आरती शर्मा
_साधु तपस्या से वापिस लौट रहा था। हिमालय की ठंड से उसका शरीर अकड़ चुका था परन्तु फिर भी पूरी तरह स्वस्थ। उसके चेहरे पर तेज तो था पर आंखों में एक बेचैनी और अधूरापन फिर भी मचल रहा था।_
एक कस्बे के बाहर एक छोटा सा मकान दिखा। भिक्षा के लिये साधु ने दरवाजा खटखटाया। एक स्त्री ने दरवाजा खोला। साधारण कपड़ों के बावजूद उसका चेहरा किसी आभा से चमक रहा था। मुस्कान होंठो से चढ़ती आंखों से छलक रही थी।
‘भिक्षा दे पुत्री!’
साधु ने कहा पर पुत्री कहने के बावजूद उसे स्त्री की मुस्कान प्रेम के अनदेखे द्वार तक पहुंचा गई जिसे खोलने से बचने के लिये वह हिमालय चला गया था।
‘कौन है सावित्री?’
कहता एक युवा पुरूष भी भीतर से बाहर आया। पुरूष के कमजोर शरीर के बावजूद उसके चेहरे पर भी एक प्रकाश था। उसकी मुस्कान उसके पूरे वजूद में छलकती दिख रही थी।
‘भिक्षा दो पुत्र!’
साधु प्रेम से भरे स्त्री-पुरूष को देख किसी अनजानी डाह से भर उठा फिर तुरन्त एक पश्चाताप में डूब गया।
‘आप कौन हैं बाबा?’
स्त्री-पुरूष ने एक साथ पूछा।
‘साधु हूं बच्चों!’
वह बोला।
दोनों ने साधु को भीतर बुलाया और प्रेम से साधारण भोजन कराया। इस बीच दोनों एक दूसरे से बड़े प्रेम से व्यवहार कर रहे थे।
भोजन के बाद साधु जाने लगा पर फिर एकाएक रूक गया।
‘इस जंगल में तुम दोनों रह रहे हो…वह भी अकेले?’
उसने पूछा।
‘हम प्रेम करते हैं एक दूजे को। विजातीय थे इसलिये समाज के विरोध से हमें भागना पड़ा। अब यहां रहते हैं और खुश हैं।’
पुरूष अपनी पत्नी का हाथ अपने हाथ में लेता बोला।
‘तो यहां किसी का डर नहीं।’
साधु ने जानना चाहा।
‘हम प्रेम में है बाबा। डर इंसान से था, जानवर प्रेम की भाषा समझते हैं. अब हमें किसी का डर नहीं।’
अब स्त्री बोली।
‘आपने क्या तपस्या की बाबा?’
अब पुरूष ने पूछा।
बाबा ने एक क्षण आंखें बन्द कीं। उसे ध्यान आया कि गृहस्थ से ऊब कर वह हिमालय चला गया था। साधुओं की एक टोली के साथ।
‘डर!’-उसके दिमाग में यह शब्द भी गूंजा। उसने विचार किया। वह ऊब थी या डर था। हां, डर ही तो था। उसे बड़ी शिद्दत से अपनी पत्नी याद आई।
पश्चाताप से भरी एक गहरी आह उसके होंठों ही नहीं, उसके जिस्म के हर पोर से निकली।
‘मैं परम को साधने गया था बच्चों, पर…!’
साधु बुदबुदाया।
‘पर आपका परम बिना प्रेम सध गया क्या बाबा?’
स्त्री ने पूछा।
‘अब लगता है कि प्रेम को साधे बिना परम की साध व्यर्थ है।’
कहकर बाबा ने अपने गांव की तरफ रूख कर लिया।

