शशिकांत गुप्ते
रेवड़ियां तो अभीतक कहावत में ही बटती थी। और वह भी सिर्फ अंधा ही बांटता था।
अंधा जब भी रेवडियां बांटता है तब वह अपने अपनो को ही देता है।
उक्त कहावत में अंधे व्यक्ति का प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है। यह प्रतीक काल्पनिक है।
इस कहावत के माध्यम से भाई-भतीजावादी मानसिकता पर व्यंग्य है।
इनदिनों सियासी हलकों में रेवड़ी पर बहुत कुछ कहा जा रहा है।
कहावत की रेवड़ी और वर्तमान में चर्चित सियासी रेवड़ी में अंतर है। इस अंतर को गम्भीरता से समझना चाहिए।
दोनो ही रेवड़ियों में तिल्ली और शक्कर गायब है। कहावत वाली और सियासी रेवड़ी दोनों रेवड़ियां प्रतीक मात्र है।
सियासी रेवड़ी का उपयोग पक्ष और विपक्ष में पारस्परिक अरोपप्रत्यारोप करने के लिए किया जा रहा है।
आखिर ये सियासी रेवड़ी है क्या?
जनता के द्वारा कर (Tax) दिया जाता है। कर से प्राप्त आय को राजस्व कहतें है। इसी राजस्व की तिल्ली को वाहवाही लूटने वाली शाब्दिक शक्कर की चाशनी में मिलाकर छोटी छोटी गोली बनाई जाती है। इसे सियासी रेवड़ी कहतें हैं।
ये सियासी रेवड़ी सिर्फ कर्णप्रिय होती है। इनका स्वाद सिर्फ सुनकर महसूस किया जाता है।
इस तरह रेवड़ी बनाना मतलब
हींग लगे न फिटकरी रंग चौखा, वाली कहावत को चरितार्थ करना।
यह सारा खेल बहुत ही चमत्कारीक तरीके से खेला जाता है।
चमत्कार दिखाना मतलब जादुई करिश्मा प्रस्तुत करना।
इनदिनों रेवड़ियों के साथ सियासत में कालाजादू भी बहुत चर्चित हुआ है। यह कालाजादू इक्कीसवीं सदी में अंधभक्तो में अंधश्रद्धा जागृत होने की पुष्टि करता है।
कालाजादू का डर समाज में पैदा हो जाए तो हो सकता है कोई बाबा भी प्रकट हो जाए जो काले जादू का तोड़ जानता हो।
ऐसे काल्पनिक बाबा के द्वारा विज्ञापन इसतरह प्रस्तुत किया जा सकता है।
कालाजादू के विशेषज्ञ, “दुर्लभ बाबा”
मेरा किया कोई काट नहीं सकता है। काले जादू से पीड़ित सीधे मेरे पास ही आएं। मेरे पास आने के लिए निम्न नियमों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
1) कोई भी काले कपड़े पहन कर नहीं आ सकता है।
2) प्रत्येक आने वाले को एक किलो रेवड़ी साथ में लाना अनिवार्य है।
3) सिर्फ सियासी लोगों को ही प्रवेश मिलेगा।
4) तार्किक बहस करने वालों के लिए प्रवेश निषेध है।
5) एक समय एक ही दल के प्रतिनिधि को प्रवेश मिलेगा।
विज्ञापन का असर इतना ही हुआ कि, सिर्फ दो दलों के प्रतिविधियों ने प्रवेश की अनुमति ली।
यह देख बाबा अपने अनुयायियों के साथ रातों रात पलायन कर गए।
बाबा का एक अनुयायी बाबा की यांत्रिक दुकान का तामझाम समेटते हुए पत्रकारों को मिल गया।
पत्रकारों ने उस अनुयायी से बाबा के पलायन का कारण पूछा तो उसने बताया।
बाबा को लगा था कि, देश में इक्कीसवीं सदी में भी इतनी अंधश्रद्धा व्याप्त है तो अपनी दुकान बहुत चलेगी। हजारों किलों रेवड़ियां इकठ्ठी होगी। इकठ्ठी होने वाली रेवडी को चमत्कारिक रेवड़ी के नाम से प्रचारित कर बेचा जाएगा। लेकिन विज्ञापन प्रकाशित होने पर बाबा का दुर्भाग्य सिर्फ दो ही दलों के प्रतिनिधियों ने बाबा के दर्शन की अनुमति मांगी।
अपनी योजना असफल होते देख,बाबा स्वयं किसी कालेजादू को काटने वाले बाबा की तलाश में भाग खड़े हुए हैं।
सीतारामजी ने अपने स्वरचित व्यंग्य को पूर्ण वीराम देतें हुए,
स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की शुभकामनाएं दी।
उसी समय टी वी पर समाचार प्रसारित हो रहें हैं। घर घर तिरंगा अभियान को सफल बनाने के लिए शासकीय राशन की दुकानो पर तिरंगा झंडा खरीदने पर ही मुफ्त राशन दिया जा रहा है। देशभक्ति जागृत करने की अनोखी मिसाल है यह।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

