Site icon अग्नि आलोक

पूर्वोत्तर के दो में जा सकती है भाजपा की सत्ता

Share

– नित्य चक्रवर्ती

भारत जोड़ो यात्रा की सफलता के बाद कांग्रेस आलाकमान को इन तीन राज्यों में चुनाव की तैयारियों पर पूरा ध्यान देना चाहिए। यदि भाजपा तीन में से दो राज्यों में सत्ता खो देती है, तो दूसरे चरण में कर्नाटक में उसके चुनाव अभियान को एक बड़ा धक्का लगेगा। कांग्रेस पहले से ही कर्नाटक में भाजपा के खिलाफ लाभप्रद स्थिति में है। कर्नाटक में विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराने के लिए एक बड़े नये धक्के की जरूरत है।

16 फरवरी को त्रिपुरा में और 27 फरवरी को मेघालय और नागालैंड में होने वाले मतदान के साथ 2023 विधानसभा चुनाव का मौसम शुरू हो गया है। पहले चरण के तीनों राज्यों के नतीजे 2 मार्च को जाने जायेंगे। नतीजों का खासा असर होगा वर्ष के दौरान निर्धारित शेष छह राज्यों में चुनाव प्रचार की गति पर। कर्नाटक में इस साल अप्रैल/मई में दूसरे चरण में चुनाव होने हैं।

संकेतों से पता चलता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों के भारी संसाधनों और लगातार अभियानों के बावजूद, शक्तिशाली भाजपा मेघालय में जूनियर पार्टनर के रूप में सत्ता खोने के लिए तैयार है। त्रिपुरा में, भाजपा एक तंग स्थिति में है क्योंकि गठबंधन के उसके साथी आईएफटीएफ ने अपना पिछला आधार नयी आदिवासी पार्टी टिपरा मोथा (टीएम) के लिए खो दिया है, जो वामपंथी मुख्य गठबंधन माकपा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे के साथ सीमित तालमेल के लिए खुले विकल्प के साथ अकेले लड़ रही है।

नागालैंड एकमात्र ऐसा राज्य है जहां भाजपा क्षेत्रीय पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन में एक जूनियर पार्टनर के रूप में वापस आने के लिए आश्वस्त है। 60 सीटों में से भाजपा 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और उसके क्षेत्रीय सहयोगी शेष 40 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। फिलहाल त्रिपुरा में भाजपा का दांव काफी ऊंचा है। आरएसएस द्वारा वर्षों के पोषण के बाद पार्टी ने 2018 के विधानसभा चुनावों में सीपीआई (एम) को हराकर सत्ता हासिल की, जो लंबे समय से सत्ता में थी। भाजपा को 60 में से 35 सीटें मिलीं, जबकि माकपा को 16 सीटें मिलीं। लेकिन माकपा ने अपने वोट शेयर को भाजपा के 43.59 प्रतिशत के मुकाबले 42.2 प्रतिशत के सहज स्तर पर बनाये रखा।

पांच साल में त्रिपुरा में राजनीतिक स्थिति काफी हद तक बदल गयी है, जिससे भाजपा शासन के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ गया है। सी पी आइ (एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे ने अंतत: भाजपा के विरुद्ध एकजुट होकर मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। लंबे समय तक अव्यवस्था के बाद हाल के महीनों में कांग्रेस ने अपने आधार समर्थन में सुधार किया है। लेकिन चुनावी लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण कारक नयी आदिवासी पार्टी टिपरा मोथा (टीएम) है, जिसके पास लगभग 80 प्रतिशत आदिवासी समर्थन है। अगर टीएम के साथ वाम-कांग्रेस गठबंधन की पूरी समझ होती तो यह कहा जा सकता था कि अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार तय है।

लेकिन अब यह निश्चित नहीं है क्योंकि टीएम 60 में से 45 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। आदिवासी 20 निर्वाचन क्षेत्रों में, टीएम की बड़ी बढ़त है, लेकिन शाही परिवार के वंशज प्रद्योत नारायण माणिक्य देबबर्मा के नेतृत्व वाली पार्टी को एक सम्मानित राजनेता होने के कारण सामान्य अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में भारी समर्थन प्राप्त है।
वाम-कांग्रेस गठबंधन के लिए बेहतर होगा कि नामांकन वापस लेने के बाद भी अब कुछ समझ बना ली जाये, ताकि कुछ महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा विरोधी वोटों के बंटने से बचने के तरीके खोजे जा सकें।

भाजपा को हराने के लिए यह सुनिश्चित करना होगा। इसके अलावा, त्रिशंकु विधानसभा होने पर टीएम के साथ चुनाव बाद गठबंधन के लिए दरवाजे खुले रखे जाने चाहिए। तृणमूल कांग्रेस ने भी राज्य के चुनाव में 28 उम्मीदवार उतारे हैं और पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी 6 और 7 फरवरी को त्रिपुरा का दौरा कर रही हैं। ममता का बंगालियों के बीच एक बड़ा प्रभामंडल है और उनके बड़ी भीड़ खींचने की संभावना है। अगर टीएमसी को बंगालियों से अच्छे वोट मिलते हैं, तो यह वामपंथियों के अलावा भाजपा के वोटों की कीमत पर होगा। ऐसे में टीएमसी के वोट भी नतीजे तय करने में अहम भूमिका निभायेंगे।

मेघालय में, कॉनरैड संगमा के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ एनपीपी सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, तो उसकी एनडीए की सहयोगी भाजपा भी। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस भी 60-60 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। मुकाबला एनपीपी, टीएमसी और कांग्रेस के बीच त्रिकोणीय होगा, जिसमें भाजपा मामूली भूमिका निभायेगी। 2018 के चुनावों में कांग्रेस को 28.5 प्रतिशत के उच्चतम वोट प्रतिशत के साथ 21 सीटें मिलीं थीं। भाजपा को 9.6 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 2 सीटें मिलीं थी, लेकिन फिर भाजपा ने चालाकी से अपनी सीटें बढ़ायीं और क्षेत्रीय पार्टियों पर केंद्र का दबाव डालकर जूनियर पार्टनर बन गयी। तृणमूल कांग्रेस ने संसाधन जुटाने में भाजपा के साथ प्रतिस्पर्धा की और अंत में कांग्रेस से दलबदल का आयोजन करने में सफल रही। टीएमसी के पास अब मुकुल संगमा के नेतृत्व में 12 विधायक हैं और पार्टी विपक्ष की मुख्य पार्टी के रूप में कॉनरैड संगमा को सत्ता से हटाने के लिए प्रचार कर रही है।

दलबदल के बावजूद कांग्रेस मेघालय में अभी भी बड़ा आधार बनाए हुए है। अगर पार्टी को पर्याप्त केंद्रीय मदद मिल सकती है, तो उसे निश्चित रूप से कुछ सीटें मिल सकती हैं। लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में कांग्रेस के साथ समस्या यह है कि केंद्रीय नेतृत्व ने सात राज्यों वाले क्षेत्र को छोड़ दिया है। भाजपा हमेशा अपने शीर्ष नेताओं को राज्य पार्टी इकाइयों की मदद के लिए पूर्वोत्तर राज्यों में भेजती है। अमित शाह खुद काफी समय देते हैं। लेकिन कांग्रेस ने कभी अपना गढ़ माने जाने वाले पूर्वोत्तर राज्यों को भाजपा के नियंत्रण से खिसक जाने दिया। असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा पूर्वोत्तर क्षेत्र में एनडीए के प्रभारी हैं। कांग्रेस में कोई भी ऐसा नहीं है जो उनके सांगठनिक कौशल का मुकाबला कर सके।

भारत जोड़ो यात्रा की सफलता के बाद कांग्रेस आलाकमान को इन तीन राज्यों में चुनाव की तैयारियों पर पूरा ध्यान देना चाहिए। यदि भाजपा तीन में से दो राज्यों में सत्ता खो देती है, तो दूसरे चरण में कर्नाटक में उसके चुनाव अभियान को एक बड़ा धक्का लगेगा। कांग्रेस पहले से ही कर्नाटक में भाजपा के खिलाफ लाभप्रद स्थिति में है। कर्नाटक में विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराने के लिए एक बड़े नये धक्के की जरूरत है। इसके लिए पार्टी नेतृत्व को भाजपा के खिलाफ उसे मात देने की उत्कट भावना के साथ आगे बढ़ना चाहिए। खोने के लिए कोई समय नहीं है। वर्ष 2023 के दौरान अगले छह विधानसभा चुनावों के लिए अपने अभियान में पूरे विपक्ष को एक बड़ी गति प्रदान करने के लिए पहले चरण में भाजपा की हार आवश्यक है।

Exit mobile version