अग्नि आलोक

*बुद्धा पार्क से शिवालय पार्क  में बदलने की साजिश : भाजपा–आरएसएस का असली एजेंडा*

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तेजपाल सिंह तेज

          प्रयागराज की तर्ज पर अब कानपुर में भी 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन कराए जाएंगे। इसके लिए कल्याणपुर के बुद्धा पार्क में नगर निगम 15 करोड़ की लागत से शिवालय पार्क की स्थापना कराएगा। यहां पर केवल 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन ही नहीं होंगे बल्कि बच्चों के लिए हैप्पीनेस किड्स जोन की स्थापना की जाएगी और इसे एम्यूज़मेंट पार्क के रूप में विकसित किया जाएगा।

           भारत का संविधान हमें समानतास्वतंत्रता और बंधुता की गारंटी देता है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि जब तक   सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बराबरी नहीं होगीतब तक राजनीतिक बराबरी भी अधूरी रहेगी। किंतु आज की हकीकत यह है कि भाजपा और आरएसएस जैसे संगठनों ने हिंदू राष्ट्र” की परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिए हर स्तर पर प्रयास तेज कर दिए हैं। कानपुर का बुद्धा पार्क — जो दलितबहुजन समाज के गौरव और बुद्ध की करुणासमता की शिक्षा का प्रतीक था — उसे शिवालय पार्क” में बदलने की योजना इसी साजिश का हिस्सा है। यह केवल एक पार्क का नाम बदलना नहीं हैबल्कि बहुजन इतिहासपहचान और संघर्ष को मिटाने का प्रयास है।

          अगस्त 2025 : खबर है कि कानपुर नगर उपदेश टाइम्स: नगर आयुक्त सुधीर कुमार द्वारा जोन-6कल्याणपुर स्थित बुद्धा पार्क का स्थलीय निरीक्षण किया गया। इस अवसर पर नगर आयुक्त ने पार्क के विकास कार्यों का विस्तृत अवलोकन किया एवं भविष्य की योजनाओं के संबंध में दिशानिर्देश प्रदान किए। नगर निगम कानपुर द्वारा बुद्धा पार्क को परिवर्तित कर शिवालय पार्क” के रूप में विकसित किए जाने की योजना है। यह पार्क प्रयागराज के शिवालय पार्क की तर्ज पर तैयार किया जाएगा। इसमें भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों के प्रतिरूप (प्रोटोटाइप) स्थापित किए जाएंगे। नगरवासियों को एक ही स्थान पर सभी ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का अवसर प्राप्त हो सके एवं उनके धार्मिकसांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी भी दी जा सके।

          शिवालय पार्क परिसर में ही हैप्पीनेस पार्क” विकसित किया जाएगा। यह पार्क विशेष रूप से कानपुर शहर की हैप्पीनेस इंडेक्स में प्राप्त पहचान को प्रदर्शित करने हेतु बनाया जाएगा। इसमें नागरिकोंविशेषकर *बच्चों एवं युवाओं के लिए मनोरंजन एवं शैक्षिक गतिविधियों को सम्मिलित किया जाएगा। बच्चों के लिए विविध प्रकार की  मनोरंजन गतिविधियाँ। एक अत्याधुनिक चिल्ड्रेन पार्क।आगंतुकों हेतु कैफ़े। मनोरंजन हेतु आकर्षक वॉटर बॉल झील। नगरवासियों को धार्मिकसांस्कृतिक अनुभव के साथ-साथ मनोरंजन एवं आधुनिक सुविधाएँ प्रदान करना है। पार्क के माध्यम से नागरिकों को आध्यात्मिक शिक्षासांस्कृतिक जानकारी एवं मनोरंजन एक ही स्थल पर उपलब्ध कराया जाएगा। यह पार्क न केवल कानपुर शहर की सुंदरता एवं पहचान को बढ़ाएगाबल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी शहर को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएगा। नगर निगम कानपुर का संकल्प है कि इस परियोजना के माध्यम से कानपुर शहर को एक अनूठा धार्मिकसांस्कृतिक एवं मनोरंजन केंद्र के रूप में स्थापित किया जाए।

          भारत की पहचान उसकी बहुलतावादीविविधतापूर्ण और समन्वयकारी संस्कृति में रही है। यहाँ बौद्धजैनसिखईसाईइस्लाम और हिंदू सभी परंपराएँ सह-अस्तित्व में विकसित हुईं। किंतु वर्तमान समय में सत्ता और राजनीति का स्वरूप ऐसा बदल रहा है कि सांस्कृतिक धरोहरों का प्रयोग धार्मिक और राजनीतिक राष्ट्रवाद को मजबूत करने के औजार के रूप में होने लगा है। हाल ही में कानपुर नगर निगम द्वारा बुद्धा पार्क का नाम बदलकर शिवालय पार्क” करने की घोषणा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। यह कदम केवल पार्क का नाम बदलने तक सीमित नहीं हैबल्कि इसके भीतर छिपा हुआ संदेश भाजपाआरएसएस की उस दीर्घकालिक योजना की ओर संकेत करता हैजिसके तहत भारत को हिंदू राष्ट्र की ओर मोड़ा जा रहा है।

धार्मिक राष्ट्रवाद की ओर संकेत:

          बुद्धा पार्क का नामकरण बौद्ध परंपरा और समताकरुणा के संदेश का प्रतीक था। बुद्ध का दर्शन तर्कअहिंसा और समानता पर आधारित है। जबकि अब उसी स्थान को शिवालय पार्क” बनाकर वहाँ 12 ज्योतिर्लिंगों के प्रतिरूप स्थापित करने की योजनास्पष्ट रूप से हिंदू धार्मिक प्रतीकों को सार्वजनिक जीवन और राज्य संरचना में प्रमुखता दिलाने का प्रयास है। यह कदम उस विचारधारा के अनुकूल है जो भारत की सांस्कृतिक विरासत को केवल हिंदू धर्म तक सीमित कर प्रस्तुत करना चाहती है।

भाजपा और आरएसएस की दृष्टि:

          भाजपा और आरएसएस का घोषित और अघोषित एजेंडा हिंदू राष्ट्र” की स्थापना है। आरएसएस के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से लेकर गोलवलकर तकबारबार यह रेखांकित किया गया है कि भारत केवल हिंदुओं का देश है और अन्य धर्मावलंबियों का अस्तित्व तभी स्वीकार्य है जब वे हिंदू संस्कृति को ही सर्वोपरि मानें। भाजपा जब सत्ता में आती हैतो इस विचारधारा को व्यवहार में उतारने के लिए सांस्कृतिकधार्मिक प्रतीकों को पुनर्परिभाषित करती है। पार्कोंसड़कोंनगरों और योजनाओं का नामकरण धार्मिक आधार पर बदलना इसी एजेंडे की कड़ी है।

मनुस्मृति और धार्मिक राष्ट्रवाद:

          मनुस्मृति प्राचीन ग्रंथ हैजिसमें वर्ण व्यवस्था और जातिगत भेदभाव को धर्मसम्मत ठहराया गया। आरएसएस और उसकी शाखाएँ मनुस्मृति को एक सांस्कृतिक ग्रंथ” के रूप में मान्यता देती रही हैं। इस ग्रंथ का मूल उद्देश्य समाज को ऊँचनीचछुआछूत और स्त्रीपुरुष असमानता के आधार पर व्यवस्थित करना था। आज जब बुद्धा पार्क को शिवालय पार्क में बदला जा रहा हैतो यह केवल बौद्ध विचारधारा की अवमानना ही नहीं हैबल्कि उस दलितबहुजन चेतना पर प्रहार हैजिसने बुद्धकबीरफुले और अम्बेडकर के विचारों से प्रेरणा पाकर मनुस्मृति के विरुद्ध संघर्ष किया। इस तरह यह परिवर्तन मनुस्मृतिप्रेरित राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान का प्रतीक बन जाता है।

सांस्कृतिक विविधता पर असर:

भारत की ताकत उसकी बहुलता है। लेकिन जब सार्वजनिक स्थल केवल एक धर्म के प्रतीक बन जाएँतो समाज के अन्य हिस्सों मेंभावअसुरक्षा और असमानता का भाव गहराता है। बुद्धा पार्क का शिवालय पार्क में परिवर्तन दलितबहुजन समाज और बौद्ध परंपरा से जुड़े लोगों को यह संदेश देता है कि उनकी विरासत और योगदान को दरकिनार कर दिया जा रहा है। यह लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत की आत्मा पर सीधा आघात है।

राजनीति और मनोरंजन का मेल:                                                                                      नगर निगम की घोषणा में कहा गया है कि शिवालय पार्क धार्मिकसांस्कृतिक अनुभव के साथ हैप्पीनेस पार्क” और मनोरंजन केंद्र भी होगा। यह योजनाबद्ध रणनीति हैधर्म और मनोरंजन का ऐसा मेलजिससे आम नागरिक विशेषकर युवा वर्ग धर्म को जीवन का स्वाभाविक और आकर्षक हिस्सा मानने लगे। राजनीति और संस्कृति का यह सम्मिलन भाजपाआरएसएस की दीर्घकालिक परियोजना हैजिससे वे आने वाली पीढ़ियों के मानस को हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से जोड़ना चाहते हैं।

दलितबहुजन चेतना पर हमला:

          भारत का संविधान हमें समानतास्वतंत्रता और बंधुता की गारंटी देता है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिकाऊ होगाजब वह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की नींव पर खड़ा हो।” लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि भाजपा और आरएसएस जैसी ताक़तें भारत की धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी पहचान को मिटाकर हिंदू राष्ट्र” के निर्माण की दिशा में बढ़ रही हैं। कानपुर का बुद्धा पार्क — जो करुणाअहिंसासमता और बहुजन चेतना का प्रतीक था — उसे शिवालय पार्क” में बदलने की योजना इस व्यापक परियोजना का हिस्सा है। यह महज़ एक पार्क का नाम बदलना नहीं हैबल्कि भारत के दलितबहुजन इतिहासअस्मिता और संघर्षों को हाशिए पर धकेलने का प्रयास है। आज आवश्यकता है कि हम इस घटनाक्रम को केवल एक स्थानीय घटना मानकर नज़रअंदाज़ न करेंबल्कि इसे हिंदुत्व राजनीति की दीर्घकालिक रणनीति के रूप में समझें।

बौद्ध प्रतीक का दमन और हिंदू प्रतीक की स्थापना:

          बुद्धा पार्क का अस्तित्व स्वयं इस बात का साक्ष्य था कि बहुजन समाज ने अपनी वैचारिक धरोहर को सार्वजनिक स्थलों पर जगह दिलाई। बुद्धजिन्होंने जातिवर्ण व्यवस्था का विरोध किया और मानवमात्र की समानता का संदेश दियावे दलितबहुजन चेतना के मूल प्रेरणास्रोत हैं। अब उसी जगह 12 ज्योतिर्लिंगों के प्रतिरूप स्थापित कर शिवालय पार्क” बनाना केवल धार्मिक पर्यटन का बहाना नहीं है। यह सत्ता द्वारा योजनाबद्ध सांस्कृतिक दमन है।

·        बुद्ध का संदेश तर्कसमता और करुणा पर आधारित थाजबकि ज्योतिर्लिंग मनुस्मृतिआधारित सामाजिक संरचना का प्रतीक हैं।

·        बुद्ध का आंदोलन बहुजन समाज को संगठित करता हैजबकि शिव और अन्य पौराणिक प्रतीक ब्राह्मणवादी व्यवस्था को महिमामंडित करते हैं।

·        इसलिए इस परिवर्तन को दलितबहुजन चेतना को कमजोर करने की सोचीसमझी चाल कहा जा सकता है।

भाजपाआरएसएस का असली एजेंडा:

          आरएसएस का सपना है कि भारत हिंदू राष्ट्र” बनेजिसमें केवल सवर्णहिंदू संस्कृति को सर्वोपरि मान्यता मिले। भाजपा इस एजेंडे को सत्ता की ताकत से लागू कर रही है।

नाम बदलने की राजनीति — चाहे वह शहरों के नाम होंसड़कों के हों या पार्कों के — असल में प्रतीकों की राजनीति है। प्रतीक ही समाज की चेतना को आकार देते हैं। जब बुद्ध के प्रतीक हटाए जाते हैं और उनकी जगह शिवरामया अन्य हिंदू देवीदेवताओं के प्रतीक लाए जाते हैंतो संदेश साफ होता है :

·        भारत केवल हिंदुओं का देश है।

·        दलितबहुजन और अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान गौण है।

·        संविधान और लोकतंत्र से ऊपर हिंदू संस्कृति” है।

यह वही मानसिकता है जो मनुस्मृति को आदर्श मानती है और डॉ. अम्बेडकरबुद्धकबीरफुलेपेरियार की विचारधारा को हाशिए पर धकेलने का षड्यंत्र करती है।

मनुस्मृति और हिंदुत्व की राजनीति:

          मनुस्मृति कहती है कि समाज को चार वर्णों में बाँटा जाए — ब्राह्मणक्षत्रियवैश्य और शूद्र। शूद्रों और स्त्रियों को अधीन बनानाअस्पृश्यता और ऊँचनीच को धर्मसम्मत ठहराना इसका मूल स्वरूप है।

आज भाजपाआरएसएस द्वारा सांस्कृतिक प्रतीकों के पुनर्गठन का यही अर्थ है कि:

·        शूद्रआत्मसम्मान और बौद्धबहुजन चेतना को कुचल दो।

·        दलितओबीसी को हिंदू संस्कृति के ढाँचे में क़ैद करो।

·        हिंदू राष्ट्र” के नाम पर मनुस्मृति को फिर से सामाजिक जीवन का आधार बना दो।

          बुद्धा पार्क का नाम बदलना इस गहरे षड्यंत्र का हिस्सा है।

दलितबहुजन समाज के लिए खतरे की घंटी:

          यह घटना केवल कानपुर तक सीमित नहीं है। अगर आज हम चुप रहे तो कल यही सिलसिला पूरे देश में फैलेगा।

·        कल स्मारकों का नाम बदलेगा।

·        फिर विद्यालयोंविश्वविद्यालयों से फुलेअम्बेडकरपेरियारबुद्ध की मूर्तियां हटाई जाएँगी। और

·        अंततः संविधान को ही बदल दिया जाएगा।

          बहुजन समाज को यह समझना होगा कि यह हमला केवल एक पार्क पर नहींबल्कि उनकी अस्मिताइतिहास और भविष्य पर है।

ऐतिहासिक उदाहरण : प्रतीकों का दमन और निर्माण:

          इतिहास साक्षी है कि जब भी कोई शोषक सत्ता उभरती हैतो सबसे पहले वह समाज के प्रतीकों और स्मृतियों पर हमला करती है।

·        यूरोप में फासीवाद ने इतिहास की किताबें बदलीं।

·        नाज़ी जर्मनी ने यहूदियों के प्रतीकों को मिटाया।

·        भारत में भी ब्राह्मणवाद ने बौद्ध विहारों को तोड़कर मंदिर बना दिए।

आज वही प्रक्रिया लोकतंत्र के नाम पर दोहराई जा रही है। बुद्धा पार्क का शिवालय पार्क” बनना इस लंबी श्रृंखला का आधुनिक अध्याय है।

बहुजन समाज के लिए संदेश: क्या करना चाहिए?

1. संगठन और एकता:

          दलितओबीसीआदिवासी और वंचित वर्ग को बुद्धफुलेअम्बेडकरपेरियार की विचारधारा पर आधारित होकर एकजुट होना होगा।

·        अलगअलग जातीय पहचान से ऊपर उठकर बहुजन पहचान को मजबूत करना होगा।

·        जो बहुजन का नहींवह हमारा नेता नहीं” — यह मूल मंत्र होना चाहिए।

2. जन आंदोलन:

सांस्कृतिक प्रतीकों पर हो रहे हमलों का जवाब लोकतांत्रिक जनआंदोलनों से देना होगा।

·        शांतिपूर्ण धरनेरैलियाँ और जनसभाएँ आयोजित करनी होंगी।

·        हर जगह यह आवाज़ गूँजे : बुद्धा पार्क वापस करोशिवालय पार्क नहीं चाहिए।

3. शिक्षा और चेतना:

·        अम्बेडकर ने कहा था कि शिक्षित बनोसंगठित बनोसंघर्ष करो।

·        हर बहुजन परिवार को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा देगा।

·        केवल डिग्री नहींबल्कि बुद्धअम्बेडकरफुले की चेतना से लैस शिक्षा ज़रूरी है।

 4. मीडिया और लेखन:

          आज का समय सूचना और संचार का है।

·        बहुजन बुद्धिजीवी और छात्र अपने लेखपुस्तिकाएँ और शोध पत्र लिखें।

·        सोशल मीडिया पर सच्चाई फैलाएँ।

·        न्यूज़ चैनल” अगर हिंदुत्व का प्रचार करते हैंतो बहुजन अपने वैकल्पिक मीडिया प्लेटफ़ॉर्म तैयार करें।

5. राजनीतिक हस्तक्षेप:

          बहुजन समाज को यह समझना होगा कि बिना सत्ता हिस्सेदारी के कोई परिवर्तन संभव नहीं है।

·        चुनावों में बहुजन हितैषी उम्मीदवारों को वोट दें।

·        अपने प्रतिनिधियों से सवाल पूछें।

·        आरक्षणशिक्षास्वास्थ्यऔर संस्कृति पर जवाबदेही तय करें।

दलितबहुजन आंदोलन की ऐतिहासिक धारा:

यह संघर्ष नया नहीं है।

·        बुद्ध ने जातिवर्ण का विरोध किया।

·        कबीर ने जातपात” की जड़ें हिलाईं।

·        ज्योतिराव फुले ने गुलामगिरी” लिखकर ब्राह्मणवाद का पर्दाफाश किया।

·        डॉ. अम्बेडकर ने संविधान देकर हमें अधिकार दिलाए।

·        पेरियार ने दक्षिण भारत में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी।

          आज यह पूरा आंदोलन नए रूप में खड़ा होने की पुकार कर रहा है।

          बुद्धा पार्क को शिवालय पार्क में बदलना केवल नाम परिवर्तन नहींबल्कि भारत की धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी परंपरा पर प्रश्नचिन्ह है। यह कदम भाजपाआरएसएस के हिंदू राष्ट्र के सपने की दिशा में एक और छोटा किंतु महत्वपूर्ण   क़दम है। मनुस्मृतिआधारित सामाजिक संरचना को पुनः स्थापित करने का यह प्रयास दलितबहुजन और अल्पसंख्यक समुदायों की पहचान पर हमला है। भारत को यदि अपने वास्तविक स्वरूपसमानतान्यायस्वतंत्रता और बंधुतापर आधारित राष्ट्र बनाए रखना हैतो ऐसे सांस्कृतिकराजनीतिक परिवर्तनों का लोकतांत्रिक प्रतिरोध आवश्यक है। भारत का भविष्य केवल एक धर्म पर आधारित राष्ट्र में नहींबल्कि सभी धर्मों और समुदायों की साझी संस्कृति और समान भागीदारी में है।” पुन: समझलें    बुद्धा पार्क को शिवालय पार्क में बदलने की योजना केवल एक पार्क का मामला नहीं है। यह दलितबहुजन चेतना,  इतिहास और अस्मिता पर सीधा प्रहार है। भाजपाआरएसएस की हिंदू राष्ट्र की राजनीतिमनुस्मृति की व्यवस्था को   पुनर्जीवित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे समय में अगर बहुजन समाज जागा नहींतो उसकी पहचान और अधिकार दोनों संकट में पड़ जाएंगे।

          हमें यह जान लेना चाहिए कि बुद्धा पार्क को शिवालय पार्क में बदलना केवल नाम परिवर्तन नहीं है। यह दलितबहुजन चेतनाइतिहास और अस्मिता पर सीधा प्रहार है। भाजपाआरएसएस की हिंदू राष्ट्र की राजनीति मनुस्मृति की व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यदि बहुजन समाज आज नहीं जागातो कल उनकी पहचानउनका संविधान और उनका भविष्य संकट में होगा। इसलिए हमें मिलकर कहना होगा —

हम बुद्ध के अनुयायी हैंमनुस्मृति के नहीं।

बराबरी के लिए लड़ेंगेहिंदू राष्ट्र के लिए नहीं।

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