्माण्ड का अस्तित्व है तेरा अस्तित्व भी कायम है। इसलिए चैन से बैठ इन फालतू प्रश्नों के मायाजाल में मत उलझ जो कर्म करने को मिला है चुपचाप करता जा। 

    खुशी से कर या दुखी होकर कर मर्जी तेरी। इसलिए मौज करते हुए जो जीवन मिला है और बार बार मिलेगा इसको चैन से जी लेे। इस माया में आया है तो माया से खेल लेे ढंग से।

    जब कभी यह ब्रह्माण्ड समाप्त होगा तेरा आत्म तत्व भी समाप्त होगा। लेकिन जब ब्रह्माण्ड दुबारा बनेगा तेरा आत्मतत्व भी दुबारा बन जाएगा। तू भी वही मैं भी वही। 

   तू इसी प्रकृति का अभिन्न अंग है तू क्यों इधर उधर की बातें सोच कर इस प्रकृति से दूर होना चाहता है। अगर चाहता भी है तो भी कहीं नहीं जा सकता ना कोई तुझे कहीं और ले जा सकता है। 

   तू इन चांद सितारों के गति के अनुसार अपना कर्म करेगा। अब इन्हीं चांद सितारों की गति की गुणा भाग करके ज्योतिष ज्ञान द्वारा तुम्हारा कर्म और दिशा क्या होगी यह ज्ञात किया जा सकता है। (चेतना विकास मिशन).

Exit mobile version