-परीक्षित मिश्रा
कस्तूरी मृग के बारे में सब जानते ही होंगे। जंगल में वो पगलाए घूमता रहता है। यहां से वहाँ वहां से यहां। लेकिन, जिस कस्तूरी की खुशबू के लिए वो यहां से वहां मदमस्त घूमता है वो उसके शरीर के अंदर ही होती है। ये ही हाल भाजपा और आरएसएस का है।
विश्व इतिहास में सम्राट अशोक से बड़ा साम्रज्य और उनसे ज्यादा विदेशों में कीर्ति फैलाने वाला शासक शायद ही कोई रहा हो। सबसे पहले वो हिन्दू थे (ये बात अलग है कि खुद सावरकर हिंदुत्व में लिखते हैं कि भारत के संस्कृत या पाली भाषा के किसी ग्रन्थ में हिन्दू शब्द नहीं मिलता, ये नामकरण विदेशियों द्वारा दिया हुआ है), दूसरा अटक से कटक तक उनका साम्राज्य विस्तार इतना विस्तृत था कि इनके बाद किसी भी हिन्दू राजा ने ये ख्याति और ये चक्रवर्ती तमगा हासिल नहीं किया। इसके बाद भी आरएसएस और भाजपा को अशोक का विकल्प ढूंढने की जरूरत क्यों पड़ रही है? ये वाकई विमर्श का विषय होना चाहिए है?
नन्द वंश को समाप्त कर चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य वंश की स्थापना की। चाणक्य उनके ही गुरु थे। चंद्रगुप्त मौर्य ने ही पाटलिपुत्र पर आधिपत्य स्थापित करने के बाद मौर्य वंश का विस्तार बंगाल की खाड़ी से अफगनिस्तान और उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक तक कर दिया था। वो एक ऐसे राजा भी थे, जिनका जिक्र ईसा पूर्व 324 में यूरोप में विस्तृत ग्रीक और रोमन एम्पायर के ग्रंथों में भी मिलता है। इसके बावजूद आरएसएस या भाजपा के प्रवक्ताओं के मुंह से हिन्दू राजाओं के जिक्र के दौरान मुंह से नहीं फूटता।
चंद्रगुप्त मौर्य के बाद बिंदुसार ने चंद्रगुप्त के शासन को न सिर्फ बनाये रखा बल्कि उसका विस्तार पर्शिया तक और दक्षिण भारत तक किया। वर्तमान केरल और तत्कालीन कलिंग को छोड़कर कोई ऐसा हिस्सा नहीं था जो उसके राजवँश से बाहर हो।
फिर 273 ईसा पूर्व में आये उनके पुत्र अशोक। चंद्रगुप्त मौर्य और बिंदुसार द्वारा बनाये भू क्षेत्र का अशोक ने विस्तार दिया। कलिंग समेत भारत के वर्तमान केरल और तमिलनाडू के छोड़ सम्पूर्ण भारत के अलावा वर्तमान अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश तक के देश भी अशोक ने फतह कर लिए थे। आरएसएस जिस अखंड भारत का नक्शा अपने प्रतीक के रूप में दिखाती है वो क्षेत्र अशोक के अलावा किसी दूसरे राजा ने फतह नहीं किया।
अशोक के समय में भारत 50 लाख किलोमीटर क्षेत्र में फैला था। जो वर्तमान में करीब 32 लाख किलोमीटर तक है। यानी आज से डेढ़ गुना बड़ा भारत। यहां तक कि औरंगजेब भी भारत को इतने बड़े भूभाग को फतह नहीं कर पाया जितना अशोक ने किया। इसके बाद भी हिन्दू माचोमैन के रूप में अशोक की बजाय दूसरे राजाओं को ढूंढने की जरूरत भाजपा और आरएसएस को क्यों तोड़ रही है।
ऊपर दिया परिचय क्षत्रिय अशोक का है। कलिंग युद्ध के बाद सन्यासी अशोक ने तो भारत को और भी आगे तक बढ़ा दिया। अशोक ने ऐसे नियम बनाए जिसमें इंसान और जानवरों दोनों के प्रति हिंसा निषेध थी। इसे अशोक की राज विज्ञप्ति (एडिक्ट) कहते हैं। इनका अनुवाद ग्रीक और आरामाइक भाषाओं में भी हुआ।
विश्व इतिहास में आज भी अशोक की इन राज विज्ञप्तियों को मानवाधिकारों को लेकर पहली अंतर राष्ट्रीय घोषणा माना जाता है। यूनाइटेड नेशन से भी पहले अशोक शांति को अपने देश से बाहर पहुंचा ने वाले विश्व के पहले सम्राट थे। उन्होंने अपने शासन काल मे बौद्ध दूतों को उस समय ज्ञात दुनिया के हर देश तक भेजा। वो वियतनाम, श्रीलंका, और मेडिटेरेनियन तक के देशों तक पहुंचे।
इतनी दूर तक कोई मुग़ल शासक कभी नहीं पहुंच सका था। पुराण के अलावा, जैन, बौद्ध, ग्रीक, रोम, सीरिया तक के तत्कालीन ग्रंथों में अशोक का नाम मिलता है। विश्व में भारत का नाम इतना उच्च शिखर पर पहुंचाने के बाद भी अशोक या चंद्रगुप्त मौर्य आरएसएस और भाजपा के पोस्टर आइकॉन के रूप में क्यों नहीं होते?
मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य थे। मौर्य उनकी माता मूरी से उधृत है। उन्हें सर्वहारा वर्ग का माना जाता है। ऐसे में चंद्रगुप्त मौर्य किसी इलीट जाति से न होकर सर्वहारा वर्ग से थे। तो ऐसे में पूरा मौर्य वंश ही सर्वाहारा वंश से माना जा सकता है। चंद्रगुप्त मौर्य ने अंतिम समय में जैन धर्म की दीक्षा ले ली थी और श्रवणबेलगोला में उनकी मृत्यु हुई। वहीं अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर अहिंसा का मार्ग अपना लिया था।
कहीं चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक के सर्वहारा वर्ग के होने और जैन धर्म और बौद्ध धर्म स्वीकार करने की वजह से तो भाजपा और आरएसएस उन्हें हिन्दू माचोमैन आइकॉन के रूप में अपनाने से परहेज तो नहीं करती। या इनके द्वारा किये युद्ध में हिंदुओं का नुकसान होने और इनका मुगलों को हराने में कोई रोल नहीं होने से ये दोनों इनके इस्लामोफोबिक नैरेटिव में फिट नहीं बैठते। या फिर इसलिए कि 2014 में नरेंद्र मोदी से पहले सर्वहारा वर्ग से और विश्व में भारत को पहचान दिलवाने वाले ये ही दो जने होने से इनको आइकॉन बनाकर नरेंद्र मोदी की छवि को धूमिल नहीं होने देना चाहती?
-परीक्षित मिश्रा

