नगरीय निकाय चुनाव भी संजीदगी से लड़ने वाली भाजपा के वनस्पत कांग्रेस बड़े चुनाव को भी हल्के मे लेती है
राकेश चौकसे बुरहानपुर
हमारे देश के वार्षिक कलेंडर का गणित चुनावो के इर्दगिर्द ही रहता है, पंचायत से लेकर नगरीय, जिला, जनपथ के बाद, समिती संगठनो के होंने वाले चुनाव और उप चुनाव देश की नियति बन चुके है। जिसका ख़ामियाजा गरीब जनता को भुगतना पड़ता है। ताजा घटनाक्रम हिमाचल कांग्रेस के राजनेतिक परिशिष्ट इसी पर आकर टिक गया है ,यहां प्रदेश मे होने वाले चुनाव मे प्रियंका वाड्रा द्वारा कुछ सभाएं ली गई थीं चुनाव परिणाम पार्टी के पक्ष मे आने और सरकार बनाने का श्रेय श्रीमति वाड्रा को दिया गया था। किंतू पिछले तीन से उपजे नाटकीय घटनाक्रम से वाड्रा का गायब रहना संशय पैदा करता है ! मीठा मीठा गप गप और कडवा कड़वा थू थू!

हिमाचल का दूसरा राजनेतिक पहलु स्वर्गीय वीरभद्र सिंह पर आकर टिकता है । क्षेत्र मे राजनितिक बिसात क्षेत्र के विकास के वादे के बूते सत्ता की दहलीज पर पहुंची कांग्रेस हाईकमान ने वीरभद्र की धर्मपत्नी विभा सिंह के साथ समय पर इंसाफ किया होता और पुत्र विक्रमादित्य को मंत्रीपद से नवाजने के बाद तवज्जो दी होती तब स्तिथि आज भिन्न होती। मां विभा बेटे विक्रमादित्य के साथ स्वर्गीय मुख्यमंत्री के साथ हिमाचल के 40 विजय विधायक का मर्म समझते तब आज इस पायदान पर आने से बच सकते थे। आख़िर क्यो कांग्रेस का वरिष्ट नेतृत्व गांधारी का आवरण ओड 40 विधायको के आंखो के आजू बाजू मे पट्टी लगा समझ रहा था ? क्या वरिष्ट नेतृत्व समझ रहा था जैसे टांगे मे जूते घोड़े की आंख के आजू बाजू मे पट्टी लगीं होने से आजू बाजू का कुछ नही दिखता घोड़ा सीधा चलता है उसी प्रकार हिमाचल के विधायक है उन्हे भी अपने इशारों मे चलाया जा सकता है और विधायक पार्टी अनुशासन का अनुसरण करेगे! पर ऐसा हुआ नही।
तीसरा पहलु चुनाव प्रबंधन (वर्किंग कार्य समिती) को पूर्व मे ही आभास था पार्टी और सरकार मे सबकुछ ठीक ठाक नही है। मां विभा बेटे विक्रमादित्य के बाद राजेंद्र राणा तीसरे ऐसे विधायक है जिसने चुनाव मे हिमाचल का सबसे कठिन पेपर प्रेम कुमार धूमल को हराकर हल किया था। किंतू इस बडी जीत पर इन्हे मंत्री पद का तमगा देने के बजाए नज़र अंदाज़ करना पार्टी की बडी भूल रही है। आज यह भी विरोध मे दिखाईं दे सकते है! हिमाचल 68 विधानसभा क्षेत्र मेसे 40 पर कांग्रेस 3 सीटो पर निर्दलीय और भारतीय जनता पार्टी 25 सदस्यो के साथ विपक्ष मे बैठी होने के बाद भी खुद के भविष्य को लेकर मुस्तैद रही इसका सकारात्मक परिणाम उसे राज्यसभा चुनाव मे देखने को मिला। भारतीय जनता पार्टी 2 सांसदों के बूते जमीन के तलाश मे निकली थीं आज पूर्ण बहुमत की सरकार के साथ देश की सत्ता मे सबसे बडे घटक दलों के साथ 2024 के चुनाव मे कूदने की तैयारी मे है वहीं देश की सबसे बुजुर्ग पार्टी कांग्रेस 403 सीटो पर काबिज रहने के उपरांत 2019 तक विपक्ष मे बैठने के लिए 55 सीटो पर जीत की जुगत जमाने के लिए प्रयास करती नजर आ रही थीं! आख़िर क्यो
राज्य सभा की एक सीट सत्ता का बलिदान लेने को आतुर है ? पूर्वनिधारित आकलान के अनुसार मोदी अबकी बार 400 पार के दूरस्थ लक्ष्य को साधने के लिए दृढ़ संकल्पित नजर आ रहे है। वही राज्यसभा के लिए सबसे सुरक्षित सीट हिमाचल से सोनिया को राजस्थान के और कुच करना पड़ा तात्पर्य सीधा है हिमाचल मे होने वाली गड़बड़ी का भान पार्टी नेतृत्व को पहले से ही था। क्या कांग्रेस पुरानी कांग्रेस और नई कांग्रेस मे बदल रही है ? इंदिरा कांग्रेस मे निर्णय लेने की क्षमता थी अतीत मे जाए और इनके शासन काल को देखे तो भारतीय संविधान की धारा 356 की मूल भावना के उलट काम किया गया था! इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के दो कार्यकाल 1966 -1977 और 1980 – 1984 के बिच राज्यो से गैर कांग्रेसी सरकारो को हटाया गया है। पश्चिम बंगाल के बाद तमिलनाडु मे 31 जनवरी 1976 करुणानिधि की चुनी हुई सरकारों को अपदस्थ करने से लेकर अनेक निर्णय है जिनको लेने की क्षमता इंदिरा के साथ तत्कालीन नेताओ मे थी नेताओ का यही एक साहस था राज्य सरकारो पर केन्द्र तिरछी नजर रखता था।
अतीत को कुरेदने के बजाय हम 2024 पर आते है सोनिया, राहुल के साथ बहन प्रियंका वाड्रा की राजनीती आभासी सच और अर्ध सत्य परोसने की असीम ताकत के बूते चल रही है। जिसका नुकसान हिमाचल कांग्रेस को उठाना पड़ रहा है। यहां की कांग्रेस दो घड़े मे बटती नजर आ रही है। एक घड़ा प्रतिभा सिंह का इन्हे 20 विधायको का समर्थन मिलता दिखाईं दे रहा है। पुरे घटनाक्रम के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्कू नप गए , सोनिया का पलायन राज्यसभा के लिए करना पड़ा,अभिषेक मनु सिंघवी कांग्रेस वर्किंग समिती मे होने के साथ साथ वरिष्ठ वकील भी है 34 – 34 के टाई और ड्रा मे मात खाकर हिमाचल पार्टी के राज्य के राजनितिक भविष्य पर ग्रहण के साथ फस गई है।
2 से 375 के सफर पर निकलने वाली भाजपा ने कांग्रेस को हिमाचल मे राज्यसभा में अटका दिया है वहीं गाँधी क्षत्रप राहुल, प्रियंका और सोनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया 543 मे से हम कहा सुरक्षित। सोनिया राज्यसभा की कुर्सी पर सवार हो खुद का भविष्य पहले ही सुरक्षित कर रखी है। श्रीमती वाड्रा और राहुल जमीन तलाश रहे है।