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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तोड़े मंत्री-नेता पुत्रों के सपने

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प्रदेश में हावी होती अफसरशाही पर शिवराज सरकार को नड्डा की दो टूक*

*विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन*

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जेपी नड्डा के भोपाल दौरे लेकर पिछले कुछ दिनों भारतीय भाजपा के प्रादेशिक नेताओं से लेकर स्थानीय नेता खासे उत्साहित थे। आयोजन को लेकर पिछले कई दिनों से खासी तैयारियों पर काम किया जा रहा था जिसमें लाखों रुपये खर्च भी किये गये। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अपने भाषण के दौरान उत्साह में डूबे भाजपा के वे नेता जो अपने बेटों को विधायक बनाने के सपने देख रहे थे उनके सपनों को विराम लगा दिया। दरअसल नड्डा से स्पष्ट करते हुए दो टूक कहा कि भारतीय जनता पार्टी को हार मंजूर है, लेकिन परिवारवाद नहीं। यही वजह है कि पार्टी ने तय किया है कि नगरीय निकाय और आगामी विधानसभा चुनाव में नेता पुत्रों को टिकट नहीं दिया जायेगा। नड्डा के इस बयान के बाद प्रदेश भाजपा में खलबली सी मच गई है। ऐसा माना जा रहा है कि प्रदेश के ऐसे नेता जो पूरे उत्साह के साथ आगामी विधानसभा चुनाव में अपने बेटों के टिकट की दावेदारी पेश कर रहे थे उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। खैर, देखने वाली बात यह है कि नड्डा के इस कथन पर प्रदेश भाजपा के नेता कहां तक अमल करते हैं और प्रस्तावित नगरीय निकाय और आगामी विधानसभा चुनाव में इस कथन को कहां तक फॉलो किया जाता है।

*मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सबके सपने अधूरे*

नड्डा के बयान ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर प्रदेश सरकार के मंत्रियों तक के सपनों को तोड़ दिया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद अपने बड़े बेटे कार्तिकेय सिंह चौहान को प्रोजेक्ट करने की योजना पर काम कर रहे थे। वहीं, हाल ही में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी अपने बेटे महाआर्यमान को राजनीति के इस खेल में उतारने का फैसला किया। अपने बच्चों को विधायक बनाने का सपना संजो रहे मंत्रियों की सूची काफी लंबी है। इसमें गोपाल भार्गव, गौरीशंकर बिसेन, नरोत्तम मिश्रा, प्रभात झा, नरेंद्र सिंह तोमर, सुमित्रा महाजन, जयंत मलैया, सूर्यप्रकाश मीणा, जैसे नेता शामिल हैं, जो अपने बेटों को विधायक बनाने का सपना लंबे समय से संजोय हुए थे और इसी दिशा में लगातार कार्य कर रहे थे।

*भाजपा ने सही राह पकड़ी है*

देश में इतनी राजनीतिक पार्टियों में देखा जाए तो भारतीय जनता पार्टी ने नेता पुत्रों को प्राथमिकता न देने का जो फैसला किया है वो पार्टी की नीतियों को साफ तौर पर प्रदर्शित करता है। इस फैसले के पीछे पार्टी की उद्देश्य है कि लोकतांत्रिक देश में सभी को समान अवसर मिलना चाहिए जो कार्यकर्ता जितना अच्छा परिश्रम करेगा टिकट के लिए वही दावेदार होगा। सिर्फ पिता-दादा-चाचा आदि के मंत्री, विधायक होने के नाम पर टिकट प्राप्त करना ठीक नहीं। इस तरह की परंपरा से जमीनी स्तर पर मेहनत करने वाले कार्यकर्ता को आगे बढ़ने में काफी कठिनाईयां होती है। लेकिन भाजपा की इस पहल के बाद अब जमीनी कार्यकर्ता के लिए आगे बढ़ने के रास्ते खुल गये हैं।

*अफसरशाही पर बोलने से नहीं चूके नड्डा*

मध्यप्रदेश में अफसरशाही सरकार पर हावी है इस बात को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इस बात का आंकलन करते हुए भाजपा नेताओं की बैठक में स्पष्ट कहा कि मंत्रियों को बायपास करके मुख्यमंत्री से अफसरों का सीधे मिलना उचित नहीं। इससे जनता के सामने नेताओं की कमजोर छवि प्रतीत होती है और नेता भी जनता के कार्य करवाने में असक्षम साबित होते हैं। इसलिए बेहतर तरीका यही है कि अफसर सिर्फ विभागीय मंत्री तक सीमित रहे, सीधे मुख्यमंत्री से मिलना जरूरी नहीं।

*शिवराज के कार्यकाल में बढ़ी अफसरशाही*

देखा जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं कि मध्यप्रदेश में अफसरशाही शिवराज सरकार आने के बाद हावी हुई है। आलम यह है कि जनता के प्रतिनिधि नेता-मंत्रियों की बात भी अफसर नहीं सुनते। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मंत्री खुद मुख्यमंत्री से इस बात की शिकायत कर चुके हैं कि उनके विभाग के अफसर उनकी कोई बात नहीं सुनते। इकबाल सिंह बैस, मो. सुलेमान, संजय दुबे, एम. सेलबेंद्रम, मनीष रस्‍तोगी आदि ऐसे अफसर हैं जो अपने आपको सबसे बड़ा मानते हैं। इन जैसों अफसरों के कारण ही बात आज जेपी नडडा तक पहुंची है। मध्यप्रदेश में हावी अफसरशाही से पूरा देश अच्छी तरह से परिचित हैं। लंबे समय बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार के समय अफसरशाही थोड़ी धीमी पड़ गई थी। कांग्रेस के मंत्री और मुख्यमंत्री ने अफसरों को एक हद तक सीमित कर रखा था। विपक्षी दल कांग्रेस ने कई बार स्पष्ट तौर पर यह आरोप भी लगाये हैं कि प्रदेश भाजपा अफसरशाही से दब गई है। निचले अधिकारी-कर्मचारियों की बात कोई सुनने को तैयार नहीं। यही कारण है कि कर्मचारी भाजपा शासन से पूरी तरह से निराश दिखाई दे रहे हैं। अगर भारतीय जनता पार्टी और शिवराज सरकार ने अभी से अफसरशाही को कम करने की कोशिश नहीं कि तो आगामी विधानसभा चुनाव में निचले स्तर के अधिकारी-कर्मचारी ही प्रदेश में गेम चेंजर साबित हो सकते हैं।

*कांग्रेस सीक्रेट सर्वे कराये तो चुनावों में लाभ होगा*

शिवराज सरकार में तृतीय और चतुर्थ कर्मचारियों में काफी असंतोष है। क्‍योंकि इस सरकार में इस श्रेणी के कर्मचारियों को अपनी मांगों पर हमेशा आश्‍वासन के अलावा कुछ नहीं मिला है। प्रदेश में इनकी संख्‍या लाखों में है। और सबसे बड़ी बात ये है कि सभी कर्मचारी यूनियनों में एकता है, जो निश्चित रूप से किसी एक पार्टी को सीधा सपोर्ट करते हैं। यदि कांग्रेस पार्टी प्रदेश में एक सीक्रेट सर्वे कराती है तो आने वाले सभी चुनावों में काफी लाभ होगा। इस सर्वे में वह बारिकियां भी सामने आयेगी जो कहीं न कहीं बीजेपी की कमजोरियों को उजागर करेंगी। जनता के काफी असंतोष से कांग्रेस को लाभ मिलना निश्चित है।

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