विजय दलाल
मोदी समर्थक मीडिया अल्प 21 माह के इंदिरा जी के आपातकाल का शौर मोदी सरकार के 9 साल में लोकतंत्र, संविधान और धर्मनिरपेक्ष विरोधी किए गए लगातार कारनामों को छुपाने के लिए कर रहा है। मैं कोई आपातकाल का समर्थक नहीं हूं।
मैंने भी उस दौरान मेरे नाना बिड़ला ग्राम के यूनियन नेता और एक बार नागदा से कम्युनिस्ट विधायक रहे भैरव भारतीय जी को खोया हैं। लेकिन मोदीजी के कारनामों के बाद तुलनात्मक अध्ययन और विश्लेषण करने के बाद अंतर स्पष्ट नजर आता है।
संविधान के प्रावधान के तहत् पार्टी और उसके बाहर के दक्षिण पंथी ताकतों से निपटने के लिए केबिनेट से मुहर लगवा कर केवल 21 माह के लिए आपातकाल लगाया था। उस दौरान कोई भी जनविरोधी कानून या नीतिगत फैसले नहीं लिए। संघीय व्यवस्था को नुकसान पहूंचाने वाला कोई निर्णय नहीं लिया। न ही न्याय व्यवस्था और न ही मीडिया को अपने कब्जे में करने की कोशिश की। न ही नागरिक अधिकारों को इस काल की तरह बड़े पैमाने पर कुचला गया। न मोदी सरकार की तरह अपने काम के लिए न तो धर्म और जाति को एक दूसरे से लड़ाकर अपने राजनीतिक निहित स्वार्थों को करने की कोशिश की।
इन सब बातों का प्रमाण यही है कि पुनः चुनाव करवा कर हार स्वीकार की। वह महिला राजनीतिज्ञ के रूप में देश में ही नहीं विश्व में एक साहसिक आदर्श महिला की तरह जानी जाती थी।
इन कभी ट्रंप और कभी बाइडेन नमस्ते करने वालों और उनके समर्थकों को याद दिला दें। बीसवीं सदी का सबसे बड़ा मिलिट्री सरंडर इंदिरा गांधी के शासनकाल में बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन के युद्ध में हुआ। वो फर्जी सर्जिकल स्ट्राइक नहीं थी।
जब अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने उन्हें धमकाने का प्रयास किया तो उसकी परवाह नहीं पाली और सलाह मानने से इंकार कर दिया।
कहां इंदिरा गांधी जी और कहां यह मोडानी। कोई इनसे पूछे कश्मीर के बालाकोट में 40 सैनिक कैसे मारे गए? उनके पास 300 किलो RDX कैसे पहुंचा?
370 में केवल 70 ही कम था।
कश्मीर से 370 हटाने के बाद भी अभी भी हर दूसरे दिन* आतंकवादी घटना के समाचार आते हैं। *बेचारे फिलीस्तीन नहीं बना सके!*
जिस इंदिरा जी ने पंजाब के आतंकवाद और खालिस्तान के विरोध में अपनी जान कुर्बान कर दी। आज मणिपुर वैसे ही सवालों पर जल रहा है। देश के प्रचारमंत्री को फुर्सत नहीं है। छवि बनाने अमेरिका और मिश्र की यात्रा पर हैं।
विजय दलाल

